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भारत-पाकिस्तान का बॉर्डर हम इस बॉर्डर जैसा क्यों नहीं बना देते

विवेक आसरी
विवेक आसरी

यूरोप. दूर. ठंडा. पराया. अतीत को खुरचें तो हम पर कब्जा करने वाला. और पीछे लौटें तो हमें मसालों की कीमत चुका अमीर करने वाला. मगर सांस्कृतिक रूप से हमेशा दूर दूर रहा.

लेकिन ये सब का सब पास्ट है, जो टेंस रहा. प्रेजेंट मजेदार है. आपको पूरे यूरोप में देसी मिल जाएंगे. हमें भी मिल गए. हमारे देसी. नाम विवेक आसरी. जर्मनी में रहते हैं. और उन्होंने वादा किया है कि यूरोप के किस्से-कहानियां, सियासत और समाज के खूब नजारे दिखाएंगे. हमें. आपको.

वादे के मुताबिक वो लाए हैं ‘डाक यूरोप’ की एक नई किस्त. ये वाली किस्त है द्राईलांडरपुंक्त के बारे में. वो जगह, जहां तीन देशों के बॉर्डर मिलते हैं. पढ़िए, हो सकता है इन रास्तों पर आपको भी कुछ सुकून मिले…


Daak Europe

मैं एक अद्भुत जगह पर खड़ा था. नहीं नहीं, जगहों पर खड़ा था. तीन-तीन जगहों पर. एक साथ तीन जगहों पर. एक साथ एक ही वक्त तीन अलग-अलग देशों में. मेरा एक पांव नीदरलैंड्स में था, दूसरा बेल्जियम में और धड़ जर्मनी में था. इस जगह को द्राईलांडरपुंक्त (Dreilaenderpunkt) कहते हैं. यानी तीन देशों के मिलन का पॉइंट.

द्राईलांडरपुंक्त की एक और तस्वीर
द्राईलांडरपुंक्त की एक और तस्वीर

कहने तो को भारत में ही ऐसी कितनी जगह हैं, जहां तीन देश मिलते हैं, लेकिन द्राईलैंडरपुंक्त खास है, क्योंकि आप यहां से जहां चाहें, जा सकते हैं. मतलब आप जर्मनी से आए हैं, तो कोई बात नहीं. नीदरलैंड्स की ओर उतरने वाली सड़क पर उतर जाइए. कुछ ही दूर हॉलैंड का छोटा सा कस्बा है माष्टरिष्ट. वहां जाकर कॉफी पीजिए और फिर लौट जाइए जर्मनी को. या फिर बेल्जियम के जंगलों की ओर उतर जाइए. वहां सैर कीजिए. मजे से घूमिए.

भारत-पाकिस्तान के बॉर्डर की एक तस्वीर
भारत-पाकिस्तान के बॉर्डर की एक तस्वीर

उस जगह पर खड़ा मैं सोचता रहा. क्या भारत में कभी ऐसा हो पाएगा. आपका मन हुआ, जाकर लाहौर के फोर्ट रोड पर अंदाज रेस्ट्रॉन्ट में लंच कर आए और फिर आकर अमृतसर में लस्सी पी ली. क्या कभी ऐसा हो सकता है कि डेरा बाबा नानक के गुरुद्वारे में मत्था टेक कर कार उठाई और जा पहुंचे उस पार करतारपुर. रावी के किनारे चाय की चुस्कियां लेने. ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि जम्मू का बंदा सियालकोट में दुकान कर ले? पास ही तो है. जम्मू में घर लेकर रहे, क्योंकि वहां घर बढ़िया हैं, लेकिन अपना धंधा सियालकोट में करे.

कश्मीर
कश्मीर

लगता है द्राईलैंडरपुंक्त में मेरा दिमाग खराब हो गया था. मुझे एक ख्याल याद आ रहा है. अरसे पहले किसी ने कहा था मुझसे. जानता हूं कि राजनीतिक तौर पर आपको इस तरह के ख्याल देशद्रोह लग सकते हैं. लेकिन एक बार, ऐसे ही सुन लीजिए. यूं समझकर सुन लीजिए कि विदेश जाकर उल्टे-सीधे ख्याल याद आते हैं लोगों को. तो ख्याल ये है कि क्यों न ऐसा हो कि कश्मीर, जो भारत के कब्जे में है और कश्मीर, जो पाकिस्तान के कब्जे में है, दोनों को मिलाकर कश्मीर नाम का एक मुल्क बना दिया जाए. वे लोग अपनी सरकार चुनें, अपना राज चलाएं, जैसे उन्हें रहना है रहें. और बॉर्डर खोल दिए जाएं. भारत, कश्मीर और पाकिस्तान, तीनों के बॉर्डर खुले हों. लोग आएं, जाएं. द्राईलैंडरपुंक्त पर फोटो खिचाएं. पिकनिक मनाएं.

बॉर्डर, जिसके एक तरफ नीदरलैंड है और दूसरी तरफ बेल्जियम
बॉर्डर, जिसके एक तरफ नीदरलैंड है और दूसरी तरफ बेल्जियम

यूरोप के लोगों ने यही कर रखा है. ऐसा नहीं है कि यहां मुल्कों के या धर्मों के झगड़े नहीं हैं. यहां का इतिहास तो खून से ऐसा सना है कि नफरतों में जीना चाहें, तो मारकाट खत्म ही न हो. अभी तो फ्रांस, नीदरलैंड्स और पोलैंड में वह पीढ़ी जिंदा है, जिसने जर्मनी का कहर सहा है. जब जर्मनी की टीम नीदरलैंड्स में खेलने जाती है, वहां के दर्शक नारे लगाते हैं, ‘हमारी साइकल वापस करो.’

दरअसल, दूसरे वर्ल्ड वॉर के दौरान जर्मन सैनिक नीदरलैंड्स वालों की साइकल छीन लेते थे. लोहे को पिघलाकर हथियार बनाने के लिए. तब से नीदरलैंड्स के लोग जर्मनी वालों को चिढ़ाने के लिए यह नारा लगाते हैं. लेकिन सीमाएं खुली हैं. लोग आते हैं, जाते हैं. एक-दूसरे को छेड़ते हैं. एक-दूसरे के साथ धंधा करते हैं. बॉर्डर्स पर फौजें तैनात नहीं रहतीं. सरकारों के बीच घोर राजनीतिक असहमतियां भी हैं. अपनी जगह हैं. सीमाएं नहीं हैं. दुश्मनियां नहीं हैं. आजादी के नाम पर शहादतें नहीं हैं. रबर की गोलियां और पत्थर नहीं हैं. सेना की वर्दी में बलात्कार नहीं हैं और सिर पर मजहब का कफन बांधे हत्यारे नहीं हैं.


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