ऐसा करने के लिए उन्होंंने एक नए और ताकतवर जीनोम एडिटिंग टूल का सहारा लिया. इस टूल का नाम है CRISPR-Cas9. कुछ ही साल पहले खोजी गई इस तकनीक से इंसानी जीन्स बदले जा सकते हैं. इसका इस्तेमाल मनचाहे बच्चे पैदा करने के लिए भी होने लगा है.
हालांकि इस चाइनीज़ रिसर्चर के दावे की कोई स्वतंत्र जांच नहीं हुई है. लेकिन इसके के दावे से पूरी दुनिया चौंक गई है. ये तकनीक मानवता के भविष्य को पूरी तरह बदल सकती है.

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साइंसकारी के इस ऐपिसोड में हम जीनोम एडिटिंग तकनीक की बात शुरू करें उससे पहले कुछ बुनियादी बातें समझ लेते हैं
ये जीन, जीनोम और DNA क्या है?
इस दुनिया में हर जीव की बुनियाद उसका DNA है. DNA यानी डीऑक्सी-राइबोन्यूकलिक-एसिड. यही वो सीक्रेट कोड है जिसमें किसी जीव की बनावट लिखी होती है. पेड़-पौधे, मच्छर या मनुष्य. हर जीव की पहचान उसका DNA तय करता है. DNA बायोलॉजी की दुनिया का आधार कार्ड है.
DNA के खास हिस्सों को जीन कहते हैं. यही जीन्स आपके माता-पिता से आप तक ट्रान्सफर होते हैं. जीन वंशागति (Heredity) की बुनियादी इकाई है. इन्हीं से किसी जीव को अपनी विशेषताएं मिलती हैं.

कुछ वायरस का आधार DNA नहीं RNA होता है. लेकिन वायरस को जीव कहा जाए या नहीं, इस बात पर बहस है.
किसी जीव के सारे जेनेटिक मटेरियल को जीनोम कहते हैं. DNA से जो कुल जमा निकलकर आएगा, उसे कहते हैं जीनोम. ये जीव की बनावट का पूरा का पूरा इंस्ट्रक्शन मैनुअल है.
इस इंस्ट्रक्शन मैनुअल में बदलाव करने वाली टेक्नोलॉजी को जीनोम एडिटिंग कहते हैं. एडिटिंग यानी छेड़खानी करना. जैसे थ्री इडियट्स में रैंचो ने लाइब्रेरियन दुबे की स्क्रिप्ट एडिट कर दी थी. या जैसे आप अपनी फोटो एडिट कर लेते हैं. जीनोम एडिटिंग टेक्नोलॉजी से किसी भी जीव का जेनेटिक कोड बदला जा सकता है. जीनोम एडिटिंग, जीन एडिटिंग या DNA एडिटिंग सब एक ही चीज़ को कहा जाता है.
जैसे फोटो एडिटिंग के कई सॉफ्टवेयर होते हैं, वैसे ही जीनोम एडिटिंग के भी कई टूल हैं. जीनोम एडिटिंग कई दशकों से हो रही थी. लेकिन पुराने तरीके बहुत ही जटिल हुआ करते थे. 2012 में दुनिया के सामने CRISPR-Cas9 टेक्नोलॉजी आई.

रैंचो की इस एडिटिंग के बाद चतुर को बहुत पेला गया.
बैक्टीरिया से क्या सीखा?
CRISPR-Cas9 सबसे बेहतरीन जीनोम एडिटिंग टूल है. इसे बोलचाल की भाषा में क्रिस्पर कहा जाता है. इसके सहारे बहुत आसानी से जीनोम में बदलाव किए जा सकते हैं. जैसे हम किसी टेक्स्ट मैसेज में कट-कॉपी-पेस्ट कर लेते हैं, वैसे ही क्रिस्पर से जीनोम में कट-कॉपी-पेस्ट हो जाता है. पहले के मुकाबले ये टेक्नोलॉजी बहुत तेज़, सस्ती और सटीक साबित हुई.
क्रिस्पर-कैस9 को दो महिला वैज्ञानिकों ने मिलकर तैयार किया. इमैनुएल शार्पेंटिए और जेनिफर डॉडना. इन दोनों को इस खोज के लिए 2020 का कैमिस्ट्री नोबेल प्राइज़ मिला. इस खोज की कहानी बहुत रोचक है. ये जीनोम एडिटिंग टेक्नोलॉजी हमने एक बैक्टीरिया से सीखी है.
दरअसल, बैक्टीरिया और वायरस दो बहुत सूक्ष्म जीव. ये लोग हमारे शरीर पर हमला करके हमें बीमार बनाते हैं. लेकिन इनकी आपस में भी नहीं बनती. करोड़ों साल से बैक्टीरिया और वायरस आपस में लड़े जा रहे हैं.

