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दिनभर ऐप-ऐप खेलते हैं, पहले जरा ऐप की A, B, C, D तो समझ लीजिए!

परत दर परत दर परत...ऐप न हुआ प्याज़ हो गया.

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ऐप की परतें

टैक्सी ऑर्डर करनी है, ऑफ़िस से चूहे भगाने हैं, रसोईघर साफ करवानी है, गाने सुनने हैं - हर चीज के लिए कोई न कोई ऐप आपके मोबाइल या ऐप स्टोर में मौजूद है. अपने The Lallantop ऐप को तो आप जानते ही हैं जो आपको दुनिया से जोड़े रखता है. लेकिन आपने कभी सोचा कि आपके मोबाइल फोन की स्क्रीन पर जो ये ऐप दिखता है वो आखिर बला क्या है. पर जो ऊपर दिखता है वो बहुत छोटा हिस्सा है. उसके अलावा ऐप की चार और परतें होती हैं जो आपको दिखती नहीं. आइए इनके क ख ग से लेकर क्ष त्र ज्ञ तक जानिए.

यूजर इंटेरफेस (UI)

ये वो परत है जिससे आपका सामना सबसे पहले होता है. यूजर इंटेरफेस मतलब ऐप के ऊपरी कपड़े. यूज़र इंटरफेर किसी भी डिवाइस को इस्तेमाल करने वाले और डिवाइस के बीच बातचीत का जरिया होता है. मशीन तो इंसानी भाषा को नहीं समझती, ऐसे में User Interface(UI)आपके दिए हुए निर्देश सिस्टम को बताता है. जैसे मान लें आपको किसी भी डिवाइस पर कुछ निर्देश दिखाई देते हैं. यह निर्देश ग्राफिक ,बटन या फिर स्विच के रूप में भी हो सकते हैं. जब आपको मशीन को कोई निर्देश देना होता है आप उस ऑप्शन को टच करते हैं या बटन दबाकर मशीन को कमांड देते हैं तो आपके और मशीन के बीच में कम्युनिकेशन यानी बातचीत होती है. इसी कम्युनिकेशन को UI कहते हें.

ऐप UI
एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (API)

इसके नाम से थोड़ा-बहुत अंदाजा आपको लग गया होगा. एप्लीकेशन को रन करने के लिए अंदर का सिस्टम. जैसे हमारे शरीर में दिल, फेफड़े और किडनी होती हैं. स्मार्टफोन में ऐप और इंटरनेट के बीच का पुल है API. जब भी आप किसी ऐप पर कोई काम करते हैं तो आपका डेटा इंटरनेट तक पहुंचने से पहले एक सर्वर पर जाता है. ये प्रोसेस दो तरफा होती है, मतलब जब इंटरनेट से आपके पर कोई जानकारी आती है तो पहले इसी सर्वर पर जाती है और वहां से आपके ऐप पर. मान लीजिए आप एक होटेल में गए और आपने एक पिज़्ज़ा आर्डर किया. वेटर रसोई घर में जायेगा और शेफ़ से पिज़्ज़ा बनाने को कहेगा. शेफ़ पिज़्ज़ा बनाकर वेटर को देगा और वेटर वो पिज़्ज़ा आप तक पहुंचाएगा. 

डेटाबेस (Database) 

ये किसी ऐप की सबसे जटिल परत हो सकती है. इसके नाम से लगेगा जैसा ऐप से जुड़ी सारी जानकारी यहीं सेव होगी. लेकिन ऐसा नहीं है. यहां जानकारी सेव नहीं होती बल्कि यहां से ये तय होता है कि आपकी जानकारी कैसे प्रोसेस होगी. कहने का मतलब वो फ़ाइल की शक्ल में होगी या फ़ोल्डर के जैसे. ये आमतौर पर कुकीज की शक्ल में भी हो सकती है. ऐप के अंदर डेटाबेस और कुछ नहीं बल्कि आपकी जानकारी जैसे यूजर आईडी, पासवर्ड का वो संग्रह है जिसका उपयोग सुधार करने, अपडेट करने और हटाने के लिए होता है. इसका नियंत्रण आमतौर पर डेटाबेस मैनेजमेंट सिस्टम (DBMS) से किया जाता है. 

लॉजिक (Logic)

ऐप का लॉजिक भी इसके हिन्दी अर्थ जैसा ही है. जैसे हर बात के लिए आपके और मेरे तर्क अलग-अलग हो सकते हैं वैसे ही ऐप के अंदर लॉजिक होता है. आपकी जानकारी इंटरनेट पर कैसे जाएगी वो ऐप की लॉजिक वाली परत ही तय करती है. ऐप भले एक हो लेकिन हर यूजर के हिसाब से ये अलग-अलग होता है. हर जानकारी के लिए कुछ कुछ कोड होते हैं. ये डेटाबेस से जानकारी लेकर ऐप के साथ कम्युनिकेशन बनाता है. मसलन ऐप पर आपका नाम भले राजू हो लेकिन लॉजिक में ये एक यूनीक कोड की तरह सेव होता है. तकनीक की जुबान इस रिश्तेदारी को Object Relational Mappings (ORM) कहते हैं जो मूलतः ऐप की सुरक्षा के लिए जरूरी है.

होस्टिंग (Hosting)

किसी भी ऐप की आखिरी परत कहलाती है होस्टिंग, लेकिन अपने नाम से बिल्कुल अलग. किसी के घर जाएंगे तो होस्ट आपको सबसे पहले मिलेगा लेकिन ऐप में ये जनाब सबसे अंत में बैठे होते हैं. यही वो जगह है जहां आपका डेटा सेव होता है. ऐप पर आपसे जुड़ी हर जानकारी यहीं सेव होती है. आपका पूरा कच्चा-चिट्ठा यहीं मिलेगा. ऐप पर आपने क्या किया, कितने बार लॉगिन किया, यहां तक की कितने बार आपने कीबोर्ड को पीटा. सब का जमाखाता यहीं होता है. ऐप का ये मेजबान स्मार्टफोन से लेकर कंपनी के सर्वर तक और दूसरे बैकअप के तौर में बड़ी-बड़ी हार्ड ड्राइव में ही हो सकता है. 

ऐप की वर्णमाला तो आपने जान ली, अब जल्दी से हमारा ऐप भी डाउनलोड कर लीजिए अगर अभी तक नहीं किया हो. लिंक ये रहा. 

 

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