कट टु, 15 जनवरी 2017. इंडिया वर्सेज़ इंग्लैंड. पुणे. पहला वन डे मैच. जीतने को 351 रन. इस बार 50 ओवर में. धोनी के आउट होते ही लगा मैच गया. कोहली अकेले क्या करते? स्कोर बड़ा था इसलिए पार्टनरशिप ज़रूरी थीं. कम से कम दो बल्लेबाजों को तो चलना ही था. अभी तक ऐसा नहीं हो पा रहा था. लेकिन केदार जाधव ने साहस दिखाया. कोहली से तेज़ गेम खेला. कोहली से कम डॉट बॉल्स खेलीं. सेंचुरी मारी. कोहली का पूरा साथ दिया. बीच में कोहली की डांट भी सुनी. एक नहीं कई बार. कोहली इस कदर फिट हैं कि नहीं होने वाले रन भी चुरा सकते हैं. मगर जाधव में वो फुर्ती नहीं है. उन्हें सोचना पड़ता है. मैच में भी उसे सोचना पड़ रहा था. करीबी सिंगल्स लेने से मना किये. हर बार कोहली की घुड़की मिलती थी. कोहली उस वक़्त एकदम निष्ठुरता से जाधव को ट्रीट कर रहे थे. और जाधव की हर बाउंड्री पर चीख कर उसे शाबाशी भी दे रहे थे. जाधव की सेंचुरी पर जाधव से ज़्यादा खुशी कोहली को थी. क्यूंकि उन्हें वही चाहिए था. उसे चाहिए था कि कोई उस वक़्त उसका साथ दे सके. ऐसा लग रहा था जैसे कोहली को पहले से ही मालूम था कि उसकी सेंचुरी लगनी तय है. उसे तो बस साथ चाहिए था. "जानता हूं, आपको सहारे की ज़रूरत नहीं है. मैं तो बस साथ देने आया था..." केदार जाधव के लिए कल सही मौका था इस डायलॉग को चेंपने का. लेकिन कोई बात नहीं. उससे भी बेहतर चीज की. इंडिया को मैच जिताया. वो मैच जिसे सालों तक याद रखा जायेगा. केदार की इनिंग्स भी सालों तक याद रखी जाएगी.
ये विराट कोहली और ये टीम इंडिया. बहुत फ़र्क है पिछले वर्ज़ंस से. पहले घिसटने वाले प्लेयर्स थे. अब सामने वाले को रगड़ देने वाले प्लेयर्स हैं. वो जो सिंगल के डबल करते हैं और सांस भी नहीं लेते. धोनी के कप्तानी छोड़ने पर कहा जा रहा था कि ये एक युग का अंत था. मगर वो अंत नहीं एक शुरुआत थी. शुरुआत, धोनी की कमाई को खर्चने की. धोनी ने बतौर कप्तान जो खजाना हमारे हत्थे किया, कोहली के हत्थे किया, वो कहीं भी किसी ने भी नहीं किसी को नहीं दिया. कोहली को अब बस करना ये है कि उस पटरी पर बने रहना है जिसपर धोनी ने गाड़ी को चलता छोड़ा है. ये पटरी ऐसी है कि गाड़ी के नीचे न उतरने की गारंटी है. ये गाड़ी ऊपर ही चलती जाएगी.
एक बात और जो देखी जानी चाहिये. अब चेहरे नहीं खेलते. अब नाम नहीं खेलता. अब उस नाम का खेल ही खेलता है. धवन, राहुल, युवराज, धोनी के आउट होने के बाद केदार जाधव ने फ्रंट संभाला. अब ये वो टीम नहीं रही जिसका सचिन आउट हो जाये तो टीवी बंद कर दी जाती थी. इस टीम में हर कोई अपने अन्दर तेंदुलकर का एक टुकड़ा लिए घूम रहा है जो जब ज़रुरत आती है, काम पर लग जाता है. एक गिरता है तो दूसरा संभालता है. तीसरा इस फेर में रहता है कि उसका नंबर आये तो वो अपने जौहर दिखाए. मुलायज़ा फ़रमाया जाए:
विराट कोहली एक आदर्श बन चुके हैं. सिर्फ क्रिकेटर्स के लिए ही नहीं बल्कि हर उस एथलीट के लिए जो फिट होना चाहता है. कोहली ने अपनी टेक्नीक पर जितना काम किया है उतना ही अपने शरीर पर और ये सच है कि जिस ऊंचाई पर वो बैठे हैं, उसके लिए टेक्नीक और शरीर दोनों ही की सख्त ज़रूरत पड़ती है. इन दोनों में एक की कभी उन्हें नीचे घसीट लाएगी. इसलिए कोहली की और भी तारीफ़ की जानी चाहिए. क्यूंकि वो लगातार इन दोनों डिपार्टमेंट में खुद को सबसे आगे रखे हुए हैं.
