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कसाई के हाथ से मेमना भागा औऱ बच्चा हंसा, लेकिन...

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ये बाजू में दिख रही फोटो नितिन ठाकुर की है. इनका मानना है कि आज-कल के ज़माने में आप मनचाहा खा सकते हैं, मनचाहा गा सकते हैं, मनचाहा बजा सकते हैं और तो और अब तो मनचाहा ब्याह भी सकते हैं. लेकिन सबसे मुश्किल जो हो चला है, वो है – ना मनचाहा लिख सकते हैं और ना मनचाहा बोल सकते हैं. तो नितिन को हमने लल्लनटॉप का एक कोना अलॉट कर दिया है, ‘अलख निरंजन’ नाम से. इसमें नितिन हर हफ्ते मनचाहा लिखेंगे – कोई कहानी, कोई किस्सा या कभी-कभी बस ‘मन की बात.’

 


 

पिछला हफ्ता व्यस्त था. बहुत कुछ हुआ. इस आपाधापी में याद तो था कि ‘अलख निरंजन’ के लिए लिखना है लेकिन इत्मीनान से बैठकर लिखने का मौका ही नहीं आया. यूं ही कछ भी चेप देने का मन नहीं था, सो जैसे ही पहली फुरसत मिली मैंने लिख डाला. इस बार मैं आपको एक ऐसे आदमी के दो किस्से बता रहा हूं जिसे दुनिया में सबसे ज़्यादा शोहरत मिली.

दोनों किस्सों को यहां लिख देने का उद्देश्य अलग है. पहला किस्सा इसलिए बता रहा हूं क्योंकि ये वो जज़्बात है जो हर ऐसा आदमी महसूस करता है जिसने आखिरी सीढ़ी से पहली का सफर किया हो, और दूसरे किस्से को साझा करने का मकसद आपको किस्से के अंत में मालूम चलेगा.

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बचपन से उसे मेहनत करने की आदत थी. ना करता तो ज़िंदा बच पाना मुश्किल था. वो अपना देश और शहर छोड़कर परदेस में इसलिए जान खपा रहा था ताकि गरीबी के अभिशाप से जान छुड़ा सके. पांच महीने की जी तोड़ मेहनत के बाद वो फिलाडेल्फिया से ऊबने लगा था. एक हफ्ते की छुट्टी पर जाने का मौका मिला तो उसने ज़िंदगी में पहली बार अमीरों की तरह बर्ताव करने की ठानी. अच्छा एक्टर था इसलिए वैसी एक्टिंग करने भी लगा. तुरत-फुरत एक शोरूम में पहुंचा और पाई-पाई बचाने की कंजूसी के उलट महंगा ड्रेसिंग गाउन और 75 डॉलर का शानदार सूटकेस खरीदा. दुकानदार ने प्रभावित होकर सूटकेस घर पर ही भिजवाने का प्रस्ताव रखा तो उसे अचानक अहसास हुआ कि वो किसी पिरामिड के शीर्ष पर खड़ा है. ज़िंदगी उसके साथ ऐसे अदब से कभी पेश नहीं आई थी.

इसके बाद उसने शहर के सबसे महंगे होटल का रुख किया. डर्बी टोपी पहन कर शान से छड़ी घुमाते हुए उसने होटल एस्टॉर में प्रवेश किया. अमीरी और शानो शौकत के साथ सहज नहीं था इसलिए जगमगाहट देख थोड़ी देर के लिए घबराहट हुई. डेस्क पर संभलकर अपना नाम दर्ज कराया और जब कमरे का एक दिन का किराया पता किया तो पैसा एडवांस में जमा करने की पेशकश की. अब तक सरायों और सस्ते होटलों में ठहरने का तजुर्बा उसका पीछा कर रहा था. गरीबी का भूत चारों तरफ नाच रहा था और वो था कि दौड़े चला जा रहा था.

दमकती लॉबी से गुज़रा तो मन भर आया. कमरे में पहुंचकर बाथरूम के हर आइने और नल का मुआयना करने लगा. हाथों से सब कुछ छूकर देखता रहा. वो अपना हर पैसा वसूल लेना चाहता था. अपने पैसों पर ऐश करने का उसका पहला मौका था. नहा धोकर कुछ पढ़ने की इच्छा हुई लेकिन फोन करके अखबार तक मंगाने का आत्मविश्वास खुद में पैदा नहीं कर सका. कुछ रुक कर कपड़े पहने और बाहर निकल आया. वो किसी सम्मोहन में बंधा डिनर हॉल तक पहुंच गया. वेटर ने एक टेबल तक उसे गार्ड किया और पल भर बाद वो फिर से अदब की दुनिया के पिरामिड पर बैठा था. वेटरों की फौज उसे ठंडा पानी, मेन्यू, मक्खन और ब्रेड पेश कर रही थी. वो बेचारा संभल कर अपनी सबसे उम्दा अंग्रेज़ी बोल रहा था. खा-पी कर उसने एक डॉलर की बड़ी टिप दी.

