
100वें इंटरनेशनल सैकड़े के बाद सचिन
16 मार्च 2012. शेर-ए-बांग्ला स्टेडियम. बांग्लादेश. सचिन तेंदुलकर ने अभी-अभी इंटरनेशनल क्रिकेट में अपना सौवां सैकड़ा मारा था. सचिन ने अपने बल्ले को निहारा और फिर आसमान में ताका. ठीक इसी वक़्त टीवी पर नीली जर्सी पहने कुछ खिलाड़ियों का एक झुण्ड बाउंड्री के बाहर खड़ा दिखाई दे रहा था. इसमें सबसे किनारे जो लड़का खड़ा था, इंडिया को अंडर-19 वर्ल्ड कप जितवा चुका था. जैसे ही इंडिया ने अंडर-19 वर्ल्ड कप जीता, ललित मोदी ने पहले आईपीएल के नियमों में कुछ बदलाव किये. उसने एक स्पेशल नीलामी करवाई जिसमें आईपीएल फ्रेंचाईज़ी दो-दो जूनियर प्लेयर्स खरीद सकती थीं. दिल्ली के इस लड़के को दिल्ली की फ्रेंचाईज़ी ने नहीं बल्कि बैंगलोर की फ्रेंचाईज़ी ने ख़रीदा था. इसका रिकॉर्ड कुछ अच्छा नहीं गया. औसत खिलाड़ी मालूम दे रहा था. इंडिया की टीम में आते ही श्री लंका के खिलाफ़ पॉइंट्स में सनथ जयसूर्या का कैच छोड़ा था जिसे हर भारतीय परिवार ने याद रखा हुआ था. फिलहाल इसका करियर ग्राफ़ उठ रहा था. अपने पहले वर्ल्ड कप के पहले ही मैच में इसने शतक मारा था. फ़िलहाल वो खड़ा सचिन तेंदुलकर के लिए तालियां बजा रहा था. सचिन तेंदुलकर, जो विराट कोहली बनना चाहता था. और जिसे सचिन के रिटायर होने के 5 साल बाद इंडिया का नया सचिन तेंदुलकर कहा जाने लगा है. बल्ले पर चिपका एमआरएफ़ का स्टीकर उन चुनिंदा चीज़ों में से एक है जिसकी वजह से इन दोनों खिलाड़ियों के बीच समानताएं या अंतर ढूंढे जाते हैं. स्ट्रेट ड्राइव के मामले में आज भी सचिन के आस पास कोई नहीं फटकता.

सौवीं सेंचुरी मारने के दौरान कोहली के साथ सचिन
16 मार्च 2012 के बाद सचिन ने एक वन-डे मैच और खेला. 2 दिन बाद. और फिर हज़ारों लोगों के लिए वन-डे मैच ही रिटायर हो गए.
थोड़ा सा पहले चलते हैं. 18 दिन पहले. भारतीय उपमहाद्वीप से सीधे डाउन अंडर. होबार्ट, ऑस्ट्रेलिया. 28 फरवरी 2012. इंडिया को सीरीज़ में बने रहने के लिए मैच को 40 ओवर में जीतना था. श्री लंका ने 320 रन बनाये थे. उस दिन इंसानी नस्ल को एक बात मालूम चली - लसिथ मलिंगा की पैर के अंगूठे को निशाना बनाकर फेंकी गई गेंदें फाइन लेग बाउंड्री पर मारी जा सकती थीं. मलिंगा को महज़ कलाइयों से फ्लिक करके काले आसमान में इतनी ऊंचाई तक मारा जा सकता था कि गेंद और तारे में अंतर कर पाना मुश्किल लगे. उस रात कोहली ने पहले मलिंगा की आत्मा को मारा और फिर मैच की 80 गेंदें बाकी रहते हुए इंडिया के 321 रन बनवा डाले. विराट कोहली का नया अध्याय शुरू हो चुका था. ये विराट कोहली का दूसरा जन्म था. पिछले जन्म में उसने भरपूर शराब पी थी. अपनी फ्रेंचाइज़ी से सीनियर प्लेयर्स की तरह बिज़नेस क्लास का टिकट न मिलने पर झगड़ा किया और होटल में अपने लिए बड़े कमरे की मांग की. लेकिन अब तस्वीर बदल रही थी. सचिन तेंदुलकर जा रहा था और विराट कोहली आ चुका था.

