
'जन विकल्प' पार्टी के अपने कार्यकर्ताओं के साथ चुनाव प्रचार करते शंकर सिंह वाघेला.
चुनाव जीतने का फॉर्म्युला तो नहीं तलाश रहे हैं वाघेला?
किसी नौसीखिये को पहली बार खाना बनाते देखा है? खूब तेल डालता है. रसोई में जितने मसाले रखे होते हैं, सबमें से थोड़ा-थोड़ा ट्राय करता है. इस उम्मीद में कि जाने क्या काम कर जाए. कुछ ऐसा ही हाल नेताओं का भी होता है. नए-नए ही नहीं, खूब पुराने नेता भी. चुनाव जीतने के लिए खूब जुगत लगाते हैं. शंकर सिंह वाघेला को देखिए. लगे हुए हैं. उनको तलाश है ऐसे फॉर्म्युले की, जो चुनाव जिता दे. इसी चक्कर में अब 'पद्मावती' के पीछे पड़ गए हैं. संजय लीला की नई फिल्म. एक दिसंबर को रिलीज होने वाली है. जब से बननी शुरू हुई है, तब से ही किसी न किसी को आहत कर रही है. ताजा-ताजा आहत हुए हैं वाघेला. हालांकि उनके आहत होने के पीछे एक और वजह नजर आ रही है.

चुनाव प्रचार से पहले शंकर सिंह वाघेला कई मंदिरों में आशीर्वाद लेते नजर आए.
इस चुनाव के लिए राजस्थान से और क्या-क्या लाएंगे वाघेला?
गुजरात में चुनाव हैं. दिसंबर में. नौ और 14 तारीख को. वाघेला किस जुगाड़ से चुनाव लड़ रहे हैं, ये तो हमने आपको बताया ही था. राजस्थान की एक पार्टी का चुनाव चिन्ह मांग लाए हैं. 'पद्मावती' की कहानी राजपुताना की है. राजपूत बहुत नाराज़ हैं इस फिल्म से. उनके मुताबिक, फिल्म में रानी पद्मावती की बेज्जती की गई है. राजपूत तो गुजरात में भी रहते हैं. गुजरात की कुल आबादी में करीब 15 फीसदी हिस्सा राजपूतों का है. सारे जनरल कैटगरी में नहीं आते हैं. कई राजपूत समुदाय ओबीसी में गिने जाते हैं. जिस बात पर राजस्थान के राजपूत भड़क सकते हैं, उस पर गुजरात के राजपूत भी चिढ़ सकते हैं. सो वाघेला भी 'पद्मावती' को कोस रहे हैं. उनकी तरफ से मांग हुई है. रिलीज से पहले हिंदू और राजपूत नेताओं को फिल्म दिखाओ. ताकि, वो फैसला ले सकें कि भंसाली ने राजपूतों का इतिहास ठीक-ठीक बताया है या नहीं. वाघेला ने धमकी भी दी है. कहा, अगर मांग नहीं मानी जाती तो विरोध होगा. हिंसा से भी परहेज नहीं रखा जाएगा.

आरोप है कि फिल्म में कुछ दृश्य ऐसे हैं, जहां सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी और राजपूत रानी पद्मावती के बीच नजदीकियां दिखाई गई हैं. खिलजी का किरदार रणवीर सिंह कर रहे हैं.
राजपूतों का एक धड़ा बीजेपी से नाराज़ है
सुनने में तो आ रहा है कि राजपूतों का एक धड़ा बीजेपी से नाराज़ है. ये धड़ा है कारडीया राजपूतों का. सौराष्ट्र और कच्छ में इनकी खासी मौजूदगी है. कारडीया राजपूत गुजरात बीजेपी के अध्यक्ष जीतू वाघानी से चिढ़े हुए हैं. जीतू पर इल्जाम है कि वो कारडीया राजपूतों से खुन्नस रखते हैं. उनके लोगों को झूठे मामलों में फंसाते हैं. खबर है कि भावनगर और जूनागढ़ में तो कारडीया राजपूत बहुत ही भन्नाए हुए हैं. बीजेपी के पोस्टरों और बैनरों में जहां भी जीतू का चेहरा दिखता है, उस पर कालिख पोत देते हैं. कारडीया राजपूत समाज के नेताओं ने पांच नवंबर को एक रैली भी बुलाई है. अहमदाबाद में. बीजेपी के खिलाफ. पाटीदार और ठाकुर पहले ही चिढ़े हुए थे बीजेपी से. अब कारडीया राजपूत भी उसी राह बढ़ गए हैं. अभी इन्होंने गुजरात के कई हिस्सों में एक बाइक रैली भी निकाली थी. वो चाहते हैं कि बीजेपी वाघानी पर कार्रवाई करे.

वाघेला का जन विकल्प फ्रंट राजस्थान की एक नई पार्टी का चुनाव चिन्ह 'ट्रैक्टर चलाता किसान' इस्तेमाल कर चुनाव लड़ रहा है.
वाघेला की ये खिचड़ी कच्ची रहेगी या पक जाएगी?
ये कारडीया नाम के पीछे लंबी कहानी है. मुगलों के दौर की. कहते हैं कि वैसे राजपूत जो मुगलों को कर (टैक्स) देने के लिए मान गए, कारडीया कहलाने लगे. ये सब इतिहास की बातें हैं. उसी इतिहास की, जिसका नाम लेकर लोग 'पद्मावती' का विरोध कर रहे हैं. उसी इतिहास में मलिक मुहम्मद जायसी भी हैं. उनकी 'पद्मावत' भी है. जिसकी पात्र हैं रानी पद्मावती. अभी का माहौल अलग है. साहित्य और इतिहास दाल-भात की तरह मिल गए हैं. वैसे ही, जैसे चुनाव और जाति की खिचड़ी बन गई है. ऐसी ही खिचड़ी पकाने की एक कोशिश वाघेला भी कर रहे हैं.
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