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40 बच्चों को मारने के एक महीने बाद सऊदी अरब को गलती मानना याद आया है

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9 अगस्त को सऊदी अरब ने यमन में स्कूली बच्चों की एक बस पर बम गिराया था. 40 बच्चों की मौत हुई थी. 11 के करीब आम लोग मारे गए थे. कुल मिलाकर 51 लोगों की जान गई थी. अब सऊदी ने माना है कि बस पर बम गिराना उसकी गलती थी.

सऊदी ने गलती क्यों मानी?
ऐसा नहीं कि गलती मानने से कुछ बदल जाए. या कि मारे गए लोग वापस लौट आएं. मगर फिर भी सऊदी का अपनी भूल मानना खबर है. ऐसा नहीं कि महीने भर बाद आकर सऊदी को अपने किए पर एकाएक कोई अफसोस हुआ हो. या बेगुनाहों को मारने पर उसे पछतावा हो रहा हो. ऐसा होना होता, तो बहुत पहले हो गया होता. यमन में सरकार और हूती विद्रोहियों के बीच 2004 से लड़ाई चल रही थी. सितंबर 2014 में हूतियों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया. इसके बाद सऊदी इस लड़ाई में कूद गया. मार्च 2015 में सऊदी ने सरकार की तरफ से यमन पर बम गिराना शुरू किया था. तब से लेकर अब तक ये जंग हजारों की जान ले चुका है.

ये लाइन से जो कब्रें खुदी हैं, वो सऊदी के एयर स्ट्राइक में मारे गए लोगों की ही हैं. वही स्कूल बस पर हुआ एयर स्ट्राइक.
ये लाइन से जो कब्रें खुदी हैं, वो सऊदी के एयर स्ट्राइक में मारे गए लोगों की ही हैं. वही स्कूल बस पर हुआ एयर स्ट्राइक.

यमन में मरने वाले बच्चों का हर दिन का औसत 130 है
मार्च 2015 से लेकर अब तक वहां औसतन पांच बच्चे रोजाना या तो मारे जा रहे हैं या घायल हो रहे हैं. ‘सेव द चिल्ड्रन’ के मुताबिक, अकेले 2017 में ही यमन के कम से कम 5,000 बच्चे मारे गए. तकरीबन 130 बच्चे रोजाना. इसके अलावा चार लाख से ज्यादा बच्चे जानलेवा स्तर पर कुपोषित हैं. करीब 20 लाख बच्चों का स्कूल छूट गया है. इनमें से करीब एक चौथाई, यानी पांच लाख तो सीधे-सीधे जंग की वजह से स्कूल से बाहर हुए. कम से कम 30 लाख यमनी अपना घर छोड़कर रिफ्यूजी हो गए हैं. इस जंग के दौरान तकरीबन 30 लाख से ज्यादा बच्चे पैदा हुए हैं. इन्हें सिवाय जंग, हिंसा और मार-काट के और कुछ नहीं पता. यूनिसेफ के मुताबिक-

यमन में बच्चों की एक पूरी पीढ़ी है, जो हिंसा के सिवाय किसी और चीज को नहीं जानती. जो इस जंग में बचेंगे, वो तमाम उम्र शारीरिक और मानसिक जख्म ढोते रहेंगे.

ये आंकड़े क्यों बता रहे हैं?
ये बताने के लिए कि बच्चों और बेगुनाहों की मौतों पर सऊदी को अफसोस हुआ हो, ऐसी बात नहीं है. इसके पीछे वजह से दबाव. आपको याद है, 2016 में सीरिया के अंदर एक केमिकल अटैक हुआ था. उसमें मारे गए कई सारे बच्चों की तस्वीरें आई थीं. उसको लेकर दुनियाभर में लोगों ने आंसू बहाए थे. 9 अगस्त को यमन में मारे गए स्कूली बच्चों पर ऐसा ही माहौल बना. इसके बचाव में सऊदी का कहना था कि उसके पास बस में हूती विद्रोहियों के होने की खबर थी. उसे मालूम चला था कि विद्रोही बच्चों की आड़ ले रहे हैं. उन्हें शील्ड बना रहे हैं. इसी वजह से उस बस पर हमला किया गया. हालांकि सऊदी गठबंधन की जॉइंट इन्सिडेंट असेसमेंट टीम का ये भी कहना है कि हमला होने में देर हुई. और इसी वजह से मरनेवालों की तादाद इतनी बढ़ी. टीम का कहना है कि इस देरी के पीछे जो भी जिम्मेदार थे, उनका पता लगाया जाएगा.

