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पोलिंग के पहले चुनाव अधिकारी EVM पर सब बटन दबा देते हैं, वजह जानकर आप दौड़ पड़ेंगे

चुनाव कोई भी हो, केंद्रीय चुनाव आयोग का काम बड़ा रहता है. कहीं EVM मिले, सवाल आयोग पर उठते हैं. EVM ले जाने वाले अधिकारी किसी नेता से लिफ़्ट ले लें, आयोग घेरे में. किसी बूथ पर वोटरों की संख्या से अधिक वोट पड़ जाएं, आयोग घेरे में. लेकिन इतना सब ख़बर सुनने के बाद आपको कभौ लगा कि जाना जाए, पूछा जाए कि चुनाव होता कैसे है? बस जाकर मशीन में बटन दबा दिया, हो गया चुनाव? इत्ता ही होता है क्या? नहीं, दोस्त. बहुत होता है. बहुत कुछ होता है. आयोग का काम टफ़ है. और कैसे होता है, बस वही कहानी सुनाने के लिए इतनी भूमिका बांधे हुए हैं.

भारतीय जीवन बीमा निगम यानी LIC के एक अधिकारी हैं. ख़ाकसार के परिचित हैं. कहा कि नाम मत छापना, पूरी कहानी बताएंगे कि चुनाव कैसे होता है? LIC के अधिकारी का चुनाव में क्या काम? क्योंकि LIC सरकारी उपक्रम है. और सरकारी अधिकारियों की चुनाव में ड्यूटी लगती है.

पहले बनेगी लिस्ट

चुनाव आयोग चुनाव की घोषणा करता है. उसके बाद ज़िला प्रशासन की ओर से तमाम सरकारी अर्ध-सरकारी विभागों से ऐसे कर्मचारियों की सूची मांगी जाती है, जो चुनाव में ड्यूटी कर सकते हैं. इन विभागों में बैंक होते हैं, डाक विभाग होते हैं, स्कूल-कॉलेज होते हैं, LIC जैसे संस्थान भी होते हैं. विभागों की ओर से प्रशासन को लिस्ट सौंप दी जाती है. इसके बाद प्रशासन बनाता है चुनाव में काम करने वालों की फ़ाइनल लिस्ट.

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ट्रेनिंग भी दी जाती है चुनाव अधिकारियों को. (PTI)

विभागों के बड़े अधिकारियों को बनाया जाता है पीठासीन अधिकारी. अंग्रेज़ी में कहें तो प्रिज़ाइडिंग ऑफ़िसर. इनके नीचे होते हैं मतदान अधिकारी. पीठासीन अधिकारी के ज़िम्मे उसकी टीम होती है. एक टीम में पीठासीन अधिकारी और मतदान अधिकारी को मिलाकर अमूमन 4-5 अधिकारी होते हैं.

उसके बाद होती है ट्रेनिंग

हां. ये तय हो गया कि चुनाव में कौन काम करेगा. इसके बाद इन अधिकारियों की चुनाव के पहले होती है ट्रेनिंग. ट्रेनिंग इस बात की कि चुनाव कैसे कराया जाए. अब चुनाव में काम कर चुके अधिकारी बताते हैं कि अमूमन ट्रेनिंग के दो सेशन होते हैं. इस ट्रेनिंग में EVM को चलाने की ट्रेनिंग, रख-रखाव, लाने-ले जाने के नियम और पोलिंग बूथ से संबंधित नियमों की जानकारी दी जाती है. ट्रेनिंग पूरी.

चुनाव के पहले का दिन

अब अधिकारियों की ट्रेनिंग वग़ैरह सब हो गयी है. लेकिन ट्रेनिंग कराते ही चुनाव अधिकारियों को EVM दे तो दिया नहीं जाता है. EVM और तमाम काग़ज़ी कामधाम के लिए चुनाव के एक दिन पहले का समय चुना जाता है. हर जिले में होता है एक ज़िला मुख्यालय. इसी मुख्यालय में होते हैं ज़िलाधिकारी कार्यालय, पुलिस अधीक्षक कार्यालय, कभी-कभी कोर्ट-कचहरी वग़ैरह भी इधर ही मिल जाते हैं. इसी ज़िला मुख्यालय में बनाया जाता है एक स्ट्रॉन्ग रूम. इस स्ट्रॉन्ग रूम में उस जिले के सारे मतदान केंद्रों में इस्तेमाल में लाए जाने वाली EVM और काम में आने वाले काग़ज़ रखे होते हैं. पास में ही डिब्बे-सिब्बे रखे होते हैं. इन्हें डिब्बों की मदद से EVM के चारों ओर आड़ बनाया जाता है ताकि वोट कोई देख न सके. 

