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गलती से हुई मिस्टेक ने टेक जगत में ये सब कमाल कर डाले

टेक से लेकर हेल्थ जगत में धूम मचाने वाले कई प्रोडक्ट्स शुरुआत की नाकामी का नतीजा हैं.

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नाकामी से बने प्रोडक्ट, जो आज कमाल कर रहे. (image-pexels)

अक्सर गलती होने पर क्या होता है. अक्सर क्या, हमेशा ताने पड़ते हैं और मुमकिन हुआ तो सजा भी मिलती है. लेकिन टेक की दुनिया में कई बार इसका उल्टा होता है. गलती से मिस्टेक हुई, शुरू में नाकामी हासिल हुई लेकिन आखिरी परिणाम शानदार निकला. पूरी संभावना है कि एक ऐसे ही शानदार रिजल्ट के साथ आप हमारी खबर पढ़ रहे हों. नहीं समझे. हम बात कर रहे हैं माउस की. हां जी, माउस की खोज पहले-पहल नाकामी ही थी. आज बात ऐसे वैज्ञानिकों और उनकी असफलताओं की, जो आगे चलकर मील का पत्थर साबित हुईं.

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AR/VR हेडसेट

AR/VR मतलब ऑगमेंटेड रियलिटी और वर्चुअल रियलिटी. आज कहां है, वो बताने की जरूरत नहीं. जिसे देखो, वही हेडसेट बना रहा. फ़ेसबुक की पेरेंट कंपनी मेटा तो अपना यूनिवर्स ही बसाने निकली है इसकी बदौलत. Metaverse की कल्पना भी AR/VR हेडसेट के बिना संभव नहीं. Apple के VR हेडसेट का बाजार भी खूब गर्म है. अब आया या तब आया. लेकिन जैसा हमने कहा. पहला 3डी हेडसेट तो सालों पहले 1957 में बन गया था. डिवाइस का नाम था सेंसोरामा. जिसको बनाया था मॉर्टन हेलिग ने. दरअसल मॉर्टन तो सिनेमा प्रेमियों के लिए एक ऐसा डिवाइस बना रहे थे, जो लाइव एक्सपीरियंस दे सके. दूर की सोच रखने वाले मॉर्टन आज के जमाने वाला 4डी एक्सपीरियंस साठ के दशक में देना चाहते थे. मतलब परदे पर पानी गिरे, तो सीधे सीट पर गीलापन महसूस हो. 

मॉर्टन ने डिवाइस बनाया और बड़ी उम्मीद लेकर जाने माने कार निर्माता हेनरी फोर्ड के पास जा पहुंचे. फोर्ड ने साफ मना कर दिया. निराश मॉर्टन हेलिग ने सेंसोरामा को अपने घर के बगीचे में फेक दिया. तीन साल बाद हेलिग ने अपने प्रोडक्ट में कुछ बदलाव किए और उसको टेलिस्फ़ियर मास्क के नाम से पेटेंट कराया. आगे चलकर ये डिवाइस ही नए जमाने के हेडसेट का आधार बना. लेकिन दुख की बात है कि हेलिग इस इंडस्ट्री का हिस्सा नहीं बन सके. बेचारे 1997 में दुनिया को अलविदा कह गए. इतना जान लिया, तो ये भी बता देते हैं कि आज वर्चुअल रियलिटी का बाजार 170 अरब डॉलर का है.

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वर्चुअल रियलिटी अरबों का कारोबार है (image-pexels)
पेसमेकर को पेस कैसे मिली

पेसमेकर, मतलब करोड़ों लोगों की ज़िंदगी बचाने वाला डिवाइस. आविष्कार हुआ ‘आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास स्टाइल में’. मतलब सुननी थी दिल की धड़कनें, लेकिन बना डाला पेसमेकर. विल्सन ग्रेटबेच नाम के शख़्स दिल की इलेक्ट्रिकल तरंगों को सुनने की कोशिश कर रहे थे और उन्होंने गलत रेसिस्टर इस्तेमाल कर डाला. मशीन को इलेक्ट्रिकल तरंगे रिकॉर्ड करनी थीं, लेकिन हुआ उल्टा और रेसिस्टर ने इलेक्ट्रिकल तरंगे जारी करना शुरू कर दिया. 

ऐसे बना पेसमेकर. अब ये बताने वाली बात तो है नहीं कि गुजरे साठ सालों में पेसमेकर लाखों लोगों की जान बचा चुका है. हालांकि, दूसरे लोगों से इतर ग्रेटबैच बड़े भाग्यशाली रहे. उनकी कंपनी आज भी दुनिया भर में इस्तेमाल किए जा रहे पेसमेकर डिवाइसों में से 90 फीसद डिवाइसों की बैटरियां बना रही है. विल्सन खुद लंबी उम्र पाकर 92 साल की उम्र तक जिए.

माउस कैसे क्लिक हुआ

साल था 1960 और बंदा था डगलस एंगलबार्ट. डगलस उस समय स्टेनफॉर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे. उनको दिव्य ज्ञान हुआ कि लोग कंप्यूटरों का इस्तेमाल ढंग से नहीं कर रहे. हुआ यूं था कि उस दौर में माउस के नाम पर जॉय स्टिक जैसा एक बड़ा सा डिवाइस इस्तेमाल होता था. कल्पना करके देखिए कैसा लगता होगा! डगलस ने अपना इंजीनियरिंग वाला दिमाग लगाया और बना दिया  'बग' नाम का एक नया प्रोडक्ट. 

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'बग' में लगे थे दो पहिए जो कंप्यूटर पर दिख रहे कर्सर को कंट्रोल करते थे. 'बग' कितना शानदार प्रोडक्ट था, इसका अंदाजा इसी बात से लग जाएगा कि साल 1966 में नासा ने इसको इस्तेमाल किया. डगलस ने नवंबर 1970 में इसका पेटेंट भी हासिल किया, लेकिन स्टेनफॉर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट के नाम पर. यहां तक कि अपने एक और साथी बिल इंग्लिश के साथ मिलकर सेन फ्रांसिस्को में एक हजार लोगों के साथ सामने बाकायदा इसको चलाकर भी दिखाया. कहानी एक दम परी कथाओं जैसी लग रही थी, लेकिन पांच साल के अंदर एंगलबार्ट को पैसे का सपोर्ट मिलना बंद हो गया. उनकी टीम के ज़्यादातर सदस्य स्टेनफॉर्ड छोड़कर चले गए. इनमें बिल इंग्लिश भी शामिल थे, जिन्होंने ज़ीरॉक्स में काम करना शुरू किया. 

कुछ सालों के बाद ज़ीरॉक्स में बिल कि मुलाकात हुई स्टीव जॉब्स से. स्टीव माउस का आइडिया सुनकर इतने उत्सुक हुए कि उन्होंने अपनी टीम से कहा कि जो भी कर रहे हैं, उसे तुरंत बंद करके माउस को दोबारा बनाकर एप्पल प्रॉडक्ट के रूप में लॉन्च करो. हालांकि ऐसा हुआ नहीं क्योंकि पेटेंट तो स्टेनफॉर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट के पास था. बेचारे डगलस एंगलबार्ट को भी कुछ नहीं मिला. लेकिन आगे जाकर उनके डिजाइन पर ही माउस बने. अगर एंगलबार्ट को स्टीव जॉब्स का साथ मिल जाता, तो माउस सालों पहले घर-घर में पहुंच जाता. 

वीडियो: शानदार फीचर्स के नाम पर कहीं स्मार्टफोन मकर्स आपको बेवकूफ तो नहीं बना रहे!

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