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पूरे देश में लगेंगे 551 PSA ऑक्सीजन प्लांट, लेकिन ये चालू कित्ते दिन में होते हैं?

कोरोना के बेतहाशा बढ़ते मामले और मेडिकल ऑक्सीजन की भारी कमी. कमी इतनी कि कोरोना के मरीज़ दम तोड़ रहे हैं. राज्य सरकारें लगातार केंद्र सरकार से ऑक्सीजन की मदद मांग रही हैं. इसे देखते हुए देश भर में अब 551 पीएसए ऑक्सीजन प्लांट लगाए जाएंगे. पीएसए प्लांट मतलब, प्रेशर स्विंग अब्सॉर्प्शन ऑक्सीजन प्लांट. ये प्लांट, पीएम केयर्स फंड से बनेंगे. 25 अप्रैल को प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि अस्पतालों में ऑक्सीजन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए पीएम केयर्स फंड में से पैसा जारी करने को मंजूरी मिल गई है. इससे सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में 551 डेडिकेटेड पीएसए मेडिकल ऑक्सीजन जेनरेशन प्लांट लगाए जाएंगे. ये प्लांट विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के जिला मुख्यालयों में चिह्नित अस्पतालों में इंस्टॉल किए जाएंगे.

इससे पहले भी पीएम केयर्स फंड के अंतर्गत 202 करोड़ की लागत से देश में ऐसे 162 ऑक्सीजन प्लांट लगाए जाने थे. राज्य सरकारों को बस उनके इंस्टॉलेशन का पैसा देना था. अस्पताल तक के लिए पाइपलाइन बिछाने का खर्चा ख़ुद अस्पताल को उठाना था. चूंकि 2021 की शुरुआत में कोविड ढलान पर माना गया तो इस काम में लापरवाही बरती गई. इस कारण अब तक सिर्फ 33 प्लांट ही लग पाए हैं.

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल के आखिर तक 59 प्लांट इंस्टॉल होने थे, और मई के अंत तक 89 प्लांट लग जाने थे. अभी अप्रैल बीतने वाला है और सिर्फ 33 प्लांट ही लग पाए हैं. इस परियोजना के लिए केंद्र सरकार ने 201.58 करोड़ रुपये दिए थे. इसमें सात साल की मेंटेनंस लागत भी शामिल है.

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पीएम केयर्स फंड से 202 करोड़ की लागत से देश में 162 ऑक्सीजन प्लांट लगाए जाने थे, लेकिन 33 ही लग पाए.

इस स्टोरी में हम जानने की कोशिश करेंगे कि ऐसे ऑक्सीजन प्लांट लगाने में कितना वक्त लगता? और ये कितने दिन में फंक्शनल हो जाते हैं. सबसे पहले जानते हैं कि ये काम कैसे करते हैं.

पीएसए ऑक्सीजन प्लांट कैसे काम करते हैं?

अस्पतालों में ऑक्सीजन सप्लाई करने के लिए पीएसए ऑक्सीजन प्लांट एक तकनीक का इस्तेमाल करता है. ये तकनीक अपने आस पास की हवा से नाइट्रोजन को अवशोषित करके उसे कॉन्सनट्रेटेड ऑक्सीजन में बदलती है. ये प्लांट नज़दीकी वातावरण के तापमान पर काम करता है और ऑक्सीजन को ट्रैप करने के लिए ज़िओलाइट्स, एक्टिवेटेड कार्बन, मॉलीक्यूलर सीव्स जैसे खास अवशोषक मटीरियल का इस्तेमाल करता है. ये प्लांट मेडिकल ऑक्सीजन के मौजूदा संकट को कम करने में मदद कर सकते हैं.

162 प्लांट लग क्यों नहीं पाए?

