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कोरोना लॉकडाउन में विस्थापित मज़दूरों की 13 तस्वीरें जो बार-बार रुला देती हैं

बंदीप सिंह
बंदीप सिंह

1971 में चंडीगढ़ में जन्मे बंदीप सिंह एक प्रतिष्ठित संपादकीय और फाइन आर्ट फोटोग्राफर हैं. इन दिनों इंडिया टुडे ग्रुप ऑफ पब्लिकेशंस में ग्रुप फोटो एडिटर के रूप में काम कर रहे हैं. उनकी तस्वीरें टाइम, इंडिया टुडे, द न्यूयॉर्क टाइम्स, बिजनेस वीक, बिजनेस टुडे, और कई अन्य प्रकाशनों में प्रकाशित हुई हैं. उनकी रचनाओं ने वियना के एसेल संग्रहालय, नई दिल्ली के निरंकारी म्यूज़ियम ऑफ़ फ़ेथ और नई दिल्ली स्थित लक्ज़मबर्ग दूतावास के स्थायी संग्रह में जगह पाई है. इसके साथ-साथ उनका कार्य कई देसी-विदेशी म्यूज़ियम्स में भी संग्रहित है. बंदीप नई दिल्ली में रहते हैं. संपर्क – bandeep@intoday.com


लॉकडाउन के पहले कुछ दिनों में मेट्रो सिटीज़ के मज़दूर घर जाने को हुए, लेकिन अनियमितता का ये हाल था कि अफ़रा-तफ़री मच गई. हज़ारों लोग सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने घर, पैदल ही चल पड़े. भीड़ बहुत थी और गाड़ियां एक भी नहीं. इनको कवर करने के लिए बंदीप ने भी इनके साथ 90 किलोमीटर का सफ़र तय किया. उस दौरान कई तस्वीरें खींची और बाद में उन तस्वीरों के बारे में लिखा भी. उन्हीं तस्वीरों में से आइए आपको दिखाते हैं 13 चुनिंदा तस्वीरों को. और जानते हैं इन तस्वीरों के पीछे की कहानी. तस्वीरों के साथ-साथ इस भावनात्मक लेख को अंग्रेज़ी में लिखा भी बंदीप ने ही ही है. मूल लेख आप उनकी फ़ेसबुक वॉल पर जाकर पढ़ सकते हैं. हिंदी में भावानुवाद दर्पण साह का है.


 

विस्थापित उम्मीदों के साथ लंबे किलोमीटर

लगता है कि कोई चुंबक है, जो उन्हें खींच रहा है. मानो पैर और ज़मीन के बीच का घर्षण ख़त्म हो गया. शून्य हो गया. वो बढ़ रहे हैं अपने घर की तरफ़. खिंचे जा रहे हों मानो उम्मीद की एक कतरन की ओर. या महज़ एक अफ़वाह की ओर, कि आगे कोई बस मिल जाएगी.

बच्चे हैं, जो बड़ों के बराबर चलने के लिए, बड़ों से तेज़ चल रहे हैं. माएं हैं, अपने सर पर गठरी रखे हुए. उन हाथों में से एक ने कमर के सहारे दुधमुहें बच्चों को पकड़ा हुआ है. और दूसरा हाथ मुंह के आगे लगे पल्लू को संभाल रहा है. ये माएं पीछे नहीं छूटतीं. किसी की सांस बेदम नहीं होती.

ना हौसले न इरादे बदल रहे हैं लोग,
थके-थके से हैं फिर भी चल रहे हैं लोग.

हर एक की मंज़िल अलग है. ज़ाहिर सी बात है. यूं उन परिवारों ने अपना-अपना समूह बना लिया है… जो देर तक और दूर तक साथ चलेंगे. किसी विस्थापित हो रहे पक्षी के झुंड की तरह. जिसमें कोई कमांड स्ट्रक्चर नहीं फिर भी एक साथ चल रहे हैं, एक साथ सुस्ता ले रहे हैं. फिर से एक साथ आगे चल पड़ते हैं. कुछ बोलने सुनने की ज़रूरत नहीं.

नीला आकाश, सुनहरी रोशनी, संदली हवा. कितना ख़ूबसूरत है सब कुछ. मानो सबको ख़ुश करने के लिए बेताब हो. किसी परीकथा के पहले कुछ पन्नों की तरह. लेकिन अधीर विस्थापितों की एक कतार इस भ्रम को माने आरी की तरह काटती है. आह! ये खून सी बहती विडंबना!


1.

पहली तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)
पहली तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)

बाज दफे, एक जोड़ी आंखे और मौन, कितना कुछ कह जाता है. फिर सारे शब्द बेमानी लगते हैं. आप इस अनकहे को सुनने के वास्ते विस्मय से कैमरे का शटर ऑन करते हो, लेकिन अब… अब, आप सब ‘सुन’ रहे होते हो. कानों से नहीं, अपनी नज़रों से.


2.

दूसरी तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)
दूसरी तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)

एक विशाल ग्रुप में चल रहे लोग… उनकी बाल्टियां, बोरे, झोले और पिट्ठू वग़ैरह ऊपर-नीचे डोल रहे हैं. इन्हीं सबके बीच, एक छोटा दुधमुहां बच्चा. अपनी मां की बाहों में. उसकी मां से इस बच्चे का संतुलन बनाना मुश्किल हो रहा है. उसे सारे इंसान इन परछाइयों में ऐसे लगते हैं, मानो धड़ के ऊपर सर नहीं, बड़े-बड़े बोरे रख दिए गए हों. वो बच्चा जब इन सबकी परछाइयों को देखता है तो मुस्कुरा उठता है.


3.

तीसरी तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)
तीसरी तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)

इधर विस्थापित हो रहे मज़दूरों के सर पर रखे झोलों की छायाकृति. उधर दूर चमकती ऊंची-ऊंची इमारतें. इमारतें, जो अब इनके सर पे रखे बोझ से दागदार है.


4.

चौथी तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)
चौथी तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)

मेरी कार उनके पास से गुज़रती है… उनकी नज़रें कार की तरफ़ मुड़ जाती हैं… कुछ पल के लिए ठहरी रहती हैं. लेकिन सिर्फ़ कुछ पल के लिए ही. फिर वो नज़रें मोड़ लेते हैं. मुझे धीरे हो जाने का डर लगता है… मुझे डर लगता है, कि कहीं उनकी उम्मीदें न जाग जाएं.


5.

पांचवी तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)
पांचवी तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)

फ्लाईओवर पर. कंक्रीट की दीवार की आड़ लिए हुए एक परिवार किसी गाड़ी का इंतज़ार कर रहा है. उस परिवार का एक बच्चा कैमरे को देखकर उठ खड़ा होता है. V साइन बनाता है. फिर उसका भाई भी कुछ ऐसा ही करना चाहता है, वो कैमरे को क्षण भर के लिए देखता है… लेकिन वो बड़ा हो चुका है. स्थिति की गंभीरता समझने लगा है.


6.

छठीं तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)
छठीं तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)

एक अकेला परिवार. चलने और इंतजार करने से बेतरह थका हुआ. सुनसान एक्सप्रेसवे पर दूर से ऐसा दिखता है जैसे गहरे पानी में फंस गया हो. उन्हें अपने घर, आगरा पहुंचना है. आगरा, जो एक गहरी रात के पार है. हमारे पास उनको देने के लिए कुछ भी नहीं है, चंद डाईजेस्टिव बिस्कुटों के सिवा. मैं सोचता हूं, ‘क्या इससे उन्हें और प्यास नहीं लगेगी?’ और हिचकिचाहट से उनके हाथ में पैकेट थमा देता हूं.


7.

सातवीं तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)
सातवीं तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)

जल्द ही मुझे एहसास हो गया कि सबसे बड़ी मुश्किल, पैदल चलने की वजह से नहीं है. थकान के चलते नहीं है. उन जूते चप्पलों के चलते है, जो इतना चलने के लिए नहीं बने थे.