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ज़िला मुख्यालय से सामान लेकर मतदान केंद्र जाते अधिकारी (PTI)

अब पीठासीन अधिकारी अपनी टीम के साथ मतदान केंद्र पहुंचता है. यहां पर टीम की मुलाक़ात होती है रिटर्निंग ऑफ़िसर से. रिटर्निंग ऑफ़िसर का काम होता है सभी टीमों को मतदान के लिए ज़रूरी सामान मुहैया कराना. कई बक्सों में सामान मिलते ही पीठासीन अधिकारी को कहा जाता है कि टीम के साथ EVM लेकर निकलने से पहले वो चेक कर लें कि EVM की बैटरी चार्ज है या नहीं. मशीन ऑन ऑफ़ करके ही ये समझ में आ जाता है. मशीन में गड़बड़ तो वहीं चेंज होगी, सही है तो पीठासीन अधिकारी मशीन, सामान, काग़ज़-पत्तर के साथ अपनी टीम के साथ चला जाएगा. कैसे जाएगा? सभी टीमों को गाड़ियां मिलेंगी. किसी को बस मिलेगी, तो किसी को मिलेगी चार पहिया. हर टीम की गाड़ी और गाड़ी नम्बर एकदम फ़िक्स.

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पीठासीन अधिकारी के पास अपने पोलिंग बूथ और EVM की सारी ज़िम्मेदारी होती है, जिसके तहत वो मतदान कांडक्ट करवाता है (PTI)

कट टू मतदान केंद्र

अमूमन प्राथमिक विद्यालय, माध्यमिक विद्यालय या इंटर कॉलेज में मतदान केंद्र बनाए जाते हैं. एक केंद्र में एक से अधिक बूथ होते हैं. एक बूथ पर एक EVM और एक ही पीठासीन अधिकारी. मतदान केंद्र तक पहुंचते-पहुंचते अक्सर देर दोपहर या शाम हो जाती है. अमूमन स्कूल के लोग मतदान केंद्र में झाड़ू-सफ़ाई करवा देते हैं. फिर भी सफ़ाई कराई  जाती है. टेबलों, स्टूलों को लगाया दिया जाता है. EVM की टेबल के आसपास पर्याप्त रोशनी का इंतजाम किया जाता है ताकि जब वोटिंग के लिए अगले दिन EVM खोला जाए सभी बटन और उम्मीदवार साफ़-साफ़ दिख सकें. तीन ओर से आड़ लगा दी जाती है. मतदान अधिकारी इन सब तैयारियों को अंजाम देते हैं. पीठासीन अधिकारी तमाम काग़ज़ी काम निबटाते हैं. EVM अभी भी उस ख़ास ब्रीफ़केसनुमा डिब्बे में बंद है. काम निपट गए. बाहर सशस्त्र जवान मतदान केंद्र की रक्षा करते हैं. लेकिन वो पोलिंग बूथ के भीतर नहीं घुस सकते. मतदान केंद्र में ही पोलिंग कराने गयी टीम रात वहीं गुज़ारती है. सुबह की शुरुआत वहीं से होती है.

मिलिए पोलिंग एजेंट से

अब आगे की कहानी जानने के पहले दो नाम सुनिए. पहला नाम है पोलिंग एजेंट और दूसरा नाम है माइक्रो ऑब्ज़र्वर. पोलिंग एजेंट एक ख़ास पार्टी का होता है. जिस वार्ड, गांव, मोहल्ले में मतदान केंद्र बना हुआ है, पोलिंग एजेंट अमूमन वहीं का होता है. वो पोलिंग स्टेशन में जा सकता है. उसके आने-जाने और पोलिंग स्टेशन में रहने का पास पीठासीन अधिकारी ही बनाता है. पोलिंग एजेंट के पास वोटर लिस्ट की एक कॉपी होती है. उसका काम होता है कि वो इस बात की तस्दीक़ कर सके कि पोलिंग ठीक तरीक़े से करायी जा रही है. उसमें किसी तरह का कोई पक्षपात या धांधली तो नहीं की जा रही है. पोलिंग एजेंट वोट देने आए लोगों के वोटर नंबर का अपनी वोटर लिस्ट से मिलान लगातार करता रहता है, इसकी जानकारी उसे कमरे में ही बैठे मतदान अधिकारी से लगातार मिलती रहती है. इससे वह अपनी वोटर लिस्ट अपडेट करता है ताकि अपनी पार्टी की चौकी या टेबल पर — जो अमूमन (पोलिंग स्टेशन निर्धारित दूरी पर) बाहर सड़क या मैदान में लगे होते है, वहां तक पोलिंग के अपडेट भी दिए जा सकें.

