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'खराब फॉरेंसिक रिपोर्ट्स से छूट रहे रेप-हत्या के आरोपी', HC ने योगी सरकार को सुनाया

जस्टिस अरुण ने कहा कि ये कोई अकेला मामला नहीं है. उनके सामने ऐसे कई केस आते हैं, जिनमें महिलाओं का रेप और फिर हत्या की जाती है, लेकिन जब DNA जांच की रिपोर्ट आती है, तो उसमें अक्सर लिखा होता है कि DNA प्रोफाइल पूरा नहीं बन पाया. नतीजा ये होता है कि जांच का सबसे अहम साइंटिफिक सबूत अधूरा रह जाता है.

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FSL जांच के एक मामले को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने योगी सरकार को लेटर लिखा. (फोटो- इंडिया टुडे)

"कई मामलों में रेप और हत्या के आरोपियों को सिर्फ इसलिए राहत मिल रही है क्योंकि फॉरेंसिक साइंस लैब जरूरी साइंटिफिक एविडेंस देने में सक्षम नहीं है." यह बयान इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक रेप और हत्या के मामले पर सुनवाई के दौरान दिया. कोर्ट ने अपने बयान में यह भी कहा कि पुरानी मशीनों, अधूरे इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टाफ की कमी की वजह से DNA प्रोफाइल ठीक से तैयार नहीं हो पा रहे हैं, जिसका सीधा असर ज्यूडिशियल प्रोसेस पर पड़ रहा है.

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मामले की सुनवाई जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच कर रही थी. बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, एक महिला लापता होने के बाद नदी के किनारे मृत मिली थी. पुलिस ने बताया कि महिला के साथ पहले रेप किया गया और फिर उसकी हत्या कर दी गई. इस मामले में मनोज नाम के एक व्यक्ति को आरोपी बताया गया था.

पुलिस के मुताबिक, एक विटनेस ने उसे उसी तरफ जाते हुए देखा था, जहां से महिला के शव को बरामद किया गया था. आरोपी नवंबर 2025 से जेल में बंद था और उसने हाई कोर्ट में जमानत की याचिका दायर की थी. कोर्ट में केस की सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने कहा कि फॉरेंसिक रिपोर्ट उनके क्लाइंट के पक्ष में है. उनका तर्क था कि मृतक महिला के वैजाइनल स्वैब और आरोपी का DNA मैच नहीं हुआ है.

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DNA न मिलने पर आरोपी छूटा

इसलिए उसके खिलाफ कोई ठोस साइंटिफिक सबूत नहीं है. उन्होंने ये भी कहा कि आरोपी को झूठा फंसाया गया है और उसके खिलाफ कोई ऐसा सबूत है ही नहीं, जो उसे सीधे अपराध से जोड़ता हो. आमतौर पर ऐसी स्थिति में माना जा सकता था कि DNA रिपोर्ट आरोपी के पक्ष में गई है, लेकिन अदालत ने रिपोर्ट को ध्यान से देखने के बाद एक अलग बात नोट की. कोर्ट ने पाया कि मामला सिर्फ DNA मैच न होने का नहीं था. असल समस्या ये थी कि FSL आरोपी का पूरा DNA प्रोफाइल ही तैयार नहीं कर पाई थी.

रिपोर्ट में कहा गया था कि DNA प्रोफाइल पर्याप्त रूप से जनरेट नहीं हो सकी. इसलिए ये तय ही नहीं किया जा सकता कि मृतक के वैजाइनल स्वैब में मिला DNA किस व्यक्ति का था. यानी रिपोर्ट आरोपी को साफ-साफ निर्दोष नहीं बता रही थी, बल्कि लैब ये निष्कर्ष ही नहीं निकाल पा रही थी कि DNA आखिर किसका है.

जस्टिस अरुण ने कहा कि ये कोई अकेला मामला नहीं है. उनके सामने ऐसे कई केस आते हैं, जिनमें महिलाओं का रेप और फिर हत्या की जाती है, लेकिन जब DNA जांच की रिपोर्ट आती है, तो उसमें अक्सर लिखा होता है कि DNA प्रोफाइल पूरा नहीं बन पाया. नतीजा ये होता है कि जांच का सबसे अहम साइंटिफिक सबूत अधूरा रह जाता है. 

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कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में अदालतें मुश्किल में पड़ जाती हैं. अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, किसी व्यक्ति को सिर्फ शक के आधार पर लंबे समय तक जेल में नहीं रखा जा सकता. अदालत को मौजूदा सबूत के आधार पर ही फैसला करना होता है. इस मामले में मेडिकल और वैज्ञानिक सबूत निर्णायक नहीं थे. इसलिए अदालत ने कहा कि वह ‘भारी मन और गहरे दुख’ के साथ आरोपी को जमानत देने के लिए मजबूर है.

वहीं, अपने आदेश में कोर्ट ने राज्य सरकार की भी आलोचना की. अदालत ने कहा कि पुरानी मशीनें, अधूरा इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसोर्सेज की कमी DNA प्रोफाइल न बन पाने की असली वजह हैं. कोर्ट ने ये भी कहा कि इसके लिए किसी और को नहीं, बल्कि राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. अदालत ने मेन्शन किया कि हाल ही में यूपी फॉरेंसिक साइंस लैब यानी FSL के डायरेक्टर ने भी बताया था कि राज्य की कई फॉरेंसिक लैब्स में कर्मचारियों की भारी कमी है और बुनियादी सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं.

इसी वजह से कोर्ट ने अपने ऑर्डर की कॉपी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चीफ सेक्रेटरी के जरिए भेजने का निर्देश दिया. अदालत ने उम्मीद जताई कि सरकार फॉरेंसिक लैब्स में मॉडर्न मशीनें उपलब्ध कराएगी, पर्याप्त स्टाफ अपॉइन्ट करेगी और जांच व्यवस्था को मजबूत बनाएगी.

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