यमन की इस जंग में सबसे ज्यादा बच्चे ही भुगत रहे हैं. जो मारे जा रहे हैं, वो तो हैं ही. इसके अलावा वो भी हैं जिन्हें खाने को नहीं मिल रहा. जिनका घर-परिवार छिन गया है. जिनका स्कूल छूट गया है.
यमन की इस जंग में सबसे ज्यादा बच्चे ही भुगत रहे हैं. जो मारे जा रहे हैं, वो तो हैं ही. इसके अलावा वो भी हैं जिन्हें खाने को नहीं मिल रहा. जिनका घर-परिवार छिन गया है. जिनका स्कूल छूट गया है.

यमन की जंग ऐसे ही कभी-कभार खबरों में आती है
यमन अरब के सबसे गरीब देशों में से है. वहां चल रही जंग में लोगों का मरना, उनकी भुखमरी, उनकी बीमारियां और ऐसी तमाम चीजें ज्यादातर तो नजरंदाज ही हैं. मगर 9 अगस्त को हुई बमबारी और इसमें हुई बच्चों की मौत पर काफी बातें हुईं. इसकी वजह से पश्चिमी देशों में भी लोगों ने नाराजगी जताई. अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देश जंग में सऊदी की मदद कर रहे हैं. वहां की आबादी इस घटना की वजह से सऊदी के साथ-साथ अपने-अपने देश की सरकारों से भी नाराज हुई. खबर आई कि स्कूली बच्चों पर जो बम गिराया गया, वो मेड इन अमेरिका था. ये बम अमेरिका ने सऊदी को मुहैया कराया था. 227 किलो का ये बम वैसा ही था, जैसा अक्टूबर 2016 में राजधानी सना के एक फ्यूनरल हॉल पर गिराया गया था. उस घटना में 155 लोग मारे गए थे.

अमेरिका ने सीरिया में मारे जा रहे बच्चों पर बहुत संवेदना जताई थी. डॉनल्ड ट्रंप ने तो सीरिया पर मिसाइल अटैक तक कर दिया. ये संवेदना यमन के लिए नहीं आती मगर. कभी-कभी जब चीजें ज्यादा हाइलाइट होती हैं, तब बयान आते हैं.
अमेरिका ने सीरिया में मारे जा रहे बच्चों पर बहुत संवेदना जताई थी. डॉनल्ड ट्रंप ने तो सीरिया पर मिसाइल अटैक तक कर दिया. ये संवेदना यमन के लिए नहीं आती मगर. कभी-कभी जब चीजें ज्यादा हाइलाइट होती हैं, तब बयान आते हैं.

क्या कुछ बदलेगा भी?
ये बात बाहर आते ही अमेरिकी सरकार अपने ही यहां सवालों में घिर गई. लोग अपनी सरकार की यमन पॉलिसी पर सवाल उठाने लगे. अपनी आबादी की इस नाराजगी की वजह से अमेरिका-ब्रिटेन पर दबाव पड़ा. पेंटागन को कहना पड़ा कि अगर सऊदी ने ये नहीं दिखाया कि वो आम लोगों के हताहत होने की घटनाओं को कम करने पर गंभीर है, तो अमेरिका यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ चल रही जंग में सऊदी को दी जा रही सैन्य और खुफिया मदद को घटा देगा. अमेरिका के डिफेंस सेक्रटरी जेम्स मैटिस बोले कि सऊदी को हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए कि कोई भी निर्दोष न मारा जाए. उन्होंने सऊदी को याद दिलाया कि अमेरिका की तरफ से दी जा रही मदद की भी कुछ शर्तें हैं.

2 सितंबर को ब्रिटेन ने कहा-

ब्रिटिश सरकार पिछले महीने यमन में हुए जान-माल के नुकसान पर काफी चिंतित है. अगस्त के पहले दो महीनों के अंदर ही 400 से ज्यादा यमनी लोग मारे जा चुके हैं. इनमें छोटे बच्चे भी शामिल हैं.

ये जो सऊदी का बयान आया है, ये इसी दबाव का नतीजा है. ये ही दबाव है कि सऊदी को अपनी गलती माननी पड़ी है. हालांकि इस बयान के बावजूद ये उम्मीद करना कि यमन में बेगुनाहों का मरना, उन्हें निशाना बनाया जाना बंद हो जाएगा, फिजूल ही है. क्योंकि 2016 में फ्यूनरल हॉल पर बम गिराने को लेकर हुई आलोचना के बाद भी सऊदी ने गलती मानी थी. गिल्ट जताया था. तो क्या इसके बाद यमन में कुछ बदल गया? सऊदी की रणनीति बदल गई? हम जानते हैं कि ऐसा कुछ नहीं हुआ. इसीलिए आगे को लेकर भी उम्मीद नहीं बंध रही है.


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