अब नम्बर आया माइक्रो ऑब्ज़र्वर का. अक्सर केंद्र सरकार की सेवाओं के कर्मचारी को माइक्रो ऑब्ज़र्वर बनाया जाता है. एक माइक्रो ऑब्ज़र्वर के ज़िम्मे दो पोलिंग बूथ होते हैं. काम होता है मॉक पोलिंग का निरीक्षण करना.

वोटिंग डे आयो रे भईया

सुबह 5 बजे के आसपास पीठासीन अधिकारी समेत पूरी पोलिंग टीम जाग जाती है. तैयार हो जाती है. सारा कुछ सामान सेट कर लिया जाता है. घड़ी में 6 बजे के आसपास शुरू होती है मॉक पोलिंग. यानी समझ लीजिए नक़ली पोलिंग. इसका मक़सद होता है कि पोलिंग कराने आए अधिकारियों और पोलिंग एजेंट को समझ में आ जाए कि जिस मशीन से मतदान शुरू होने जा रहा है, उसमें कोई दिक़्क़त नहीं है. 

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मॉक पोलिंग से ये तय होता है कि मशीन सही से काम कर रही है और सभी पोलिंग एजेंट पोलिंग प्रक्रिया से संतुष्ट हैं (PTI)

ऐसा करने के लिए EVM को सेट किया जाता है. अब पीठासीन अधिकारी को छोड़कर, बाक़ी मतदान अधिकारी, पोलिंग एजेंट मिलकर मशीन के सभी बटन दबाते हैं. बारी-बारी. और पीठासीन अधिकारी एक तरफ़ खड़ा होकर काग़ज़ पर ये नोट करता जाता है कि किस चुनाव चिन्ह पर कितनी बार बटन दबे. सभी लोग मॉक पोल कर लेते हैं. पीठासीन अधिकारी अपनी नोटबुक में पड़े वोटों की गिनती का जोड़ करता है. मानो सारे प्रत्याशियों के नाम पर मिलाकर पड़े 100 वोट. अब मशीन तभी सही मानी जाएगी जब मशीन की गिनती भी 100 वोट दिखाएगी.

अब पीठासीन अधिकारी EVM खोलता है. और वहां पर काउंटिंग का बटन होता है. उसे दबाते ही मशीन के सभी वोटों का जोड़ सामने आ जाता है. अगर पीठासीन अधिकारी के अपने जोड़ और मशीन का जोड़ बराबर है तो मशीन बिलकुल ठीक है. अगर जोड़ बराबर नहीं है तो पीठासीन अधिकारी सेक्टर मैजिस्ट्रेट को इसकी जानकारी देता है, जो जांच के बाद EVM को बदल देता है.

अब मशीन सही निकल गयी. सभी पोलिंग एजेंट और माइक्रो ऑब्ज़र्वर संतुष्ट हो गए. मॉक पोलिंग में हिस्सा लिए सभी लोग काग़ज़ पर साइन करके इसकी पुष्टि करते हैं. अब पीठासीन अधिकारी एक बटन दबाकर मशीन के सारे वोटों को डिलीट कर देता है. मशीन को रिबन और गरम लाख की मदद से सील कर देता है. 7 बजते-बजते वोटिंग आम जनता के लिए शुरू हो जाती है. 

वोटिंग हो गयी, अब क्या?

अब मशीन बंद की जाएगी. फिर से सभी के सामने मशीन में वोटिंग कम्प्लीट का बटन दबा दिया जाता है. मशीन सील करके उसी ब्रीफ़केसनुमा बक्से में बंद कर दी जाती है. बक्सा होता है पीठासीन अधिकारी के हाथ में. जिस गाड़ी से सभी अधिकारी पोलिंग स्टेशन आए थे, उसी गाड़ी में बैठकर वापिस ज़िला मुख्यालय के स्ट्रॉन्ग रूम तक चले जाते हैं. रिटर्निंग अफ़सर द्वारा मशीन को फिर से जमा कर दिया जाता है. कमरा बंद हो जाता है और सुरक्षाबलों की निगरानी शुरू हो जाती है. अब मशीन मतगणना के समय ही सामने आती है.


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