The Lallantop

एक कविता रोज: 'कितने गरीब हो गए हैं हम आज इस शहर में'

आज पढ़िए युवा शायर अबरार अहमद की दो ग़ज़लें.

Advertisement
post-main-image
फोटो - thelallantop
IMG_20150827_025537ये ग़ज़लें हमें अबरार अहमद ने भेजी हैं. अबरार उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से हैं. बीते 12 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं. फ़िलहाल गाज़ियाबाद में अमर उजाला अखबार से जुड़े हुए हैं. दैनिक भास्कर के साथ भी काम किया है. ग़ज़ल, नज़्म और कविताएं लिखते हैं.
 

 1.

दिल को भी पुरसुकून धड़कने नहीं देता साहिल इस समंदर को भड़कने नहीं देता ख़ामोश पड़ा है वो मेरे अंदर, जाने कब से कहता हूं तो कहता है तू निकलने नहीं देता किस बात का अफ़सोस करें इस उम्र में हम भी कोई मर्ज़ है जो इस घाव को भरने नहीं देता कितने गरीब हो गए हैं हम आज इस शहर में मेरा गांव आज भी किसी को भूख से मरने नहीं देता ***

2.

धूप बहुत है आंखों को धो लिया जाए अरसा हुआ जी भर के रो लिया जाए सफ़र लंबा है और कोई साथ नहीं जाने वाला घड़ी दो घड़ी के लिए तो सो लिया जाए सबके अपने गुनाह हैं अपनी नेकियां क्यों न बगीचे में आइना बो लिया जाए *** क्या आप भी कविता/कहानी लिखते हैं? हमारे रीडर्स को पढ़वाना चाहते हैं. मेल करें lallantopmail@gmail.com पर. हमें पसंद आई तो आपको कॉन्टैक्ट करेंगे. फिर आपके नाम और तस्वीर के साथ कविता/कहानी यहीं इसी पेज पर नजर आएगी.

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement