वो तस्वीर इंडियन क्रिकेट के बदलाव की तस्वीर है. वो साक्ष्य थी उस कप्तान की मेंटेलिटी की, जिसे चीज़ें भूलती नहीं थी. जो बेइज़्ज़ती का घूंट पिए बैठा था. वो ताक में था कि कब उसे फ़्लिंटॉफ़ की उस हरकत का बदला लेने का मौका मिले. और जब मौका मिला तो चूका भी नहीं. न लॉर्ड्स के इतिहास का लिहाज़ किया और न ये सोचा कि उसके बारे में क्या कहा जाएगा. मैच फ़ीस गयी तो गयी. उस आनंद को जी भर के जिया जो टीशर्ट को हवा में लहराने के बाद मिला. एंड्रू फ़्लिंटॉफ़ का मुंह देखने वाला था. और वही मकसद भी था. असल में यही सौरव गांगुली का इंट्रोडक्शन है.

आज-कल वही सौरव गांगुली हमें इंडियन टीम को लीड करता हुआ दिख रहा है. बस उसने शरीर बदल लिया है. शरीर है विराट कोहली का. वही सोच. वही अग्रेशन. वही न झुकने वाली फ़ितरत. फिर वो चाहे ऑस्ट्रेलिया में सेंचुरी मारकर दी गईं झोला भर गालियां हों या वार्नर से पूछना हो कि क्यूं वो हर बात में अपनी टांग घुसा देता है. विराट कोहली बिलकुल उस नुक्कड़ पर पाए जाने वाले लड़कों की तरह है जिनसे माएं अपने बच्चे को दूर रहने की सलाह देती हैं. कभी-कभी तो बच्चा शरीफ़ न भी हो तो भी उसकी मां उस एक लड़के से दूर रहने को कहती है.
जब ये लिख रहा हूं उसके 2 मिनट पहले ही एक ऐसी चीज़ हुई, जिसने मेरे ऐसा सोचने को और भी सच साबित कर दिया. इंडिया और इंग्लैंड के बीच तीसरा टेस्ट मैच चल रहा है. चौथे दिन का लंच खतम हुए आधा घंटा हो चुका है. अंपायर विराट कोहली को नयी बॉल ऑफर कर चुका है लेकिन कोहली जडेजा और अश्विन से गेंदें फिंकवा रहा है. कुछ देर बाद मिडविकेट पर खड़े उमेश यादव से कोहली पूछता है, "इसको मारना है नए से?" वो उमेश से चिल्ला के पूछ रहा है कि क्या इंग्लैंड के बैट्समैन को नयी बॉल से बॉलिंग करनी है? उमेश यादव हां कहता है. वैसे भी फ़ास्ट बॉलर से गेंद फेंकने को पूछो तो न कहता ही नहीं है. कोहली तुरंत ही नयी गेंद ले लेता है.
ये है विराट कोहली. वो नयी गेंद लेता है क्यूंकि सामने एक ओपेनिंग बैट्समैन जो नीचे खेलने आया था और टेल-एंडर थे. उन्हें नयी गेंद से डराना चाहता है. उन्हें हवा की तेज़ी बताना चाहता है. जिसके लिए उसकी भाषा भी उसकी फितरत की कहानी समझाता है. वो गेंद फिंकवाना नहीं चाहता है. वो चाहता है कि उसका गेंदबाज, उसका ट्रंप कार्ड बैट्समैन को मारे. नयी गेंद से. वो गेंद जो बेहद ठोस होती है और जिन्हें बीच पिच पर सीम पर पटक दो तो बैट्समैन की आंखों के सामने उसकी पूरी बीती ज़िन्दगी की कहानी चल पड़ती है. एकदम वैसे जैसे फिल्मों में लोगों के मरने से ऐन पहले उन्हें अपनी ज़िन्दगी दिखाई देती है. और जब तक ये बात लिखी गयी, मोहम्मद शमी ने उसी नयी गेंद से 2 विकेट निकाल लिए. एक ही ओवर में.
शमी ने अभी अभी जो पहला विकेट लिया उसके ठीक पहले उन्होंने एक गेंद पटकी. गेंद क्रिस वोक्स के हेलमेट पर पड़ी. वो ज़रूर हिल गए होंगे. उनके हेलमेट के पीछे लगा प्रोटेक्शन भी उखड़ गया. कोहली वोक्स के पास गए और उससे पूछा कि क्या वो ठीक है. उधर से जवाब हां मिलने पर शमी को फिर गेंद पटकने को कहा. अगली गेंद पटकी हुई, बैट के हैंडल पर लगी और पीछे पार्थिव पटेल ने कैच लिया.

क्रिस वोक्स का कैच लेने के बाद कोहली और शमी
इस तरह का खेल टेस्ट मैच को अपने चरम पर ले जाता है. अगर ऐसा ही हर बार देखने को मिले तो मुझे नहीं लगता टेस्ट मैचों में कम होती भीड़ को दोबारा भड़क्के में तब्दील नहीं किया जा सकता. गांगुली की ही अगुवाई में खेला गया कलकत्ता टेस्ट मैच अपनी फुल कैपिसिटी में था जब उन्होंने सचिन तेंदुलकर को गेंद थमाई थी. कहा था सिर्फ एक ही ओवर. हेडेन और गिल्क्रिस्ट और शेन वॉर्न का विकेट सचिन ने ही लिया. एक ओवर से ज़्यादा फेंके.
दो वाकये हैं. पहला सौरव गांगुली का. ओवल, इंग्लैंड. साल 2007. सौरव गांगुली ओपेनिंग उतरे सचिन तेंदुलकर के साथ. स्टुअर्ट ब्रॉड की एक गेंद पर रूम बनाकर ऑफ साइड में मारने के चक्कर में गांगुली कॉलिंगवुड के हाथ में शॉट मार बैठे. स्टुअर्ट ब्रॉड जाकर सौरव गांगुली से कुछ कहते हैं. गांगुली को ये पसंद नहीं आया. दोनों के बीच में काफ़ी देर तक बातें हुईं. सचिन भी शामिल हुए. शायद मामला शांत करने को. अम्पायर को भी बीच में कूदना पड़ा. ओवर खतम. ब्रॉड का अगला ओवर. पहली गेंद पर सचिन ने स्ट्राइक रोटेट की. दूसरी गेंद और फिर वैसे ही रूम बनाकर गांगुली ने ब्रॉड को उसके ही सर के ऊपर से 6 रन. और उसके बाद सौरव गांगुली पिच पर चहलकदमी करते हैं. और ब्रॉड को देखते रहते हैं. इस उम्मीद में कि वो उनकी ओर देखे मगर ऐसा हुआ नहीं.
कोहली में वो अंदाज़ है जो अग्रेशन को एक संक्रामक बीमारी में तब्दील कर देता है. पूरी टीम में ये संक्रमण फैल जाता है. कोहली के चेहरे पर ही ये दिखता है. फिर वो चाहे रेफेरल लेने की बात हो या फिर जाते हुए स्टोक्स को मुंह पर उंगली रखकर विदाई देने की बात हो.
दूसरा वाकया, कोहली से जुड़ा हुआ. जेम्स फॉकनर उन्हें गेंद फेंक रहे थे. जेम्स तेज़ गेंदें फेंकने के लिए जाने जाते हैं. उनके और कोहली के बीच में एक अजीब सी केमिस्ट्री हमेशा ही रही है. गेंद को फेंकते हैं जिसे कोहली टाइम नहीं कर पाए. वो कोहली से कुछ कहते हैं. कोहली ने उन्हें जो जवाब दिया, नहीं लगता कि फॉकनर उनसे आगे कभी भी कुछ कहेंगे. कोहली ने कहा, "मैंने तुम्हें ज़िन्दगी भर खूब मारा है. जाकर चुपचाप बॉलिंग करो."फ़ेमस कलकत्ता टेस्ट से पहले टीम सेलेक्शन के दौरान गांगुली ने कह दिया था कि वो तब तक रूम से बहार नहीं निकलेंगे जब तक उन्हें हरभजन नहीं मिलेगा. हरभजन ने उस मैच में हैट्रिक ली थी. कोहली भी वो कप्तान हैं जिहोंने अब तक अपनी कप्तानी में खेले 20 मैचों में एक भी बार लगातार 2 मैचों में एक ही टीम कॉम्बिनेशन के साथ मैच नहीं खेला है. उन्हें टीम में सही प्लेयर्स चाहिए. वही प्लेयर्स चाहिए जो टीम के लिए काम आयेंगे. उसे प्लेयर्स ढोना नहीं आता है. इसलिए वो ढोता भी नहीं है.
कोहली में अग्रेशन है. अग्रेशन जो पहले हाथ से बाहर जा रहा था. मगर बाद में जिसे कंट्रोल किया गया. जिसने अपने गुस्से को अपने जुझारूपन में बदल दिया. कोहली अब अपना गुस्सा जिम में ट्रेनिंग करते हुए निकालता है. उसे बड़े प्लेयर्स का साथ मिला है. उसे सचिन तेंदुलकर जैसा एक गाइड मिला जिसने उसे आईपीएल की खुमारी से बाहर निकाला. उसे धोनी जैसा दोस्त मिला जिसने उसमें बेहद भरोसा दिखाया. कोहली अपनी लीडरशिप में सौरव गांगुली की याद दिला रहा है. जिसने इंडिया को विनिंग ट्रैक पर जारी किया. इंडिया आज टेस्ट मैचों में काबिल टीम बनी हुई है. नंबर एक पर है. कोहली खुद वन-डे, टेस्ट और टी-20, तीनों ही वर्ज़न में टॉप फाइव में शामिल हैं. टीम को लीड कर रहे हैं और किसी अनहोनी के न घटने तक अगले संभावित वन-डे कैप्टन भी हैं. कोहली एक नया सौरव गांगुली है. जिसने सामने वाले को खुद पर हावी न होने देने की कसम उठाई हुई है.













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