अग्रेशन की खान, कोहली
22 अक्टूबर 2017 को न्यूज़ीलैंड के खिलाफ़ खेलते हुए विराट कोहली ने 31वीं सेंचुरी मारी. अब उनके और सचिन की 49 सेंचुरियों के बीच में कोई भी नहीं है. अगले 4 सालों में हम कोहली को सचिन के इन 49 सैकड़ों का रिकॉर्ड तोड़ते देख सकते हैं.
सचिन और कोहली के बीच अगर तुलना करनी शुरू की जाए तो न जाने कितने आयामों को एक साथ रखना पड़ेगा. जब सचिन अपना पहला वन-डे मैच खेलने उतरे थे, विराट कोहली को इस दुनिया में आये हुए मात्र 13 महीने और 13 दिन हुए थे. उस वक़्त जो लोग सामने आकर गेंद फेंकते थे उनमें से कुछ नाम यहां हैं - कर्टनी वाल्श, वसीम अकरम, वक़ार यूनिस, शोएब अख्तर, शेन वॉर्न, मुरलीधरन, चमिंडा वास, पॉलक, विटोरी, गिलेस्पी, कैस्प्रोविच, ऐलन डोनाल्ड. गेंदबाजों की ये जमात मिलकर दुनिया की सबसे खौफ़नाक बॉलिंग लीग बनाती थी. सचिन ने उस वक़्त में रन बनाये हैं जब सामने पुरोधा बॉलर खड़े दिखते थे. स्विंग की शहंशाही वसीम और वक़ार दोनों के हाथ में थी. सचिन ने शायद ही अपने बल्ले से उन्हें कोई भी सम्मान देने की कोशिश की होगी.
लेकिन कोहली सचिन की बराबरी कर ले जाएं, ऐसा मुश्किल मालूम देता है. सचिन और कोहली दोनों के अपने अपने फैन्स हैं. दोनों सम्तों के अपने-अपने कारण और लॉजिक हैं. लेकिन यहां बात महज़ रनों की नहीं है. यहां बात महज़ सैकड़ों की संख्या की नहीं है, यहां बात सिर्फ़ कुछ ओवरों में कुछ रन बना लेने की नहीं है. यहां बात है क्रिकेट को जिस हालत में पाया, उससे बेहतर बनाने की. और इस में सचिन तेंदुलकर के आस पास भी कोई नहीं फाटक सकता. शायद कभी भी नहीं.
शारजाह में 1998 में एक तूफ़ान आया था. 22 और 24 अप्रैल. मैच ख़त्म हुआ तो माइकल कैस्प्रोविच ने कहा, "सचिन को बेकार गेंदें कभी मत फेंकना. वो अच्छी गेंदों पर चौका मारता है." मिस्टर क्रिकेट के नाम से मशहूर माइक हसी ने सचिन के बारे में कहा कि सचिन वो बल्लेबाज हैं जिसे अगर अप एक ही जगह पर 6 गेंदें फेंकिये तो वो आपको 6 अलग-अलग जगहों पर मारेगा. सचिन की बड़ाई करने वाले ये प्लेयर्स उस टीम से आते हैं जो क्रिकेट के इतिहास में सबसे ज़्यादा दिनों तक अजेय रहने वाली टीम बनी. 2003 वर्ल्ड कप. इंडिया और ऑस्ट्रेलिया के बीच फाइनल. क्रिकेट के वाल्मीकि हर्षा भोगले ने एक आर्टिकल लिखा. उन्होंने लिखा कि ऑस्ट्रेलिया और वर्ल्ड कप के बीच सिर्फ़ एक ही खिलाड़ी खड़ा है - सचिन रमेश तेंदुलकर. मुझे नहीं याद है कि आखिरी बार कब किसी प्लेयर के ऊपर इस कदर भरोसा जताया गया था. सचिन के बाद भी ऐसा कब ही हुआ?

