
A bearded Vettori
इंडियन टीम के कोच के लिए डेनियल विटोरी का नाम आते ही आप शंकाओं से घिर जाते हैं. न्यूज़ीलैंड का एक स्पिनर, जिसे देख के मैंने दाढ़ी बढ़ानी शुरू की, जो बेहद चॉकलेटी, क्यूट सा लगता है, इंडियन टीम का कोच बन सकेगा? और बन सकेगा तो क्या वो कर सकेगा जो कभी जॉन राइट और गैरी कर्स्टन कर गए. हमने ग्रेग चैपल और डंकन फ्लेचर के रूप में दो धोखे खाए हैं. क्या ये भी एक जुआं नहीं होगा?
अगर न्यूज़ीलैंड टीम में विटोरी को देखें तो पायेंगे कि उनकी कप्तानी में न्यूज़ीलैंड की टीम अपने खेल में अच्छी-खासी गिर गयी. मगर इस दौरान कोई अगर सबसे ज़्यादा उठा तो स्वयं डेनियल विटोरी. डेनियल विटोरी की कप्तानी, डेनियल विटोरी के लिए सबसे मुफ़ीद समय था. मगर ऊपरी तौर पर टीम के लिए कतई नहीं. चूक कहां हुई, एक बार में बताना मुश्किल है. टीम के कम्पोज़ीशन से लेकर टीम लीडरशिप में झोल आये. न्यूज़ीलैंड के लिए अग्रेशन कोई अनजाना शब्द नहीं रहा है. अग्रेशन भी पूरी तरह कंट्रोल्ड. मगर यहां डेनियल से उम्मीद करना बेकार था. वो हमेशा अपनी शांत, सौम्य छवि के साथ मैदान पर अपने विरोधियों से मिले. और यही हाल उनकी लीडरशिप में भी रहा. धोनी को क्रिकेट वर्ल्ड में एक जगह जहां उनके शांत और सुलझे हुए ऐटीट्यूड के लिए जाना जाता है, वहीँ उनकी कप्तानी में दुनिया जहान का अग्रेशन मिलता है.
वहीँ दूसरी ओर, टीम इंडिया का एक्सरे करें तो हम पाएंगे कि टीम एकदम कच्ची है. कई नए खिलाड़ी हैं और अभी भी आपस में तालमेल बिठा रहे हैं. हमने एक अरसे से टेस्ट सीरीज़ नहीं खेली है. और ऐसे में टी-20 के ओवरडोज़ से टेस्ट में नए खिलाड़ियों और कोच के साथ किसी टीम का उतरना ऐसा ही होगा जैसे पहली बार कोई स्विमिंग पूल में उतरा हो. साथ ही ये भी ध्यान रखना होगा कि आने वाले वक़्त में बहुत ही जल्द टीम का नेता अपनी कुर्सी खाली कर सकता है. ऐसे में उसकी जगह एक नए चेहरे को लेनी होगी जिसे हम सभी मन ही मन अपनी सहमति दे ही चुके हैं. विटोरी के लिए इन हालातों में एक विकट सिचुएशन को झेलना पड़ेगा. वो सिचुएशन होगी गीली मिट्टी को आकार देना. तेज़ घूमती चाक पर. एकदम कुम्हार जैसे. ऐसे कुम्हार बनने की खातिर गीली मिट्टी के कई ढेरों को बर्बाद होना पड़ता है. हम चाहते हुए भी टीम इंडिया को वो गीली मिट्टी का ढेर नहीं बनते देख सकते. विटोरी की बैंगलोर टीम को दी गयी कोचिंग के आधार पर ही इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि वो ऐसे कुम्हार बनने के नज़दीक भी नहीं हैं.
इंडियन टीम नयी और कुछ कच्ची है. ऐसे में नयी खेप को एक फादर-फिगर की ज़रुरत होती है. वो कप्तान हो सकता है. वो कोच हो सकता है. टीम में उस वक़्त जब नेतृत्व बदलने को है, ये ज़िम्मेदारी कोच पर आ धमकती है. ऐसे में कोच अगर विटोरी बनते हैं तो उन्हें इस रोल में सोच पाना वाकई मुश्किल है. विटोरी एक अच्छे मार्गदर्शक बन सकते हैं लेकिन वो लीडर नहीं बन सकते. कोच में लीडर बनने की क्षमता अगर न हो तो वो डंकन फ्लेचर बन कर रह जाता है. टीम के साथ है या नहीं, मालूम ही नहीं चलता.
कई बार ऐसा होता है कि हमें एक सिचुएशन दी जाती है और हमारा पहला ही ख्याल उसे नकार देता है. आपकी गट-फ़ीलिंग उस विचार को नकारने लगती है. आप किसी भी तरह से खुद को उस विचार से सहमत नहीं पाते हैं. ऐसा ही कुछ डेनियल विटोरी के साथ भी हो रहा है. इंडियन टीम का कोच बनने की बात आते ही एक बहुत बड़ा सा 'न' आपकी आंखों के सामने नाचने लागता है. राहुल द्रविड़ का उपलब्ध होना इस 'न' की एक ख़ास वजह हो सकती है. विटोरी बहुत कुछ हासिल करने के बावजूद इंडियन टीम के कोच के लिए मिस-फ़िट मालूम देते हैं.

A better choice for the position


