कोहली ने चेज़ करते वक़्त मैच जिताते हुए 15 सेंचुरी मारी हैं. सचिन ने जीते हुए वन-डे मैच की दूसरी इनिंग्स में 17 बार सेंचुरी मारी है. इसमें 14 बार इंडिया जीता है. सचिन ने इसके लिए 232 इनिंग्स ली थीं जबकि कोहली ने ये काम 96 इनिंग्स में ही कर दिया और उनसे एक कदम आगे बढ़ गए हैं. कोहली के आने के बाद से इंडिया ने 8 बार 300 से ज़्यादा के स्कोर को चेज़ कर लिया है. इनमें से 6 बार कोहली ने सेंचुरी मारी है. कोहली के डेब्यू के बाद से 26 बार इंडिया को 300 से ज़्यादा का स्कोर चेज़ करने को मिला है. इसमें से 8 बार जीते हैं. केदार जाधव ने मैच में 65 गेंद में सेंचुरी मारी है. सबसे तेज़ कोहली ने 52 गेंद में मारी हुई है. कोहली के साथ पार्टनरशिप के दौरान जाधव ने 152.23 के स्ट्राइक रेट से रन बनाये. यानी हर 100 गेंद पर वो देश सौ से ज़्यादा रन बना रहे थे. जबकि कोहली का स्ट्राइक रेट 106.74 था. जाधव ने कोहली से ज़्यादा बाउंड्री मारीं और कम डॉट बॉल्स खेलीं. जाधव ने 15 डॉट बॉल्स खेलीं जबकि कोहली ने 23. जाधव के 11 चौके और 2 छक्के थे जबकि कोहली के 6 चौके और 3 छक्के. इन दोनों के अलावा जसप्रीत बुमराह भी एक नायब खोज साबित हो रहे हैं. हालांकि इंग्लैंड के खिलाफ़ इतवार का मैच उनके रिकॉर्ड्स के लिए अच्छा नहीं रहा. ये पहला मैच था जिसमें उन्होंने 6 से ज़्यादा रन प्रति ओवर दिए हों. अभी तक अपने सभी मैचों में बुमराह 6 से कम की इकॉनमी से गेंद फेंकते थे. करियर की इकॉनमी थी 3.63 जबकि इस मैच के बाद उनकी करियर इकॉनमी 4.17 हो गयी है. मैच में हार्दिक पंड्या का भी अच्छा कॉन्ट्रिब्यूशन रहा. बॉल और बैट दोनों के ही साथ. 37 गेंद में 40 रन बनाये. वो भी तब जब कोहली और जाधव जा चुके थे. बिना आउट हुए इंडिया को जीत तक ले गए. 3 चौके और 1 छक्का मारा.कुल मिलाकर, ये टीम अब वैसी टीम नहीं है जो ताश के पत्तों की तरह भड़भड़ा कर गिर जाए. ये टीम जागृत है. सशक्त है. इसके बल्लेबाज 350 का स्कोर चेज़ करते हुए भी लड़भड़ाया हुआ कोई शॉट नहीं खेलते. प्लेइंग इलेवन से बाहर बैठा वाइस कैप्टन भी यहां खुशी-खुशी खिलाड़ियों को पानी पिलाने आता है. ये टीम हर गेम को उसके आखिरी चरण तक ले जाना चाहती है और उसके बाद अपनी जादुई क्षमताओं पर यकीन करती है. ये टीम न वॉर्नर को कुछ समझती है, न स्टार्क को. डेल स्टेन की नाक में सचिन ने वर्ल्ड कप में छक्का मारकर बहुत पहले ही नकेल डाल दी थी. कोहली ने मिशेल जॉनसन को जी भरकर मारा है और फॉकनर को कह दिया था, "तुझे मैंने अपने करियर में बहुत मारा है. चुपचाप बॉलिंग कर." ये टीम कोहली की टीम है जिसे धोनी ने पकाया है. और विराट कोहली जिसकी गर्माहट में इजाफा कर रहे हैं..
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