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'...और यादें सड़कर बास मार रही हैं'

एक कविता रोज़ में आज विवेक आसरी की एक कविता.

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एक कविता रोज़ में आज विवेक आसरी की एक कविता.

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प्रेम की काल कोठरी से

मैं इस काल कोठरी में पहली बार नहीं भेजा गया था. पिछली सज़ाओं के वक्त दीवारों पर नाखूनों से कुरेदे गए किस्से वहां अब भी दर्ज थे, दरारों की शक्ल में उनसे बहा रक्त अब भी वहां था ठंडा और काला पड़ चुकने के बावजूद हां, उन दीवारों की दरारों का दर्द सूख चुका था. उस काल कोठरी से हर रिहाई एक मरहम थी जिसे मैं निकलते वक्त उन जख्मों पर लेप आता था. इस बार जब फिर से उस काल कोठरी में भेजा गया तो आंखों ने मुझे हैरान किया अंधेरे के प्रति उनकी संवेदनशीलता बदल चुकी थी. वे अड़ियल हो गई थीं. या फिर वे खो चुकी थीं दुख की चौंध सहने की ताकत. दुख का अंधेरा छंटने के इंतजार में मैं जमीन पर अपने घुटनों में सिर छिपाए पड़ा रहा. ऐसा पहली बार था. पिछली बार जब मैं इस काल कोठरी में आया था तो माहौल थोड़ा अलग था. उससे भी पिछली बार जब आया था तब तो मैंने दुख के साथ जमकर फ्लर्ट किया था. दुख के आनंद को जिया था. खूब रोया था. कल्पनाओं से प्यार किया था और अकेलेपन से लिपटकर सोया था. आंसुओं के किण्वन से शराब बनाई और ओक भर भर पी. पीना तभी सीखा था. वो अद्भुत नशा था. दुख का सुख! इस बार रोमांस हो चुका है कोठरी से बरी. और यादें सड़कर बास मार रही हैं. अकेलेपन के सींग उग आए हैं और दांत भी. पता नहीं इस काल कोठरी से बाहर कैसे निकल पाऊंगा. प्रेम तो नहीं करूंगा दीवार पर लिख जाऊंगा, तीसरी बार प्रेम गुनाह है जिसकी सजा है बाकी जिंदगी.
वीडियो- एक कविता रोज़: दर्पण साह की बिना शीर्षक वाली कविता

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