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कोच 'कैसा हो' पूछिए, 'कौन हो' नहीं!

इंडिया में कोच कैसा आये? अंग्रेजी बोलने वाला या हिंदी? हिंदी वाला आया तो राहुल द्रविड़ का पत्ता कटेगा. सोच लो गुरु!

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फोटो - thelallantop
टीम इंडिया की हालत इस वक़्त वैसी है जैसी न्यू एडमीशन की होती है. कौन पढ़ायेगा, कैसे पढ़ायेगा, क्या होगा? चिंता लगी रहती है. न्यू एडमीशन पढ़ाकू हो तो क्या कहने. फिर तो बहुत कुछ पढ़ाने वाले पे डिपेंड करता है. उसके लिए ये सब काफी मायने रखता है. टीम इंडिया वही न्यू एडमीशन है. नया नया सेशन शुरू हुआ है. एक टेम्परेरी टीचर अलॉट हुआ है. संजय बांगड़. लेकिन परमानेंट पोस्टिंग किसकी होगी, नहीं मालूम. टीम इंडिया पढ़ाकू भी है. इसलिए सही टीचर की भी ज़रुरत है. अभी भी तस्वीर धुंधली नज़र आ रही हो तो बता दूं कि यहां कोच की बात की जा रही है.
हाल ही में बीसीसीआई ने कोच के पोस्ट के लिए इंट्रेस्टेड लोगों को 9 शर्तें पूरी करने को कहा था. जो ये 9 शर्तों की कसौटी पर खरा उतरेगा, वही कोच बनेगा. इन 9 शर्तों में एक हिंदी भाषी होने की भी शर्त थी. ये एकदम पक्की वाली शर्त तो नहीं थी लेकिन हां अगर ऐसा हो तो सोने पे सुहागा वाली बातें कहीं जा सकेंगी. ये बात थोड़ी अटपटी ज़रूर मालूम हुई थी क्यूंकि ज़रूरी नहीं कि टीम का हर प्लेयर हिंदी बोलता हो. माना कि नॉर्थ-ईस्ट का कोई भी खिलाड़ी अभी तक टीम में नहीं है, लेकिन क्या आगे भी नहीं आयेगा? खैर, इस शर्त का इरादा पॉलिटिकल कतई नहीं होगा, ऐसा मेरा विश्वास है. फिर से दोहराऊंगा कि कोच को हिंदी आनी चाहिए, ये शर्त थोड़ी अजीब ज़रूर लगी.
वन-डे और टी-20 कैप्टन धोनी ने इस बात पर चीजों को कुछ क्लियर ज़रूर किया है. धोनी ने कहा है कि टीम में अंग्रेजी की कोई भी ऐसी ख़ास समस्या नहीं होती है. और साथ ही जिस तरह के प्लेयर्स अब आ रहे हैं, ये समस्या धीरे-धीरे ख़तम होती जा रही है. अगर टीम में कोई ऐसा है जिसे अंग्रेजी में कही गयी कोई बात नहीं समझ में आती है तो उसे साथी प्लेयर्स समझा ही देते हैं. टीम में कभी भी ज़रुरत पड़ने पर प्लेयर्स आपस में पूछा करते ही हैं. धोनी ने कहा कि हिंदी आना एक शर्त ज़रूर हो सकती है लेकिन एकमात्र शर्त नहीं होनी चाहिए. और ये बात काफी हद तक सही और अब तक की सबसे बैलेंस्ड बात है. अगर हिंदी न बोल सकने वाले कोच को नहीं लिया जायेगा तो विदेशी प्लेयरों का पत्ता तो कटेगा ही कटेगा, राहुल द्रविड़ भी लपेटे में आ जायेंगे. देखा जाए तो द्रविड़ इस पद के लिए अब तक के सबसे पॉपुलर दावेदार हैं. आधा देश उनके कोच बनने की राह देख रहा है.
फ़ोटो पुरानी है. खुश न हो.
फ़ोटो पुरानी है. खुश न हो.

धोनी के हिसाब से हिंदी और अंग्रेजी से बाहर आकर कोच को इंडिया के बारे में आइडिया हो तो बेहतर रहेगा. उसे ये मालूम होना चाहिए कि ये देश कैसा है, यहां के लोग कैसे हैं, यहां काम किस तरह से होता है, यहां का माहौल कैसा है और सबसे बड़ी बात ये कि प्लेयर्स का बैकग्राउंड कैसा है. धोनी की इस बात से याद आये कोच ग्रेग चैपल. ऑस्ट्रेलियन थे. थे क्या अब भी हैं. एक सीरीज़ में विकट परिस्थिति से गुज़र रहे थे. टीम इंडिया की परफॉरमेंस तो गड्ढे में जा ही रही थी, दादा के साथ उनकी अनबन की खबर टॉप पर चल रही थी. स्टेडियम के बाहर फैन्स खड़े उनके आने का ही इंतज़ार कर रहे थे. उनके आते ही ग्रेग के खिलाफ़ हूटिंग शुरू हो गयी. ग्रेग बस में चढ़े. हूटिंग तब भी चालू थी. लोग उन्हें गालियां दे रहे थे. ऑस्ट्रेलिया वापस जाने को कह रहे थे. बस चलने को हुई तो ग्रेग ने खिड़की से अपना हाथ बाहर निकाला और अपनी बीच की उंगली वहां खड़े फैन्स को दिखा दी. धोनी के कहने का मतलब यही था कि भइय्या ऐसा कोच दोबारा न ला देना. वरना सवारी अपने सामान की खुद ज़िम्मेदार है.
टीम के कोच के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती होती है वो होती है अपने परिवार से दूर रहना. मौजूदा हाल में इंडियन टीम सबसे ज़्यादा क्रिकेट खेल रही है. ज़िम्बाब्वे टूर से सारी सीरीज़ें शुरू हो रही हैं. ऐसे में कोच को टीम के साथ ही दुनिया घूमनी पड़ती है. जिसकी वजह से उसे घरवालों से फ़ोन और स्काइप पर ही मुखातिब होकर काम चलाना पड़ता है. स्टीफन फ़्लेमिंग और रिकी पोंटिंग पहले ही इन्हीं वजहों से इंडियन कोच बनने से इनकार कर चुके हैं. धोनी के हिसाब से एक बात ये भी हो कि सिर्फ़ कोच के स्टैट्स देखकर ही न उसे चुना जाये. टीम को क्या चाहिए इसपर भी पूरी तरह से ध्यान दिया जाये तो अच्छा हो. पता चला अगले की आंख में समस्या है और आप उसे डेंटिस्ट के पास लेके पहुंच गए. इसलिए ज़रूरी ये है कि ज़रूरतों को देखते हुए कोच चुना जाये. जैसा चाहिए वैसा. जो चाहिए वो नहीं.

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