8.

आठवीं तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)
आठवीं तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)

आगे जाने पर एक पांच लोगों का ग्रुप मिला. उसमें से एक को पोलियो है. बैंगनी रंग की शर्ट पहने हुए, और चमचमाती मुस्कान ओढ़े…
‘ऐसे कितनी दूर तक चलने की सोच रहे हो?’

‘आगरा तक.’

‘पर क्यूं’

‘यहां क्या करेंगे? सब पैसे भी ख़त्म हो गए हैं.’

मैं उन्हें 5 मिनट तक फ़ॉलो करता हूं. मदद करना चाहता हूं.

‘ये रख लो. रस्ते में काम आएगा.’ मैं उन्हें 500 रूपये देता हूं.

वो सब रुक जाते हैं, मुझे घेर लेते हैं. दो लोग हाथ जोड़ लेते हैं. ‘इसकी ज़रूरत नहीं है. प्लीज़ ये मत दीजिए. आपने पूछ लिया, यही काफ़ी है.’

जैसे ही वो ये सब कहके चलने लगते हैं और वो पोलियोग्रस्त शख़्स लंगड़ाते हुए आगे बढ़ता है, एक शर्मिंदगी का अहसास मुझे घेर लेता है. कि मैं उनकी कोई हेल्प न कर सका, सिवाय कुछ पैसे ऑफ़र करने के. इन सारी बातों को भुलाने के लिए मैं अपने ड्राइवर से बात करने लग जाता हूं.


9.

नौंवी तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)
नौंवी तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)

क्या ये सच है? एक ढहती दुनिया के ठीक बीच में एक युवा कानों में हेडफ़ोन लगाए, मेटलिक सनग्लास पहने अपने बैग की तकिया लगाकर आराम कर रहा है- जबकि दूसरे लोग इस बात की चिंता में हैं कि उन्हें घर तक के लिए कोई गाड़ी मिल जाए. युवा उन्मुक्तता. एक आभासी द्वीप का एक मिलेनियल निवासी? … टिपिकल इंडिया!


10.

दसवीं तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)
दसवीं तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)

अंधेरा हो चुका है. हम लोग ग्रेटर नोएडा के परी चौक की तरफ़ बढ़ जाते हैं. तीन परिवारों का एक ग्रुप, अपने सामान के साथ सड़क पर बैठा हुआ. और गर्दन उचका-उचकाकर एक बस को खोज रहा है. मैं उनकी तस्वरी लेने के लिए उनके पास में बैठ जाता हूं. आकाश में बारिश वाले बादल इकट्ठा होने लगते हैं. किसी अनहोनी की आशंका सरीखे. एक कोलाहल. नाके पर एक बस खड़ी है. यहां से पता नहीं चलता कि वो भरी है, या ख़ाली. वो सभी बस की तरफ दौर पड़ते हैं. मैं उनके पीछे-पीछे हो लेता हूं. आधे में ही रुक जाते हैं. बस खचाखच भरी है. बच्चों के साथ उसमें अंदर घुसने की कोई संभावना ही नहीं है.


11.

ग्यारहवीं तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)
ग्यारहवीं तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)

मेरी उसी महिला से फिर से मुलाक़ात होती है, जिससे अभी कुछ ही घटों पहले एक्सप्रेस वे में हुई थी. अब उसके चेहरे पर दृढ़ता की जगह चिंता वाले भाव हैं. मुझे उसका बच्चा नहीं दिख रहा. ‘वो छुटकू कहां है?’ मैं इशारों में पूछता हूं. वो अपनी गोद की तरफ इशारा करती है, जहां उसने अपने बच्चे को साड़ी के पल्लू से ठंड से छुपा रखा है. उसी साड़ी के पल्लू का एक हिस्सा वो मास्क की तरह भी यूज़ कर रही है. मैं उसकी तस्वीर नहीं खींच पा रहा. रोशनी पर्याप्त नहीं है. तभी मैंने एक कार को पास आते देखा. और मैं अपने कैमरे को पोज़िशन कर लिया. कि जब कार की हेडलाइट इस महिला के चेहरे पर पड़ेगी…


12.

