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एक कविता रोज़: त्रिभुवन की कविता - अरावली के आखिरी दिन

त्रिभुवन की ये कविता सोचने पर मजबूर कर देती है कि कैसा उजाड़ हो सकता है हमारा और हमारी पृथ्वी का भविष्य.

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अरावली के आखिरी दिन एक मधुमक्खी परागकणों के साथ उड़ते-उड़ते थक जाएगी. सभी बहेलिए जाल को देखकर उलझन में पड़ जाएंगे.

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