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ये काम की बातें नहीं जानी तो इंश्योरेंस में सब ठीक होने के बाद भी क्लेम नहीं देगी कंपनी

इंश्योरेंस लेते समय आपने अगर कुछ झोल किया था. मसलन अपनी मेडिकल कंडीशन वगैरा छिपाई है तो कंपनी क्लेम रिजेक्ट करेगी ही सही. लेकिन कई ऐसी कंडीशन भी हैं जिनकी वजह से सब कुछ सही होते हुए भी आपका क्लेम रिजेक्ट हो सकता है.

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सब ठीक फिर भी इंश्योरेंस क्लेम रिजेक्ट.

आपके पास इंश्योरेंस है, अच्छी बात है. आप उसका प्रीमियम टाइम से भरते है, बहुत अच्छी बात है. अब किसी भी वजह से आपको इस इंश्योरेंस को क्लेम करने की जरूरत पड़ गई. मसलन गड्डी का एक्सीडेंट हो गया या फिर बीमार पड़ गए. लेकिन संबंधित कंपनी ने आपका क्लेम रिजेक्ट कर दिया. इतना पढ़कर आप कहोगे, ये तो गंदी बात है. टाइम पर प्रीमियम भर रहा फिर भी कंपनी कैसे क्लेम रिजेक्ट कर सकती है? कर सकती है जनाब. और इसका आपके इंश्योरेंस लेने के पहली वाली शर्तों से कोई लेना-देना नहीं है.

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माने कि इंश्योरेंस लेते समय आपने अगर कुछ झोल किया था, मसलन अपनी मेडिकल कंडीशन वगैरा छिपाई है तो कंपनी क्लेम रिजेक्ट करेगी ही. लेकिन कई ऐसी कंडीशन भी हैं जिनकी वजह से सब कुछ सही होते हुए भी आपका क्लेम रिजेक्ट हो सकता है. इनको जान लीजिए तभी इंश्योरेंस लेने का फायदा मिल पाएगा.

गाड़ी तेरा 'भाई' नहीं चलाएगा

इस डायलॉग से आप परिचित होंगे ही सही. किसी भी प्रकार का नशा करके गाड़ी चलाना वैसे भी कानूनी अपराध है. इसलिए ऐसा करना ही नहीं है. वैसे ऐसा करना गाड़ी चलाने वाले के लिए तो खतरनाक है ही, रास्ते पर चलने वालों के लिए भी बहुत रिस्की है. टल्ली होकर गाड़ी चलाने पर आपको तीन-तरफा नुकसान होगा. गाड़ी का इंश्योरेंस नहीं मिलेगा और साथ में हेल्थ इंश्योरेंस भी भूल जाइए. मौत होने पर टर्म इंश्योरेंस भी नहीं मिलेगा मतलब परिवार को भी दिक्कत होगी. एक्सीडेंट में अगर किसी और को कुछ हुआ है तो उसका पैसा भी आपका ही लगेगा. जेल भी होगी. पढ़कर अगर डर लगा तो अच्छी बात है. डरना भी है और पीकर हेवी ड्राइवर भी नहीं बनना है.

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why insurance companies reject claims: top reasons
नशा करके गाड़ी नहीं चलाना है  

चेतावनी: शराब पीना, नशा करना स्वास्थ के लिए हानिकारक है.

सिर्फ अपना इंश्योरेंस काफी नहीं

पता है-पता है, आप कहोगे तो क्या सबका ठेका आपका है. नहीं जनाब, हर कोई अपना-अपना देखेगा. लेकिन जो आपके साथ में बाइक में बैठा है उसका ध्यान आपने ही रखना होगा. माने कि एक्सीडेंट हो गया और आपका इंश्योरेंस है तो कंपनी सारा खर्च वहन करेगी. लेकिन हो सकता है पीछे बैठी सवारी के लिए मना कर दे. इसकी वजह pillion कवर या पैसेंजर कवर का नहीं होना है. इसलिए इंश्योरेंस लेते समय ये वाला कवर भी जरूर लें. इसका प्रीमियम कोई बहुत ज्यादा नहीं होता, लेकिन मुसीबत का खर्चा हमेशा ज्यादा ही होता है.

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पीछे बैठने वाले का ख्याल रखें 
लिमिट की वाकई लिमिट है

आप बीमार हुए और अस्पताल में भर्ती हुए. आपके पास 5 लाख का इंश्योरेंस है और आपका बिल भी 3 लाख का बना. लेकिन आपको 2 लाख जेब से भरना पड़ रहे क्योंकि कंपनी ने आपका इंश्योरेंस रिजेक्ट कर दिया है. ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि लिमिट के अंदर लिमिट वाला झोल. डिब्बे के अंदर डिब्बे वाली कहानी. इसे कहते हैं सब-लिमिट जो कंपनी ने लगा रखी है. मतलब कई बीमारियों पर कंपनी पूरा कवर नहीं देगी. 20-30-50 फीसदी आपको देना होगा. इसलिए जब भी इंश्योरेंस लें, इसके बारे में जरूर पूछ लें. कौन सी बीमारी पूरी कवर है और कौन सी आधी-अधूरी.

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डोले-शोले का लालच

चिंता नक्को, हम आपको कसरत करने और जिम में पसीना बहाने से नहीं रोक रहे. जितनी मर्जी उतनी मेहनत कीजिए, बस साइड वाला रास्ता मत अख्तियार कीजिए. बोले तो डोले-शोले बनाने के लिए स्टेरॉयड लेना बहुत भारी पड़ेगा. आप किसी भी वजह से क्लेम ले रहे हैं, लेकिन अगर आपकी हेल्थ रिपोर्ट में स्टेरॉयड आया तो कंपनी ने आपको ना बोल देना हैं. दरअसल इंश्योरेंस कंपनियां उस बीमारी का कवर देती हैं जो अपनेआप होती है. जो आप स्टेरॉयड ले रहे तो वो खुद से बीमारी को हेलो बोलना हुआ. इसलिए इसका ध्यान रखें.

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स्टेरॉयड नहीं लेना 
आतंकवादी हमले की जिम्मेदारी नहीं

हालांकि ये बहुत अजीब किस्म की कंडीशन है, मगर अधिकतर कंपनियां आतंकवादी हमले पर टर्म इंश्योरेंस क्लेम नहीं देती हैं. इसलिए इंश्योरेंस लेते समय इसके बारे में पूछ लीजिए. कहने का मतलब सिर्फ इंश्योरेंस होना ही काफी नहीं है. तमाम नियम और शर्तें पता होने पर ही फायदा होगा. अगर खुद से सब समझ सकते हैं तो अच्छा, नहीं तो किसी एक्सपर्ट की मदद लेने में भी कोई बुराई नहीं.

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