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एक कविता रोज़: 'यह कविता इरोम पर नहीं है'

आज इरोम शर्मिला का जन्मदिन है. पढ़िए उन पर लिखी फ़रीद खां की एक कविता.

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फोटो - thelallantop

फ़रीद खां मुंबई में रहते हैं. वैसे पटना से हैं. कविता-कथा के साथ-साथ फिल्म और पटकथा-लेखन से भी जुड़े हैं. इरोम शर्मिला पर उन्होंने एक कविता लिखी है जो यह कहते हुए शुरू होती है कि यह कविता इरोम पर नहीं है...

इरोम का आज जन्मदिन है, ऐसे में यह कविता इरोम पर न होकर भी इरोम के उस अनथक संघर्ष को समझने में मददगार है, जिसका सिला में भारतीय लोकतंत्र में महज 90 वोटों की शक्ल में मिला था.

आज एक कविता रोज़ में पढ़िए इस कविता को ही :

इरोम शर्मिला

यह कविता इरोम पर नहीं है उन लोगों पर है जो गांवों, कस्बों, गलियों, मुहल्लों में लोकप्रियता और खबरों से दूर गांधी की लाठी लिए चुपचाप कर रहे हैं संघर्ष यह कविता इरोम पर नहीं है यह धमकी है उस लोकतंत्र को जो फौजी बूट पहने खड़ा है जो बंदूक की नोक पर इलाके में बना कर रखता है शांति पिछले दस सालों में जितने बच्चे पैदा हुए हिमालय की गोद में उन्होंने सिर्फ बंदूक की गोली से निकली बारूद की गंध को ही जाना है और दर्शनीय-स्थलों की जगह देखी हैं फौज जहां बर्फ-सा ठंडा है कारतूस का भाव यह कविता इरोम पर नहीं है बल्कि उस बारूद की व्याख्या है जिसके ढेर पर बैठा है पूर्वोत्तर ***

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