हमारे शरीर पर हमला करने वाले सूक्ष्म जीव आपस में भी लड़ते हैं.
वायरस से बचने के लिए बैक्टीरिया ने अपना इम्यून सिस्टम तैयार कर लिया. कुछ बैक्टिरिया ने एक खास तरह का डिफेंस सिस्टम तैयार किया. ये बैक्टीरिया अपने अंदर स्पेशल प्रोटीन बनाने लगे. इन्हें नाम मिला क्रिस्पर असोसिएटेड प्रोटीन. शॉर्ट में Cas (कैस).
ये प्रोटीन कैंची की तरह काम करते हैं. जैसे ही कोई वायरस बैक्टीरिया पर हमला करता है, ये कैंची उस वायरस से DNA का एक हिस्सा काटकर रख लेती है. DNA के इस हिस्से से एक RNA तैयार किए जाते हैं. यूं समझिए कि ये RNA उस DNA की फोटोकॉपी है, जिसकी मदद से अगली बार उस हमलावर वायरस को पहचान होगी.
बैक्टीरिया के अंदर एक सुपारी किलर होता है, इसका नाम है Cas 9 (कैस 9). इस सुपारी किलर को वो RNA वाली फोटोकॉपी थमा दी जाती है. जब वायरस दोबारा हमला करता है, तो बैक्टिरिया का सुपारी किलर कैस 9 उसे तबाह कर देता है. इस तरह ये क्रिस्पर कैस 9 सिस्टम बैक्टीरिया को वायरस के हमले से बचाता है.

बैक्टीरिया हमला करते हैं, तो हमें ऐंटीबायोटिक खाने की सलाह दी जाती है.
DNA एडिट कैसे करते हैं?
2012 में वैज्ञानिकों ने ये सीख लिया कि इस सिस्टम को अपने हिसाब से कैसे इस्तेमाल करें. उन्हें पता चला कि बैक्टीरिया के अंदर पाए जाने वाले सुपारी किलर से आसानी से किसी भी जीव का DNA कटवाया जा सकता है.
क्रिस्पर-कैस9 जीनोम एडिंटिंग में दो चीज़ें बहुत अहम होती हैं.
पहली चीज़ है कैस9. ये अपना सुपारी किलर है. इसे जेनेटिक सिज़र यानी DNA काटने वाली कैंची भी कहा जाता है. ये DNA में किसी बताई जगह पर बहुत सटीक ढंग से कटाई करता है.
दूसरी चीज़ है गाइड RNA. जैसे सुपारी किलर को फोटो दी जाती है, वैसे ही कैस9 को ये गाइड RNA थमा दिया जाता है. इसी गाइड RNA से कैस 9 को पता चलता है कि DNA में कहां कैंची चलानी है.