द प्रिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इससे पहले 162 पीएसए ऑक्सीजन प्लांट लगाने के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अंडर आने वाली इंडिपेंडेंट बॉडी – सेंट्रल मेडिकल सर्विस सोसायटी (CMSS) को नोडल एजेंसी बनाया गया था. इसने पिछले साल सरकारी अस्पतालों में ऐसे प्लांट लगाने के लिए टेंडर जारी किए थे. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दिसंबर में ऑर्डर दे दिया गया था, लेकिन जब वेंडर ये ऑक्सीजन प्लांट लगाने पहुंचे तो उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा. कई जगहों पर कहा गया कि प्लांट लगाने के लिए जगह नहीं है. हालांकि रिपोर्ट में एक इंडस्ट्री सोर्स ने बताया कि इसका कारण कुछ लोगों का निहित स्वार्थ है. क्योंकि उन लोगों को साइट पर ऑक्सीजन पैदा करने के बजाय ऑक्सीजन खरीदने से ज्यादा मुनाफा हो रहा था.

पीएसए प्लांट लगवाने वाले अस्पताल मालिकों ने दी प्रिंट को बताया कि सिलेंडर ऑक्सीजन से पीएसए प्लांट की ऑक्सीजन सस्ती है. एक प्लांट जो रोज़ 24 सिलेंडर गैस सप्लाई कर सकता है, उसे इंस्टॉल करने में करीब 33 लाख रुपये की लागत आती है. ये काम कुछ ही हफ्तों में पूरा हो जाता है.

ये प्लांट लगवाने का हिसाब-किताब क्या है?

सामान्य दिनों की बात करें तो 240 बेड वाला एक हॉस्पिटल, जिसमें 40 ICU बेड होते हैं, वो महीने में ऑक्सीजन पर पांच लाख रुपए खर्च करता है. इंडस्ट्री के सूत्रों का कहना है कि ऐसे अस्पताल में एक पीएसए प्लांट लगाने का खर्चा 50 लाख रुपए तक आएगा. विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर उपकरण मौजूद हों तो पीएसए प्लांट को एक महीने में इंस्टॉल किया जा सकता है.

अगर ऑक्सीजन की क्वालिटी की बात करें तो इंडस्ट्री के एक्सपर्ट क्या कहते हैं? उनके मुताबिक, पीएसए प्रोसेस से पैदा ऑक्सीजन के मुकाबले, क्रायोजेनिक तकनीक से पैदा हुई लिक्विड ऑक्सीजन ज्यादा शुद्ध होती है. ये लिक्विड ऑक्सीजन 99 परसेंट और पीएसए वाली ऑक्सीजन 93 परसेंट शुद्ध होती है.

Psa Oxygen Plant
अगर उपकरण मौजूद हों तो PSA प्लांट को लगाने में एक महीने का वक्त लगता है.

दी लल्लनटॉप ने एसोचैम के प्रेसिडेंट विनीत अग्रवाल से बात की. उनका क्या कहना था, जानिए. उन्होंने कहा –

मेरी समझ से, एक प्लांट आने में चार हफ्ते और इंस्टॉल होने में हफ्ता – 10 दिन लग जाते हैं. प्लांट का साइज अलग-अलग होता है. जितनी रिक्वायरमेंट है उसके हिसाब से प्लांट डिजाइन होते हैं. जहां तक जगह की बात है तो ये प्लांट की क्षमता पर निर्भर करता है कि एक प्लांट लगाने के लिए कितनी जगह चाहिए. सबसे छोटे प्लांट की कीमत 40 से 50 लाख के करीब होती है. 

विनीत अग्रवाल बताते हैं कि 5 परसेंट सरकारी अस्पतालों में भी ये प्लांट नहीं हैं. अगर अस्पतालों में पीएसए प्लांट होता और लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन बैकअप के लिए रखते तो आज ऑक्सीजन की किल्लत नहीं होती. वे कहते हैं कि सामान्य परिस्थितियों में तो ठीक है कि आप ऑक्सीजन के लिए मार्केट पर निर्भर रहें, लेकिन इस तरह के हालात में नहीं. हर हॉस्पिटल के पास अपना प्लांट तो होना ही चाहिए. जब हम देश के हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को बदलने की बात करते हैं तो शुरुआत इसी तरह की चीजों से होनी चाहिए.


Video: PM केयर फंड से दिल्ली को 8 ऑक्सीजन प्लांट्स के लिए मदद की गई, पर कुछ काम नहीं हुआ!

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