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क्या है जातिगत जनगणना, इससे फायदा होगा या नुकसान?

हम अपनी आज की बातें शुरू करेंगे, लेकिन उससे पहले देखिए ये विडियो. विडियो पुराना है. लोकसभा का है. भाजपा के यूट्यूब चैनल पर इसका ये हिस्सा हमें मिला.

विडियो साल 2010 का है. बीजेपी के दिवंगत नेता गोपीनाथ मुंडे जाति आधारित जनगणना के पक्ष में तर्क दे रहे हैं. कह रहे हैं कि अगर ओबीसी जातियों की गिनती नहीं हुई तो उनको न्याय देने में और 10 साल लग जाएंगे. ये तब की बात है जब कांग्रेस सत्ता में थी और बीजेपी विपक्ष में. गोपीनाथ मुंडे जैसे बीजेपी के ओबीसी चेहरों ने ज़ोरशोर से जातीय जनगणना की मांग की थी. पर बीजेपी जब सत्ता में आती है तो रुख बदल जाता है. पिछले महीने संसद के मॉनसून सत्र के दौरान सरकार से जातीय जनगणना पर सवाल पूछा गया था. सवाल था कि 2021 की जनगणना जातियों के हिसाब से होगी या नहीं? नहीं होगी तो क्यों नहीं होगी. सरकार का लिखित जवाब आया. कहा कि सिर्फ एससी, एसटी को ही गिना जाएगा. यानी ओबीसी जातियों को गिनने का कोई प्लान नहीं है. कहने का मतलब ये है कि केंद्र की सत्ता में जो भी पार्टी होती है, वो जातीय जनगणना को लेकर आनाकानी करती है. विपक्ष में जब ये पार्टियां होती हैं तो जातिगत जनगणना को मुद्दा बनाती हैं. तो असल में ये जाति जनगणना का पूरा राजनीतिक खेल क्या है. इसके पक्ष और विपक्ष में तर्क क्या हैं. इस पर बात करते हैं. लेकिन पहले जातीय जनगणना और ओबीसी पॉलिटिक्स का थोड़ा बैकग्राउंडर.

1931 में हुई थी जातिगत जनगणना

अंग्रेज़ों के दौर में भारत में जातियों के हिसाब से लोगों को गिना जाता था. आखिरी बार 1931 में जाति जनगणना हुई थी. 1941 में भी जाति जनगणना हुई, लेकिन आंकड़े पब्लिश नहीं हुए थे. इसकी वजह तब के जनगणना कमीशनर एम डब्ल्यू यीट्स ने बताई थी कि पूरे देश की जाति आधारित टेबल तैयार नहीं हो पाई थी. इसके बाद अगली जनगणना से पहले देश आज़ाद हो गया था. 1951 में सिर्फ अनुसूचित जातियों और जनजातियों को ही गिना गया. यानी अंग्रेज़ों वाले जनगणना के तरीके में बदलाव कर दिया. जनगणना का ये ही स्वरूप कमोबेश अभी तक चला आ रहा है. संविधान लागू होने के साथ ही में एससी-एसटी के लिए आरक्षण शुरू हो गया था. अब पिछड़े वर्ग की तरफ से आरक्षण की मांग उठने लगी थी. पिछड़े वर्ग की परिभाषा क्या हो, कैसे इस वर्ग का उत्थान हो, इसके लिए नेहरू सरकार ने 1953 में काका कालेलकर आयोग बनाया था. इस आयोग ने पिछड़े वर्ग का हिसाब लगाया. जाति के आंकड़ों का आधार था 1931 की जनगणना. हालांकि कालेलकर आयोग के सदस्यों में इस बात पर सहमति नहीं बनी की पिछड़ेपन का आधार जातिगत होना चाहिए या आर्थिक. कुल मिलाकर ये आयोग इतिहास की एक घटना भर रहा, पिछड़ों को लेकर कोई नीतिगत बदलाव इस आयोग के बाद नहीं हुआ.

अब आइए 1978 में. मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार ने बीपी मंडल की अध्यक्षता में एक पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया. दिसंबर 1980 में मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट दी. तब तक जनता पार्टी की सरकार जा चुकी थी. मंडल आयोग ने 1931 की जनगणना के आधार पर ही ज्यादा पिछड़ी जातियों की पहचान की. कुल आबादी में 52 फीसदी हिस्सेदारी पिछड़े वर्ग की मानी गई. आयोग ने पिछड़े वर्ग को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 27 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश की. मंडल आयोग की रिपोर्ट पर 9 साल तक कुछ नहीं हुआ. 1990 में वी पी सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की एक सिफ़ारिश को लागू कर दिया. ये सिफारिश अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों में सभी स्तर पर 27 फीसदी आरक्षण देने की थी. तब आरक्षण के खिलाफ खूब बवाल हुआ था. देशभर में प्रदर्शन हुए थे. मामला कोर्ट में भी गया था. सुप्रीम कोर्ट ने भी आरक्षण को सही माना लेकिन अधिकतम लिमिट 50 फीसदी तय कर दी. 1992 का ऐतिहासिक इंद्रा साहनी जजमेंट. इसके बाद 2006 में केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने मंडल पार्ट 2 शुरू किया. इस बार मंडल आयोग की एक दूसरी सिफारिश को लागू किया गया. सिफारिश ये थी कि सरकारी नौकरियों की तरह सरकारी शिक्षण संस्थानों मसलन यूनिवर्सिटी, आईआईटी, आईआईएम, मेडिकल कॉलेज में भी पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिया जाए. इस बार भी बवाल हुआ लेकिन सरकार अड़ी रही और ये लागू भी हुआ.