बारहवीं तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)
बारहवीं तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)

सड़क पर एक बच्चा लेटा हुआ है – दिखने में मध्यमवर्गीय लगता है – अपने बैग पर सर टिकाए. उसकी छोटी बहनें फुटपाथ के किनारे पर बैठी हैं. जैसे ही मैं उसकी तस्वीर लेने के लिए झुकता हूं, उसका शरीर उठने के लिए सजग होता है. लेकिन थकान के चलते नहीं उठ पाता. वो नज़रें हटाकर मेरे और कैमरे के पार देखने लगता है. मानो मैं पारदर्शी हो गया होऊं. ‘हम श्रीनिवासपुरी से चलकर नोएडा (लगभग 18 किलोमीटर) पहुंचे हैं. श्रीनिवासपुरी के हमारे मकान मालिक ने हमें बाहर निकाल दिया था’. एक दुखी मां पीछे से आकर बताती है, ‘ये बच्चे इतना चलने के अभ्यस्त नहीं हैं.’


13.

तेरहवीं तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)
तेरहवीं तस्वीर (साभार: बंदीप सिंह)

यमुना एक्सप्रेसवे से आने वाले फ्लाईओवर, जो नोएडा एक्सप्रेसवे से जुड़ता है, के ठीक नीचे एक बड़ा समूह आराम कर रहा है. अपने गर्दन पर लटके हुए प्रेस कार्ड के साथ मैं कार से बाहर निकलता हूं. वे मुझे कोई सरकारी अधिकारी समझने लगते हैं और आतंकित हो जाते हैं. वे सभी चौंके हुए कबूतरों के समूह की तरह बिखर जाते हैं. रेलिंग फांदकर आगरा की ओर जाने वाले फ्लाईओवर पर चलना शुरू कर देते हैं.

‘कहां जा रहे हो?’ मैं उन नौजवानों के एक समूह से पूछता हूं. वो मुझे फ़ोटो खींचते देख सहज हो गए हैं.

मुझे बताया जाता है, ये समूह गोरखपुर की ओर जाने वालों का है. ग्रेटर नोएडा के परी चौक जा रहा है. कोई बस पकड़ने के वास्ते.

‘लेकिन परी चौक तो उल्टी तरफ़ है. और ये बात उन्हें तब तक पता नहीं चलेगी जब तक कि ये लोग लगभग दो किलोमीटर दूर पुलिस बैरियर तक नहीं पहुंच जाते हैं.’ मैं चिल्लाता हूं, क्योंकि मैं लगभग साठ थके हुए लोगों को अपने सामान और बच्चों के साथ अपने से दूर जाते हुए देखता हूं. दो युवा उनके पीछे-पीछे भागते हैं. चिल्लाते हुए. एक फोन पर किसी को बुलाता है. लेकिन ये लोग चलते रहते हैं. किसी पक्षी के समूह की तरह.

मैं उन्हें असहाय होकर देखता हूं क्योंकि अब वे फ्लाईओवर में लगी सोडियम लाइटों की पीली रोशनी तले लंबी छाया में बदल चुके हैं. सर पर छुटपुट सामान का छायादार रूप. ‘एक मिनट! मैंने ये पहले भी कहीं देखा है.’ विभाजन की ब्लैक एंड वाइट तस्वीरें… सर पर समान रखे हुए शरणार्थियों का एक समूह – मेरे दिमाग़ में एक बिजली सी कौंधती है.

‘ये दूसरा विभाजन है!’ रातों-रात अपने ही देश में बंद संवेदनाओं के शरणार्थी. जैसे कोरोनाग्रस्त मेट्रो शहरों ने इन्हें खांसकर शरीर से बेदख़ल कर दिया हो.

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