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भूपेन दा, जिनके गले से सुरों के अमृत में आती थी लोकगीताें की सुगंध

भूपेन हज़ारिका. जिनका गला इतना मीठा था कि उनका एक नाम सुधाकंठ पड़ गया था. सुधाकंठ- जिसके गले में अमृत हो. पूर्वोत्तर के लोकप्रिय कवि, गायक भूपेन दा ने शुरुआत भले ही असमिया लोकगीतों से की, लेकिन हिंदी और हिंदी फिल्मों में कदम रखकर उन्होंने देश भर में लाखों दिलों को अपना बना लिया. उनके गीतों में लोकगीत वाली भीगी मिट्टी की सुगंध थी. 8 सितंबर 2020 को उनके 94वें जन्मदिवस पर संगीतप्रेमियों के ज़हन में बसी इसी सुगंध की खुशबू ने एक बार फिर सुरों के संसार को महका दिया.

भारत रत्न भूपेन हजारिका के नाम पर 26 मई 2017 को देश के सबसे लंबे पुल का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था. कार्यक्रम में बोलते हुए मोदी ने इसकी प्रासंगिकता भी बताई. उन्होंने कहा था कि 9.3 किलोमीटर लंबे इस पुल का नाम भूपेन हज़ारिका के नाम पर इसलिए रखा गया है क्योंक पुल का एक सिरा लोहित नदी के धोला घाट पर उतरता है और दूसरा सदिया में. और सदिया भूपेन हज़ारिका का शहर है.

पुल के उद्घाटन के कार्यक्रम में बोलते प्रधानमंत्री मोदी
पुल के उद्घाटन के कार्यक्रम में बोलते प्रधानमंत्री मोदी

भूपेन सदिया में ही पैदा हुए थे. 8 सितंबर 1926 को. संगीत और केवल संगीत के लिए बने भूपेन हज़ारिका की उम्र बस 10 साल की थी, जब तेजपुर में दो ऐसे लोगों ने उन्हें गाना गाते सुना जो उन्हें स्टूडियो तक ले गए. ये दो लोग थे, पहली असमिया फिल्म बनाने वाले ज्योतिप्रसाद अग्रवाल और मशहूर असमिया क्रांतिकारी कवि बिश्नू प्रसाद राभा. असम के लोकगीतों में से एक बोरगीत गाते हुए हज़ारिका इन दोनों को इतना जंचे कि वो उन्हें अपने साथ कोलकाता के औरोरा स्टूडियो ले गए. जहां भूपेन ने अपना पहला गाना रिकॉर्ड किया. ये गाना सेलोना कंपनी के लिए था. इसके बाद 1939 में भूपेन ने अग्रवाल की फिल्म ‘इंद्रमालती’ में दो गाने गाए. इसके साथ भूपेन चाइल्ड प्रोडिजी बन गए.

लेकिन इस सब के साथ ही भूपेन ने पढ़ाई में भी उतना ही दिल लगाया. खूब पढ़े. गुवाहाटी से इंटर किया और फिर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बीए और एमए किया. और ये दोनों डिग्रियां संगीत में नहीं थीं, राजनीति शास्त्र में थीं. माने पॉलिटिकल साइंस. वही पॉलिटिकल साइंस, जो पुल उनके नाम करने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने भी पढ़ा था. एमए पूरा करके वो ऑल इंडिया रेडियो गुवाहाटी में मुलाज़िम हो गए. 1949 में उन्हें अमरीका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से फेलोशिप मिल गई, मास कम्यूनिकेशन में पीएचडी करने के लिए. उनके जाने के अगले ही साल के 15 अगस्त को एक भूकंप आया सदिया में, जिसने लोहित नदी का बहाव मोड़कर शहर की तरफ कर दिया. देखते ही देखते पुराने शहर का काफी बड़ा हिस्सा लोहित में समा गया था उस साल.

पॉल रॉबसन (फोटोःविकीमीडिया कॉमन्स)
पॉल रॉबसन (फोटोःविकीमीडिया कॉमन्स)

न्यूयॉर्क में भूपेन पॉल रॉबसन से मिले. पॉल रॉबसन एक मशहूर बेस सिंगर थे और अमेरिका के सिविल राइट्स से जुड़े हुए थे. भूपेन ने पॉल को अपना गुरू माना. भूपेन ने ‘बिस्तिर्नो पारोरे’ को रॉबसन के लिखे ओल्ड मैन रिवर की थीम पर ही लिखा था. ‘ओ गंगा बहती है क्यों’ बिस्तिर्नो पारोरे पर ही आधारित  है. भूपेन जब 1953 में वापिस लौटे तो उनके साथ उनकी बीवी प्रियंवदा पटेल और बेटा तेज हज़ारिका भी थे. प्रियंवदा से भूपेन कोलंबिया में मिले थे. वापस आकर भूपेन लेफ्टिस्ट थिएटर इप्टा से जुड़ गए.

