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ये बंदर साथियों को 'नाम' से पुकारते हैं, वैज्ञानिकों ने बताया क्या-क्या बोलते हैं?

Nature Science Explained: इंसानों के अलावा डॉल्फिन्स में देखा गया था कि वो किसी दूसरी Dolphin को खास आवाज या ‘नाम’ से पुकार सकती हैं. फिर बताया गया कि Elephants भी ऐसा कर सकते हैं. अब बंदरों को लेकर पता लगा है कि ये महाशय अपने साथियों को ‘नाम’ से बुलाते हैं.

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मार्मोसेट बहुत सामाजिक जीव हैं (सांकेतिक तस्वीर: विकीमीडिया)

दक्षिण अमेरिका (South America) में बंदरों की एक तरह की प्रजाति पाई जाती हैै. जिनको मार्मोसेट (Mormoset) कहा जाता है. देखने में ये कुछ-कुछ गिलहरी जैसे लगते हैं. लेकिन ये बड़े धमाचौकड़ी मचाने वाले होते हैं. लपाक से एक डाली से दूसरी डाली पर कूदते हैं. अब एक हालिया रिसर्च में कहा जा रहा है कि ये महाशय अपने साथियों को ‘नाम’ लेकर बुलाते हैं.

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सबसे पहले तो हम एक जरूरी बात समझ लेते हैं. यहां ‘नाम’ का मतलब अलग-अलग साथियों के लिए खास आवाज निकालने से है. जैसे ‘खीखी’ की आवाज किसी एक साथी के लिए और किसी दूसरे साथी के लिए ‘खीखूखि’ की आवाज निकालना. जाहिर है, बंदर या दूसरे जानवर हम इंसानों की तरह किसी को ‘मूलचंद जी’ तो नहीं बुला पाएंगे.

खैर इंसानों के अलावा डॉल्फिन्स में देखा गया था. वो किसी दूसरी डॉल्फिन को खास आवाज या ‘नाम’ से पुकार सकती हैं. वहीं इसी साल जून के महीने में एक रिसर्च आई. जिसमें AI का इस्तेमाल करके बताया गया कि हाथी भी ऐसा कर सकते हैं. लेकिन इंसानों के ‘करीबी’ बंदरों में ऐसा नहीं देखा गया था. 

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पर साइंस में छपी एक रिसर्च बता रही है कि मार्मोसेट बंदरों को भी इस लिस्ट में शामिल किया जा सकता है. बताया जा रहा है कि ये भी दूसरे साथियों को किसी नाम की तरह खास आवाज से बुला सकते हैं.

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साइंस की इस नई रिसर्च में भी AI की मदद ली गई है. जिससे बंदरों की आवाजों में छुपी नाम जैसी ध्वनियों को पहचाना जा सके.

इनकी खास आवाजें 'फी कॉल्स'

बताया जाता है कि मार्मोसेट बहुत सामाजिक जीव हैं. और अपने साथियों के साथ मजबूत रिश्ता रखते हैं. वो एक तीखी सी, सीटी जैसी आवाज निकालते हैं. जिसे ‘फी कॉल्स (Phee calls)’ कहा जाता है.

द न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक - रिसर्च की अगुवाई कर रहे यूनिवर्सिटी ऑफ जेरुसलेम के न्यूरोसाइंटिस्ट डेविड ओमेर बताते हैं,

जब कोई साथी नजरों से ओझल हो जाता है. तब ये बंदर अपने साथी को फी कॉल्स से बुलाते हैं. इसी के जरिए ये आपस में बात करते हैं.

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पहले साइंटिस्ट्स ने ये भी बताया था कि ‘फी कॉल्स’ में किसी साथी बंदर की पहचान के बारे में कुछ जानकारी होती है.

भाषा की शुरुआत

दरअसल रिसर्चर्स कोशिश में हैं कि नए AI वगैरह के टूल्स का इस्तेमाल करके जानवरों की भाषा को समझा जाए. ताकि ये पता लगाया जा सके कि भाषा कि शुरुआत कहां से हुई. पहली बार भाषा कैसे बनी होगी? इसके लिए साइंटिस्ट्स चूहों की एक प्रजाति, व्हेल, कौओं वगैरह पर भी प्रयोग कर रहे हैं.

अब ‘नाम’ लेने को लेकर आई कई रिसर्च में जानवरों की भाषा को लेकर नई जानकारियां सामने आ रही हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि जितना हम समझते थे, शायद जानवरों में उससे ज्यादा ‘नाम’ का इस्तेमाल होता हो. इस दिशा में अभी और रिसर्च आगे की कहानी में नई कड़ियां जोड़ेंगी.

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