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वो कमरे में लौट फिर बाहर निकल आया. उसके भीतर कुछ तो था जो बाहर आने को खदबदा रहा था. समझ वो भी नहीं पा रहा था कि ये ज्वालामुखी आखिर किस वजह से फटना चाहता है. चलते-चलते मेट्रोपॉलिटन ओपेरा पहुंच उसने ना जाने क्यों जर्मन ग्रैण्ड ओपेरा का टिकट खरीदा. उसे ये कभी पसंद नहीं था. जर्मन भाषा में ओपेरा चलता रहा और वो ऐसे ही बैठा रहा. जैसे ही रानी के मरने का दृश्य आया अचानक फूट-फूट कर रोने लगा. आसपास कौन है और क्या सोच रहा है उसे कुछ खबर नहीं थी. वो बस रोए चला जा रहा था. वो तब तक रोया जब तक बदन की ताकत बाहर नहीं निकल गई. ये चार्ली चैप्लिन था जिसने बला की गरीबी के बाद पैसे औऱ शोहरत की इंतहां देखी.

***
एक बार आठ-दस साल का चार्ली चैप्लिन लंदन की दुपहरी में घर के बाहर खड़ा था. बस यूं ही गली की हलचल देखकर टाइमपास कर रहा था. तभी उसने देखा कि एक आदमी छोटे से मेमने को पकड़े हुए गली से गुज़र रहा है. गली के सिरे पर कसाईखाना था. अचानक ही मेमना उस आदमी की पकड़ से छूट गया और इधर-उधर भागने लगा. मेमने को भागता देख वो आदमी उसके पीछे दौड़ा. मेमना था कि हाथ ही ना आए. कभी इधर फुदकता तो कभी उधर. गली-मुहल्ले के बच्चे ये नज़ारा देख हंसने लगे. चार्ली ने भी जब छुटकू से मेमने को उस लंबे-चौड़े आदमी को हलकान करते देखा तो पेट पकड़कर हंसने लगा.

पांच-दस मिनट तक ये खेल चलता रहा. आखिरकार मेमना उस आदमी के हाथ लग ही गया. थकान और गुस्से से भरे उस शख्स ने मेमने को बहुत ही क्रूरता से जकड़ा और कंधों पर रख चल दिया. हंसी का दौर थम गया कि अचानक एक ख्याल ने चार्ली को हिलाकर रख दिया. उसे समझ आया कि अभी जो मेमना दौड़ रहा था वो अपनी मौत से बचने की कोशिश कर रहा था. उसका संघर्ष कितना दयनीय लेकिन ठीक उसी वक्त कितना हास्यपूर्ण था. कुछ ही देर बाद मेमना जिबह कर दिया जाएगा. उसकी मुलायम गर्दन को कोई तलवार या बड़ा चाकू झट से काट देगा.

चार्ली चैपलिन (बिना मूंछों के)
चार्ली चैपलिन (बिना मूंछों के)

नन्हा चार्ली कल्पना करने मात्र से विचलित हो उठा. वो भाग कर घर में घुसा और मां की गोद में मुंह छिपाकर रोने लगा. चार्ली को इस हालत में देख मां घबरा गई. उसने प्यार से चार्ली के सिर पर हाथ फेरा. उसके रोने की वजह पूछी लेकिन वो बस रोता गया. अपनी आत्मकथा में चार्ली ने इस घटना का ज़िक्र किया है और बताया है कि कैसे कई बार ज़िंदगी की ट्रेजेडी और कॉमेडी आपस में मिक्स होती हैं. उसने अपनी फिल्मों में भी यही किया.

मैंने इस सूत्र को समझने के बाद उसकी फिल्में देखी तो उसकी दृष्टि और गहराई का कायल हो गया. ये बात इसलिए याद आई क्योंकि एक सुबह मैंने एक कार्टून देखा. उसमें एक पति ने अपनी पत्नी का नया स्कार्फ पंखे से लटकाकर फांसी लगा ली. पत्नी ने पति की लाश देखी तो मुंह से पति के लिए नहीं नये स्कार्फ के लिए फिक्र निकली.

कुछ लोगों को ये मज़ाकिया नहीं लगा होगा. निश्चित ही था भी नहीं. ये मटेरियलिस्टिक हो चुके हम लोगों पर कटाक्ष की कोशिश थी. मैं उनसे असहमत नहीं जो इसे देखकर नहीं हंसे. मैं उनसे भी सहमत हूं जिन्हें इसमें हास्य दिखा. ये जीवन का वही सच है जो चार्ली ने मेमने वाली घटना में खोज निकाला था.

अलख निरंजन.


अलख निरंजन की बाकी किस्तें यहां पढ़ेंः

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