विराट कोहली जब क्रिकेट में आये, क्रिकेट का सुनहरा काल अपनी ढलान पर था. पोंटिंग, ब्रेट ली, कालिस, अख्तर ये सभी अपने आखिरी पड़ाव पर थे. विरोधी टीमें अचानक से अपना नेतृत्व खोती जा रही थीं. नए सिपहसलार आ रहे थे लेकिन ये सिर्फ इंडियन क्रिकेट की किस्मत में ही लिखा था कि गांगुली के बाद उसे कप्तानी के लिए धोनी मिल जाए. पोंटिंग जैसे विरोधी की खाल के अन्दर घुसकर उन्हें असहज महसूस कराने की कला जानते थे, माइकल क्लार्क में वो कला उसकी आधी ही थी और फिर स्टीव स्मिथ विरोधियों के लिए एकदम ही सौम्य से नज़र आये. इंडिया को कड़ी टक्कर देने वाली एक और टीम श्री लंका ने तो खाईं में छलांग सी मार दी. आज के समय में श्री लंका के वर्ल्ड कप में क्वालीफ़ाई करने के लिए ही लाले पड़े हुए थे. पाकिस्तान की टीम को फ़िक्सिंग ने खोखला किया हुआ है. मोहम्मद आमिर ने वापसी कर 2016 वर्ल्ड टी-20 से ठीक पहले एशिया कप में कोहली की आंखें खोल के रख दी थीं. लेकिन अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. हां, वो चाहे तो उछल कर भड़भूंजे की आंख में ज़ख्म दे सकता है. वो ज़ख्म हमें चैम्पियंस ट्रॉफी फाइनल में मिला.

फ़िक्सिंग के भूत से पीछा छुड़ाकर प्रायश्चित करने की कोशिश में मोहम्मद आमिर
पिछले 5 सालों में क्रिकेट बहुत बदला है. ईरान से तुरान पहुंच गया है. क्रिकेट की क्वालिटी में कमी आई है जिसकी क्वान्टिटी और चकाचौंध से भरपाई करने की कोशिश की जा रही है. सचिन का वक़्त वो था जब क्रिकेट आधुनिक बनने के सफ़र की शुरुआत कर रहा था. इस शुरुआत के लिए भी बहुत हद तक खुद सचिन ही ज़िम्मेदार हैं. 1993 का हीरो कप. कलकत्ता. कैब (क्रिकेट असोसिएशन ऑफ़ बंगाल) ने मैच के ब्रॉडकास्टिंग राइट्स स्टार टीवी को दे दिए. ये पहली बार था जब एक प्राइवेट ब्रॉडकास्टर ऐसे अधिकार पा रहा था. दूरदर्शन ने इसका विरोध किया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में ये फ़ैसला सुनाया कि क्रिकेट के मैचों को टीवी पर दिखाने का अधिकार सिर्फ़ सरकार के लिए रिज़र्व नहीं किया जा सकता. और अचानक दुनिया भर में खेले जा रहे मैच केबल टीवी पर लाइव देखे जा रहे थे.
हर्षा भोगले कहते हैं, "ये एक खुशनुमा इत्तेफ़ाक है कि जब क्रिकेट सैटेलाइट के दौर में पहुंचा, देश के पास पहले से ही एक ऐसा हीरो था जो उनके दिलों पर राज कर रहा था. और इसी वक़्त मल्टीनेशनल कम्पनियों को अपने प्रचार के लिए एक साधन मिल गया था. सचिन ठीक समय पर, ठीक जगह मौजूद था." ये एक ट्रिगर था जिसने व्यापार और क्रिकेट के बीच एक पुल बना दिया. और इस पुल का मुख्य इंजीनियर था सचिन तेंदुलकर.