2010 में आकर जाति आधारित जनगणना की मांग उठी. लालू यादव, शरद यादव, मुलायम सिंह यादव और गोपीनाथ मुंडे जैसे ओबीसी नेताओं ने ज़ोर शोर से ये मांग उठाई. कांग्रेस सरकार इसके पक्ष में नहीं थी. मार्च 2011 में उस वक्त के गृह मंत्री पी चिदंबरम ने लोकसभा में कहा था कि

“जनगणना में जाति का प्रावधान लाने से ये प्रक्रिया जटिल हो सकती है. और जो लोग जनगणना का काम करते हैं –ख़ासतौर पर प्राइमरी स्कूल शिक्षक –उनके पास इस तरह के जातिगत जनगणना कराने का अनुभव या ट्रेनिंग भी नहीं है.”

हालांकि लालू यादव जैसे कांग्रेस के सहयोगियों के दबाव में मनमोहन सरकार को जाति जनगणना पर विचार करना पड़ा. 2011 में प्रणब मुखर्जी की अगुवाई में एक कमेटी बनाई. इसने जाति जनगणना के पक्ष में सुझाव दिया. इस जनगणना को नाम दिया गया- सोशियो- इकनॉमिक एंड कास्ट सेन्सस. 4800 करोड़ रुपये खर्च कर सरकार ने जनगणना कराई. ज़िले वाइज़ पिछड़ी जातियों को गिना गया. जातीय जनगणना का डेटा सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को दिया गया. कई सालों तक इस डेटा की बात नहीं हुई. मोदी सरकार में इस डेटा पर फिर सुगबुगाहट शुरू हुई. जातीय जनगणना के डेटा के क्लासिफिकेशन के लिए एक एक्सपर्ट ग्रुप बनाया गया. इस ग्रुप ने रिपोर्ट दी या नहीं, इसकी जानकारी अब तक नहीं आई है. कुल मिलाकर मोदी सरकार ने भी जाति के आंकड़ों को जारी करना मुनासिब नहीं समझा.

लेकिन कई क्षेत्रीय पार्टियां इस मुद्दे को ठंडा नहीं पड़ने देती. खासकर यूपी और बिहार की पार्टियां. बिहार में अभी पक्ष, विपक्ष की हर पार्टी एक स्वर में जाति जनगणना की मांग कर रही है. यूपी में समाजवादी पार्टी समेत ओबीसी वोट बेस वाली पार्टियां जाति जनगणना की मांग उठा रही हैं. राजनैतिक पार्टियों के अलावा कई बुद्धिजीवी भी लिख रहे हैं कि जातीय जनगणना होनी चाहिए. JNU में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रहे वेलेरियन रोड्रिग्स अंग्रेजी अखबार द हिन्दू में लिखते हैं कि

”जाति जनगणना आज की जरूरत है. जाति जनगणना का उद्देश्य केवल आरक्षण के मुद्दे तक सीमित नहीं है. जाति जनगणना वास्तव में बड़ी संख्या में उन मुद्दों को सामने लाएगी, जिन पर किसी भी लोकतांत्रिक देश को ध्यान देने की जरूरत है. मसलन हाशिये पर रहने वाले लोगों की संख्या कितनी है. यह जानकारी किसी भी लोकतांत्रिक नीति निर्माण के लिए जरूरी है.”

तो जब हमारे देश में आरक्षण की सारी व्यवस्था ही जाति पर आधारित है तो जातियों के डेटा जुटाने में क्यों परहेज होना चाहिए. कई बार कोर्ट्स ने भी आरक्षण को लेकर डेटा पर्याप्त नहीं होने की बात कही. जाति आधारित जनगणना के पक्षधर और क्या तर्क देते हैं. पढ़िए

“देखिए डेटा से कभी किसी को घाटा नहीं होता है. हां ये ज़रूर है कि डेटा से कई बार पता ही नहीं चलता कि सच क्या है. जैसे डेटा तो ये कहते हैं कि इस साल ऑक्सीजन की कमी से किसी की मौत नहीं हुई. तो डेटा की अपनी पॉलिटिक्स है. आरएसएस और भाजपा की विचारधारा की पोजीशन है कि हर जाति हिंदू है और वो कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी एससी एसटी करके हिंदू एकता को तोड़ने की कोशिश करते हैं. रही बात 60 फीसदी की तो मंडल कमीशन भी 52-54 फीसदी कहता है. भाजपा अगर 60 फीसदी की बात स्वीकार कर रहा है तो राम मनोहर लोहिया की संसोपा का नारा था- पिछला पावे 100 में 60. तो आप उस बात को मान रहे हैं कि 60 फीसदी ओबीसी देश में है तो गिनवा लीजिए. लेकिन संसद में मंत्री बताते हैं कि तमाम विवि में जो सीटें खाली हैं और ओबीसी पद पर 100 सीटें भी प्रोफेसर के पद पर नहीं हैं और मंडल कमीशन को भी ये गिन लें तो 3500 से 4000 जातियां हैं जिनके प्रतिनिधित्व देश के विवि में नहीं हैं. हम लोग लोकतांत्रिक देश हैं, हमारा संविधान है. इसमें हमारी जिम्मेदारी है कि जो लोग पीछे रह गए हैं इसलिए इसकी ज़रूरत है. मेरा मानना है कि सबको गिनिए.”

 

 

बहरहाल हम जानते हैं कि जनगणना का मकसद डेटा क्लेक्शन है. डेटा सटीक होगा तो योजनाओं का बेहतर क्रियान्वन हो सकता है.


जातिगत जनगणना पर केंद्र की तो मनाही है पर UPA-2 में इसको लेकर क्या बातें रहती थीं?

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