जीन एडिटिंग से हम खुद के रचयिता हो जाएंगे.
जब बताई गई जगह से DNA का हिस्सा कट जाता है, उसके बाद इसे बदलने का काम शुरू होता है. हमारे अंदर की कोशिकाएं (सेल) इस DNA को रिपेयर करने की कोशिश करते हैं. साइंटिस्ट लोग DNA रिपेयरिंग मशीनरी के ज़रिए अपनी मर्ज़ी से DNA बदल लेते हैं. इस तरह वो DNA में से किसी भी जगह को बदल लेते हैं. उसे एडिट कर लेते हैं.
दिक्कत क्या है?
ये जीनोम एडिटिंग टेक्नोलॉजी हमारे बहुत काम की है. इससे जेनेटिक बीमारियों का इलाज किया जा सकता है. कैंसर जैसी तमाम बीमारियों से लड़ने में मदद मिल सकती है. ऐसी फसल तैयार की जा सकती है, जो सूखे का सामना कर सके. ऐसे फल बनाए जा सकते हैं, जो लंबे समय तक फ्रैश रहें. मच्छरों को ऐसा बनाया जा सकता है, जिनसे मलेरिया न हो. सोचिए अगर DNA ही बदला जा सकता है, तो क्या नहीं हो सकता? लेकिन इसे लेकर कई चिंताएं भी हैं. खासकर मनुष्यों के ऊपर होने वाले प्रयोग को लेकर.

फिर हेरा फेरी फिल्म का बहुचर्चित मीम टेम्प्लेट.
हर तरह की कोशिकाओं में जीनोम एडिटिंग की जा सकती है. दिक्कत तब आती है, जब जर्म सेल्स (Germ Cells) की बात होती है. जर्म सेल्स यानी वो कोशिकाएं जो मनुष्यों के शुक्राणु और ऐग्स में होती हैं. इनमें किए जाने वाले बदलाव आने वाली पीढ़ियों में भी ट्रांस्फर होते हैं. जब डिज़ाइनर बेबी वाला मामला सामने आया, तो क्रिस्पर की नैतिकता सवालों के घेरे में आ गई.
डिज़ाइनर बेबी वाला मामला
चीन में शेन्झेन नाम का एक शहर है. शेन्झेन में सदर्न यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी है. 2018 में इस यूनिवर्सिटी की एक टीम कुछ प्रयोग कर रही थी. इस टीम का नेतृत्व कर रहे थे हे जियांकुई. इन्होंने सात कपल्स को एक प्रेगनेंसी संबंधित क्लिनिकल ट्रायल का हिस्सा बनाया.
इस दौरान हे जियांकुई ने मानव भ्रूण के जीन्स में बदलाव किए. इन्होंने भ्रूण से CCR5 जीन हटाने की कोशिश की. इन्हें उम्मीद थी कि ऐसा करने से बच्चा HIV के लिए प्रतिरोध हासिल कर लेगा. यानी उस भ्रूण से पैदा होने वाले बच्चे पर एड्स के वायरस का असर नहीं होगा. ये ट्रायल सात जोड़ों के भ्रूण पर किया गया था. सात में से एक भ्रूण पर ये एक्सपेरिमेंट सफल रहा. इस भ्रूण से दो जुड़वा बच्चियां पैदा हुईं. जियांकुई ने दावा किया कि ये पहले ‘डिज़ाइनर बेबी’ हैं. इन बच्चियों में एड्स और कोलेरा जैसी कई बीमारियों के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता थी.

चीन के कॉन्ट्रोवर्शियल रिसर्चर हे जियांकुई.
ये हे जियांकुई के किए दावे थे. लेकिन इनके दावों की कोई स्वतंत्र जांच नहीं हुई. इसके बावजूद इस घोषणा से साइंटिफिक कम्युनिटी में हल्ला कट गया. सबसे बड़ा सवाल था कि क्या कोई अपनी मर्जी के मुताबिक बच्चे डिज़ाइन कर सकता है?
किसी को नीले रंग की आंखें चाहिए. किसी को लंबाई चाहिए. किसी को गोरा चमड़ी का रंग चाहिए. किसी को बुद्धिमान बच्चे चाहिए. क्या हमें ये चुनाव अपने हाथ में ले लेना चाहिए या प्रकृति को ये तय करने देना चाहिए.
अगर इसे लीगल कर दिया गया, तो कुछ बच्चे दूसरे बच्चों से बहुत ही अलग होंगे. इससे समाज में एक और खाई पैदा हो जाएगी. इन्हीं चिंताओं के चलते इसकी नैतिकता पर सवाल उठाए जाते हैं. ये ज़रूरी सवाल हैं. और इनका जवाब हमें ही खोजना है.