सचिन की रेंज के बारे में तो ऐसा है कि वो टीम इंडिया की वन-डे टीम में आने वाले 75वें क्रिकेटर थे और जब वो गए तो 118 नए प्लेयर्स के साथ टीम में खेल चुके थे. इन 118 में एक विराट कोहली भी हैं.
जिस वक़्त कोहली ने इंटरनेशनल क्रिकेट खेलना शुरू किया और सचिन का जाना हुआ, प्लेयर्स को टेस्ट मैच के लिए 7 लाख और वन-डे मैच के लिए 4 लाख रुपये मिल रहे थे. जब सचिन ने खेलना शुरू किया था तब एक खिलाड़ी को टेस्ट के लिए 10,000 और वन-डे के लिए मात्र 6500 रुपये मिलते थे. ये बताता है कि सचिन ने किस रेंज में क्रिकेट खेला है. कोहली के लिए क्रिकेट के खेल या देश के लोगों पर ऐसा असर डालना नामुमकिन सा है. कोहली क्रिकेट के आसान दौर में मलाई काट रहे हैं.
विराट कोहली की अपनी ख़ासियत हैं. उन्होंने अपनी देह और दिमाग दोनों ही को मजबूत कर रखा है. क्रिकेट में शायद ही इतना मजबूत खिलाड़ी कभी देखा गया था. दिमागी तौर पर कोहली कमाल के लेवल पर हैं. जिस तरह का उनका चेज़ करने का रिकॉर्ड है, ये साबित हो जाता है कि इनके सामने कोई भी टार्गेट बड़ा नहीं है. सिंगल को डबल में बदल देने के लिए भी कोहली को जाना जाता है. वर्ल्ड टी-20 2016 में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ कोहली ने अपनी रनिंग के बूते ही आधा मैच जीत लिया था.
लेकिन कोहली को मदद मिली है क्रिकेट के बदलते नियमों से. पहले दो नई गेंदों के इस्तेमाल से जिसकी वजह से गेंद ज़्यादा देर ठोस रहती थी, रिवर्स स्विंग कम होती थी. कोहली ने हमेशा पॉवरप्ले में खेला, सचिन ने नहीं. ठोस पिचें, तेज़ आउटफ़ील्ड्स जिसकी वजह से गेंद बल्ले पर अच्छे से आती थी और फिर रुकने का नाम नहीं लेती है. खेलने के बेहतर साज-ओ-सामान. बल्ले से लेकर जूता चप्पल तक नया टेक्नोलॉजी का मिला. बस जिस चीज की कमी हुई वो है चैलेन्ज. वैसा चैलेन्ज जैसा सचिन को मिला था. कोहली को करियर की शुरुआत में वो गेंदें कम खेलने को मिलीं जो आकर सीधे उसकी नाक पर लगतीं. कोहली को मैक्ग्रा जैसे जड़ियल की उठती गेंदें खेलने को नहीं मिलीं. कोहली को सब कुछ सजा हुआ थाल में मिला. धोनी जैसा कप्तान मिला. सचिन को जब थाल मिला तो खिचड़ी बनी हुई थी. उसे दाल और चावल के दानों को अलग-अलग करना पड़ा था.
विराट कोहली हो सकता है कि 18 नहीं 20 हज़ार रन बना दे. हो सकता है कि वो 50 के बदले 75 या 100 सैकड़े जमा दे. लेकिन वो अपनी बैटिंग से एक समूचे देश को नहीं रोक सकता है. वो अपनी स्ट्रेट ड्राइव से इस दुनिया की सबसे सीधी लकीर नहीं खींच सकता. वो किसी खिलाड़ी से ये नहीं कहलवा सकता, "मैंने भगवान को देखा है. वो इंडिया के लिए नम्बर 4 पर खेलता है." वो एक पूरे मैच में जानबूझकर बिना एक भी कवर ड्राइव मारे 241 रन नहीं बना सकता है. वो सचिन के रिकॉर्ड तोड़ सकता है, सचिन की बराबरी नहीं कर सकता.
इतिश्री.
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