1956 से भूपेन ने असमिया फिल्में भी बनानी शुरू कीं. लेकिन पहला प्यार संगीत ही रहा. इनमें गाने लिखने से लेकर कंपोज़ करने और गाने तक सारा काम भूपेन ही करते थे. इससे पूर्वोत्तर में फिल्म उद्योग को बढ़ावा भी मिला और भूपेन की चर्चा सब तरफ होने लगी. लेकिन पूरे देश में भूपेन को तब से जाना गया, जब उन्होंने हिंदी फिल्मों में काम करना शुरू किया.

ये तब हुआ, जब 70 के दशक के शुरुआती सालों में भूपेन हज़ारिका का परिचय कल्पना लाजमी से हुआ. कल्पना की फिल्म ‘एक पल’ का बैकग्राउंड स्कोर भूपेन ने दिया था, जिसे खूब पसंद किया गया था. इस पहली देशव्यापी पहचान के बाद भूपेन ने जब तक काम किया, कल्पना ने उन्हें असिस्ट किया. फिर भूपेन ने हिंदी फिल्मों को अपना ज़्यादातर वक्त देना शुरू किया, तो हिंदी फिल्मों में उनके असमिया गानों का अनुवाद करके शामिल किया जाने लगा. भूपेन के लिखे गाने खासतौर पर इसलिए पसंद किए जाते थे क्योंकि उनमें लोकगीतों वाली भीगी मिट्टी की सुगंध होती थी. अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ संगीत जो संगीतप्रेमी तक पहुंचे तो उसके ज़हन में छप जाए.

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भूपेन के हिंदी में किए काम में सबसे ज़्यादा याद किया जाता है 1993 में आई रुदाली के संगीत को. लोगों के यहां मातम में दहाड़ें मारकर रोने वाली रुदाली, एक शाम को चुपचाप अपने पति की चिता के आगे बैठकर अपने कड़े उतार रही है. बैकग्राउंड से भूपेन की आवाज़ आती है, ‘दिल हूम हूम करे, घबराए..’ ये सीन जिसने देखा, उसके दिमाग में दर्ज हो गया. वो कभी इस गाने को नहीं भूला. इस गाने को लता मंगेशकर की आवाज़ में भी खूब पसंद किया गया.

‘रुदाली’ के अलावा जिन चर्चित फिल्मों में भूपेन दा ने संगीत दिया, उनमें एमएफ हुसैन की ‘गजगामिनी’ भी थी. 2011 में आई ‘गांधी टू हिटलर’ बतौर कंपोज़र उनकी आखिरी फिल्म थी.

फिल्मों में गाने के अलावा भूपेन को असमिया साहित्य में योगदान के लिए भी याद किया जाता है. उन्होंने असमिया में 15 किताबें लिखीं, जिनमें लघु कथाएं, निबंध, बाल कथाएं सब हैं. इसके अलावा उन्होंने 2 दशक तक ‘अमर प्रतिनिधि’ और ‘प्रतिध्वनि’ नाम से मासिक अखबार भी निकाले. फिल्में बनाने, गाने लिखने, कंपोज़ करने के अलावा भी उन्होंने फिल्म उद्योग को काफी कुछ दिया. उन्होंने ही गुवाहाटी में पहला सरकारी स्टूडियो खुलवाया था. भूपेन सेंसर बोर्ड के ईस्टर्न रीजन की अपीलेट अथॉरिटी में भी रहे. एनएफडीसी (राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम) ने जब ईस्टर्न रीजन के स्क्रिप्ट कमिटी बनाई तो उसमें भूपेन को शामिल किया गया.

कला के अलावा भूपेन ने राजनीति में भी अपना हाथ आज़माया. 1967 से 1972 के बीच वह असम विधानसभा में एक निर्दलीय विधायक रहे. इसके बहुत बाद 2004 के आम चुनावों में भूपेन ने भाजपा की तरफ सांसदी का चुनाव लड़ा. लेकिन कांग्रेस कैंडिडेट से हार गए.

भूपेन का पार्थिव शरीर
भूपेन का पार्थिव शरीर

 संगीत, साहित्य और कला की दुनिया को इतना कुछ देने वाले भूपेन हज़ारिका ने अपनी आखिरी सांस 5 नवंबर, 2011 को मुंबई में ली.


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