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गांवों में कोरोना से लड़ना है तो इन उपायों पर अमल कर ले सरकार

इस ख़बर में हम बचाव के बारे में बात करेंगे. कैसा बचाव? कोविड से बचाव. कोविड की दूसरी लहर के अब गांवों में पहुंच जाने की ख़बरें आने लगी हैं. इस लहर से बचाव तो करना ही है, साथ ही जिस तीसरी लहर की आशंका जतायी जा रही है, उससे भी बचाव करना है.

तीसरी लहर कब आएगी? इस सवाल का अभी तक जवाब नहीं है. लेकिन बचाव के तरीक़ों को जानने के पहले देखिए दूसरी लहर कितनी भयावह हो रही है.

ख़बर नम्बर एक :

यूपी का रायबरेली. इंडियन एक्सप्रेस की एक ख़बर बताती है कि यहां के सुल्तानपुर खेड़ा गांव में एक महीने के भीतर 17 लोगों की मौत हो गयी. इन 17 में से सिर्फ़ 2 की ही कोरोना जांच रिपोर्ट पॉज़िटिव आयी थी. बाक़ी 15 अस्पताल नहीं गए. लिहाज़ा सरकारी रिकार्ड में आयीं सिर्फ़ 2 मौतें.

ख़बर नम्बर दो :

जिला गौतमबुद्धनगर. गांव का नाम जलालपुर. इंडिया टुडे की ख़बर बताती है कि इस गांव में 14 दिनों के भीतर 18 लोगों की मौत हो गयी. मृत्यु के लिए भी अगर ‘ट्रेंड’ शब्द का इस्तेमाल करें तो वही घटनाक्रम. लक्षण सभी के कोरोना वाले और कम लोगों का टेस्ट.

ख़बर नम्बर तीन :

यूपी का ही शाहजहांपुर. गांव का नाम क़स्बा. दी प्रिंट में प्रकाशित ख़बर के हवाले से बात करें तो एक महीने के भीतर इस गांव में 26 लोगों की मौत हुई. और सरकारी रिकार्ड में ज़ीरो. डॉक्टरों ने कहा कि लोग जांच कराना ही नहीं चाहते. जबकि लोगों का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने में 4-6 दिन लग रहे हैं. रिपोर्ट आने से पहले ही मौतें हो जा रही हैं.

ख़बर नम्बर चार :

हरियाणा का रोहतक. गांव का नाम तितोली. इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित ख़बर बताती है कि सरकारी दावे के मुताबिक़, 10 दिनों में यहां 18 लोगों की मौत हो गयी. कोविड के आंकड़े 6 के ही हैं. लेकिन ग्रामीणों का दावा है कि 40 लोगों की जान जा चुकी है. और सभी में लक्षण कोविड जैसे थे.

आपने उत्तर भारत से आ रही चार ख़बरें देखीं. सवाल ये है कि कोरोना से लड़ने के लिए किस तरह की तैयारियों की ज़रूरत है? गांवों में क्या होना चाहिए? बच्चों को कैसे बचाना होगा? और सरकार से क्या अपेक्षा रखनी है?

Covid Test
गावों में टेस्ट. फोटो: PTI

गांवों में हालात कैसे सुधारें?

कई सारे लोग बताते हैं कि गांवों में लोग अभी भी वैक्सीन लगवाने से बच रहे हैं. कई लोग ये भी कहते हैं कि गांवों में सरकार टेस्ट नहीं करा रही. करा भी रही तो गांववाले ख़ुद ही कोरोना के टेस्ट से भाग रहे हैं. संसाधन सीमित हैं. गांवों में संक्रमण रोकने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने 16 मई को गाइडलाइन जारी कर दीं. फिर भी बड़े शहर या अस्पताल का चक्कर न काटना पड़े, उसके लिए कुछ इंतज़ाम आसानी से किए जा सकते हैं. हमने डॉ. अरुण कुमार शर्मा से इस बारे में बात की. डॉ अरुण कम्यूनिटी मेडिसिन एक्सपर्ट हैं. वो कहते हैं,

“गांवों में इस समय ज़िम्मेदारी तय करने की बात है. गांवों के कई हिस्सों में अभी तक 4G नेटवर्क वग़ैरह नहीं पहुंचा है. ऐसे में सही तो ये है कि सभी गांवों के प्रधान पंचायत भवन में कुछ ऑक्सिजन कंसंट्रेटर की व्यवस्था करें. साथ ही, इलाज की जो इलाज  व्यवस्था शहरों में चल रही है, उसे गांवों में लेकर जाया जाए. कोरोना से बचाव का जो प्रचार हम फ़ोन के कॉलर ट्यून में सुन रहे हैं, वो गांवों में वर्ड ऑफ़ माउथ की तरह रहे. लोग एकदूसरे को बतायें कि बचाव कैसे करना है. अगर लोगों को बचाना है, और तीसरी लहर को आने से रोकना है, तो इतनी न्यूनतम व्यवस्था करनी ही होगी.”

जिस न्यूनतम व्यवस्था की बात डॉक्टर अरुण करते हैं, वही बात कई केंद्रीय अधिकारी भी कहते हैं. केंद्र सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार के. विजयराघवन ने भी मीडिया से बातचीत में कहा है कि यदि दूसरी वेव के समय ठीकठाक तैयारी कर ली गयीं, तो तीसरी लहर से काफ़ी हद तक बचा जा सकता है. ये बात ध्यान देने की है कि ‘तीसरी लहर का आना तय है’ वाला बयान विजयराघवन ने ही दिया था.

बच्चों पर कितना खतरा, और कैसे बचें?

