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अनुराग कश्यप: जिसकी खाल में कीड़े रेंगते हैं

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हर बाल की खाल की ये छाल भी खा जाए
इसके हाथ पड़ जाए जो महीने-साल भी खा जाए
किसी बेहाल का बचा जो हाल भी बेहाल खा जाए
बेमौत मरते मन का ये मलाल खा जाए
लालू का लाल खा जाए नक्सलबाड़ी की नाल खा जाए
बचपन का धमाल खा जाए बुढ़ापे की शाल खा जाए
हया तो छोड़ो बेहया की चाल भी खा जाए 
और अगर परोसा जा सके तो खयाल भी खा जाए

अनुराग कश्यप. एक खुल्ला सांड. लम्बी सुडौल सींगें. जिसपर उसे गुमान है. सींगें जो कुछ भी भेद सकती हैं. सड़क पर चलता किस और दौड़ जाए, मालूम नहीं. बात चाहे ऐंटी स्मोकिंग डिस्क्लेमर पर सरकार को चुनौती देने की हो या उस देश में जहां टिकट से ज़्यादा पॉपकॉर्न के पैसों से कमाई होती है, वहां साढ़े पांच घंटे लम्बी फिल्म बनाने की हो. मन में आया है तो करना है. दुनिया उसने अपने स्थान विशेष पे टिकाई हुई है. शेषनाग ने तो फिर भी अपने फन पे टिकाई थी.

अनुराग कश्यप. ‘बिहार’ का वो लाला जिसने बहुत पहले ही जान लिया था कि ये दुनिया बड़ी गोल है. वो जिसके नयन पहली रिलीज़ को देखने को तरस गए. जो कामयाबी का पथ निहारते थक गए. जिसके सुनहरे दिन काली रात में ढल गए. जिसका खून सौ में नब्बे काला है. वो जो पक्का बेहूदा है. जिसकी खाल में कीड़े रेंगते हैं. वो जिसकी नीयत में फफूंद की परतें लगी हुई हैं. वो जिसने नाखूनों से खुद के छाले फोड़े हुए हैं. गनीमत है कि जिसका दिल पत्थर हो चुका है. जिसने शाम की चौखट पर सारी शरम छोड़ दी. वो जिसका दिल मनमौजी है. जिसने गोली मारने में नहीं, कह के लेने में अपना विश्वास बनाया रक्खा. 

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अनुराग बिहार के लाला हैं.

अनुराग कश्यप ने अपनी जड़ों को समेट के रक्खा हुआ है. भरपूर खाद-पानी देते हुए. जीवन में पहला सूट बनवाया. अपनी फ़िल्म के प्रीमियर पर पहनने के लिए. ब्लैक फ्राइडे. बॉम्बे बम-ब्लास्ट पर बनाई फ़िल्म. रियल लोकेशंस और असली नामों के साथ. केस अभी अदालत में ही था. कश्यप प्रीमियर पर जाने के लिए अपने फ़्लैट से नीचे उतरा. गेट पर वाचमैन ने बोला कि वापस ऊपर बुलाया गया है. ऊपर पहुंचा तो एक फ़ोन कॉल वेट कर रहा था. फ़ोन पे बात कर वो अपने कमरे में घुस गया. शराब की बोतलें लेकर. तीन दिन तक वही सूट पहने उसी कमरे में बैठा शराब पीता रहा. तीन दिन बाद कमरे से बाहर की दुनिया देखी. फ़िल्म पर बैन लग गया था. फ़िल्म रिलीज़ हुई सालों बाद. लेकिन तब तक भरपूर मात्रा में इसकी पाइरेसी हो चुकी थी.

कश्यप वो डायरेक्टर है जिसे टोरेंट ने बनाया है. जिसकी पहली फ़िल्म पांच के घटिया प्रिंट को लोगों ने यूट्यूब पर देखा है. ऐसा प्रिंट जिसमें आवाज़ और सीन्स के बीच सिंक नहीं है. तमन्ना है कि कभी इत्मीनान से मिलूं तो पेन ड्राइव में पांच डलवा लूं. नो स्मोकिंग बनाई तो बाबा के रोल में पंकज कपूर से बात की. पंकज ने कहा कि ऐंगल सही नहीं है. कश्यप ने कहा पंकज इस फ़िल्म के लिए सही नहीं है. फिल्म कश्यप की थी तो ऐंगल भी कश्यप का होना था. पंकज कपूर की जगह ली परेश रावल ने. और यही अनुराग कश्यप की फ़िल्म इंडस्ट्री में कुल जमा कमाई है. उसकी ज़िद, उसकी इंस्टिंक्ट और उसका मुझे-जो-सही-लगता-है-मैं-करता-हूं-ऐटीट्यूड. वो चाहे भगवान के ख़िलाफ़ हो, समाज के ख़िलाफ़ हो, पुलिस-कानून, या फिर पूरे सिस्टम के ख़िलाफ़ हो. मालूम है. लाइनें सरकार की हैं, फिट कश्यप पर भी बैठती हैं.

anurag kashyap
इनकी फिल्में हमें आईना दिखाती हैं.

ये आदमी अपने पिछवाड़े पर च्यवनप्राश लगाए घूमता है. ओवरटाइम का भी ओवरटाइम करता है. लोगों से मिलता है. उन्हें कहानियां सुनाता है. अपनी शूट की हुई फुटेज तक दूसरों को दिखा देता है. उनसे उनके काम का हाल लेता है. साथी डायरेक्टर्स क्या कर रहे हैं, जानकारी लेता रहता है. बाकी लोग क्या कर रहे हैं, कुछ नया हो रहा है, इसमें अनुराग को एक सुख मिलता है. उसे संतोष होता है कि सब कुछ चल रहा है, रुका हुआ नहीं है. ये वो बच्चा है जो किवाड़े खुले पाकर सीधे बाहर खेलने दौड़ जाता है. आज कश्यप इस बात का अफ़सोस जताता है कि नई नस्ल को खेलने को घास लगी ज़मीन नहीं मिल रही है. क्यूंकि उसकी खुद की अनुराग कश्यप बनने की शुरुआत इन्हीं मैदानों से हुई थी.

अपने में ही बिंधा हुआ, चुप रहने वाला (शराब न पी लेने तक) दुनिया के दोगलेपन पर अपनी फिल्मों में उसे मन भर कोसने वाला, लिखने का कीड़ा और अगले को उसकी औकात बताने का फ़ितूर पाले अनुराग कश्यप हमें अंधेरे में आईना दिखा रहा है. वो चाहे अग्ली के कुकर्म हों या रमन राघव में अंदर तक खखोर कर रख देने वाली भाई-बहन की एक कहानी. इसकी फ़िल्मों में गाली-गलौज होती है. खून उतना ही बहता है जितना इंसानी शरीर में होता है मगर वो सच्चा बहता है. लम्बे शॉट्स मिलते हैं. जब कोई कहता है कि ऑडियंस बोर हो जायेगी तो कहता है होने दो.

शालीनता और संस्कारों की चड्ढी उतार के नंगा हो चुका कश्यप जब इतना सब कुछ कहता-बनाता है तो शायद वो दुनिया से मुखातिब होकर चीख रहा होता है-

इतना भी जो कर न सके तो फिर काहे का गूदा?
तेरी खाल में रेंगें कीड़े, तू सच्चा बेहूदा.


वीडियो देखें:


 

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