गांव के बाद बच्चों और मूलभूत तैयारियों की बात करते हैं. ख़बरों की मानें तो कोरोना की मौजूदा दूसरी लहर में भारी संख्या में बच्चे भी संक्रमित हुए हैं. उदाहरण के लिए हम उत्तराखंड से आ रही रिपोर्ट देख सकते हैं, जो बताती है कि उत्तराखंड में बीते 10 दिनों के भीतर 1 हज़ार से ज़्यादा बच्चे कोरोना से संक्रमित हुए हैं. देश के दूसरे हिस्सों से भी बच्चों के संक्रमित होने की ख़बरें आ रही हैं. लेकिन ये बात सुखद आश्चर्य है कि इन बच्चों में कोविड के बहुत गम्भीर लक्षण नहीं देखे गए.

लेकिन जानकार मानते हैं कि कोरोनावायरस अगर फिर से म्यूटेट होकर यानी रूप बदलकर कोई ज़्यादा संक्रामक और घातक रूप अख़्तियार कर ले तो उस स्थिति के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता. बच्चे गम्भीर रूप से संक्रमित हो सकते हैं, ऐसी संभावना को नकारा नहीं जा सकता है. ऐसे में बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप शुक्ला बताते हैं कि बच्चों को बचाने के लिए सबसे अधिक ज़रूरी है कि बड़ों को संक्रमण से बचाया जाए, और उनका जल्द से जल्द टीकाकरण किया जाए. वो कहते हैं,

“बच्चों में जो इंफ़ेक्शन आया है, वो बड़ों से आया है. संक्रमण के ट्रांसमिशन की चेन में बच्चे सबसे नीचे हैं. अब अगर अस्पतालों में भर्ती होने की बात करें तो 1-2 प्रतिशत बच्चे ही अस्पताल में भर्ती हुए हैं. बच्चों में भीषणता बहुत कम है. आपको बच्चों को बचाना है, तो सबसे पहले बड़ों को बचाइए. उन्हें संक्रमण से दूर रखिए. उनका वैक्सीनेशन पूरा होना चाहिए. बच्चे अपने आप बच जायेंगे.”

डॉ. प्रदीप बताते हैं कि बच्चों में बीमारी का स्तर थोड़ा अलग है. कोविड से ठीक होने के बाद बच्चों में MSIS यानी multisystem inflammatory syndrome दिखाई दे रहा है. जो काफ़ी हद तक गम्भीर समस्या है. डॉ. प्रदीप बताते हैं कि अभी तक भारत में MSIS के गम्भीर केस बहुत कम देखे गए हैं.

Pilibhit Village
पीलीभीत का एक गांव सेनेटाइ़ज़ होते हुए. फोटो: India Today

लेकिन कुछ डॉक्टर ये भी मानते हैं कि 2 साल से ऊपर के बच्चों की मास्किंग अनिवार्य की जानी चाहिए क्योंकि आगे आने वाले समय में बच्चे कोरोना का निशाना बन सकते हैं. पल्मोनरी यानी फेफड़ों के रोग के विशेषज्ञ डॉ. दीपक शुक्ला बताते हैं,

“अब ये संभावना जतायी जा रही है कि जो तीसरी लहर आएगी, उसमें बच्चे ज़्यादा ख़तरे में रहेंगे. एक ख़ास क़िस्म का रिसेप्टर होता है, जो बच्चों में नहीं होता है, इस कारण से बच्चे अभी तक बचे हुए हैं. ऐसे में तीसरी लहर के पहले 2 साल से ऊपर के बच्चों को मास्क पहनना अनिवार्य करना है. साथ ही कोरोना से बचाव के सभी संभव तरीक़े अपनाने होंगे.”

सरकार की क्या ज़िम्मेदारी है?

टीकाकरण से इतर भी सरकार की ज़िम्मेदारियां हैं. ज़िम्मेदारी ये कि वो कोविड के डेटा को लेकर ज़्यादा पारदर्शी बने. ज़्यादा सच बोले. वैक्सीन के दोनों डोज़ के बीच का समयांतराल क़िल्लत के आधार पर नहीं बल्कि पारदर्शी और सभी के लिए उपलब्ध वैज्ञानिक शोध के आधार पर होना चाहिए, ये भी ज़िम्मेदारी सरकार से अपेक्षित है. इसके अलावा सरकार को क्या करना चाहिए, इस बारे में डॉ. दीपक कहते हैं,

“अब सरकार को डॉक्टरों और स्किल्ड लेबर की नियुक्ति पर ध्यान देना चाहिए. अभी जितनी व्यवस्था है, इतने में हम तीसरी लहर में नहीं खड़े हो सकते हैं. बड़ी संख्या में बाल रोग विशेषज्ञों को इंगेज करना होगा. साथ ही इस तरह के स्पेशल बेड्स भी बनाने होंगे, जिस पर अडल्ट को सपोर्ट दिया जा सके तो बच्चे को भी सपोर्ट दिया जा सके. ये सारे इंतज़ाम पहले ही करने होंगे, ताकि केसेज़ जब एक साथ आएं, तो सबकुछ फिर से बैठ न जाए.”

लब्बोलुआब ये कि समीकरण बदला नहीं है. हाथ साफ़ रखना है, मास्क पहनना है, घर में एक और बाहर दो. दूरी बनाए रखनी है. इंतज़ाम करना है और सरकारी इंतज़ामों की सुध भी लेनी है. और इस बीमारी को लेकर हरसंभव तरीक़े से चेतावनी जारी करते रहना है, ताकि हम कोरोना की इस लहर और आगे आने वाली सभी लहरों के प्रति सचेत रह सकें.


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