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कौन हैं जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा? जिनसे अरविंद केजरीवाल ने कहा- 'मेरी सुनवाई से हट जाइए'

दिल्ली हाई कोर्ट के गलियारों में इन दिनों एक अलग तरह का कानूनी 'पावर प्ले' चल रहा है. जहां एक तरफ हैं दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और दूसरी तरफ हैं जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा. मामला इतना बढ़ गया है कि केजरीवाल ने साफ़ कह दिया है कि उन्हें जस्टिस शर्मा की बेंच पर भरोसा नहीं है और वो चाहते हैं कि उनके केस की सुनवाई कोई और जज करे. ​तो चलिए, आसान भाषा में समझते हैं कि ये जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा आखिर हैं कौन, केजरीवाल उनसे क्यों कन्नी काट रहे हैं और कानून की दुनिया में 'Recusal' (सुनवाई से हटना) का गणित क्या होता है?

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केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से क्यों कहा, मेरी सुनवाई से हट जाइए?

दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) के गलियारों में इन दिनों एक अजीब सा सन्नाटा है. ऐसा सन्नाटा जो बाहर से शांत दिखता है, लेकिन अंदर से कानूनी बारूद से भरा हुआ है. वजह है एक हाई प्रोफाइल टकराव, जिसमें एक तरफ दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) हैं और दूसरी तरफ दिल्ली हाई कोर्ट की जज जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा (Justice Swarana Kanta Sharma).

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ये कोई साधारण केस नहीं है. ये वो मामला है जिसमें कानून, राजनीति, एजेंसियां, कोर्ट की गरिमा, पब्लिक परसेप्शन और एक पूर्व मुख्यमंत्री की साख सब एक साथ दांव पर हैं. कहानी यहां तक पहुंच चुकी है कि केजरीवाल ने खुलकर कह दिया कि उन्हें जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच पर भरोसा नहीं है. और उन्होंने मांग कर दी कि जस्टिस शर्मा उनके केस की सुनवाई से हट जाएं.

अब सवाल उठता है कि क्या कोई आरोपी या कोई पूर्व सीएम या रसूखदार राजनेता अदालत से कह सकता है कि फलां जज मुझे पसंद नहीं, आप हट जाइए. क्या ये न्याय की मांग है या अपनी पसंद की बेंच खोजने की कोशिश. और सबसे जरूरी बात, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा आखिर हैं कौन, जिनके खिलाफ इतना बड़ा दावा कोर्ट के रिकॉर्ड में डाल दिया गया.

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इस पूरे विवाद में मसाला भी है, कानून भी है, राजनीति भी है और वो सवाल भी है जो हर आम आदमी के दिमाग में आता है. अगर एक पूर्व मुख्यमंत्री अगर जज पर सवाल उठा सकता है, तो क्या एक आम आदमी भी ऐसा कर सकता है. और अगर नहीं, तो क्यों नहीं.

चलिए, अब इस हाई प्रोफाइल कानूनी दंगल को आसान भाषा में, पूरे संदर्भ के साथ समझते हैं. ताकि पढ़कर लगे कि बस, अब अलग से Google करने की जरूरत नहीं.

सबसे पहले समझिए, ये मामला इतना बड़ा क्यों है

दिल्ली शराब नीति केस यानी एक्साइज पॉलिसी केस कोई एक केस नहीं है. ये एक राजनीतिक युद्ध का मैदान बन चुका है. इसमें ED (प्रवर्तन निदेशालय) है, CBI (केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो) है, AAP (आम आदमी पार्हैटी) , बीजेपी (भारतीय जनता पार्टी) है, कोर्ट है, मीडिया है और जनता है.

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अरविंद केजरीवाल इस केस में गिरफ्तार हुए, जेल गए, फिर सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत जैसी स्थिति बनी, फिर कानूनी बहसें तेज हुईं. और इसी पूरे दौर में दिल्ली हाई कोर्ट में कई याचिकाएं पहुंचीं. कहीं गिरफ्तारी को चुनौती, कहीं रिमांड, कहीं जांच एजेंसी के अधिकारों पर सवाल, कहीं जमानत.

और इसी दौरान एक नाम बार बार सामने आया. जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा.

केजरीवाल की टीम का आरोप है कि जस्टिस शर्मा ने पहले के आदेशों में ऐसी टिप्पणियां कीं, जिससे लगता है कि जज पहले से मन बना चुकी हैं. इसी आधार पर मांग की गई कि वे इस केस से खुद को अलग करें.

यहां कहानी सिर्फ एक केस की नहीं रह जाती. ये न्यायपालिका की निष्पक्षता या फिर यूं कहें कि perception की कहानी बन जाती है. और धारणा (perception) का असर लोकतंत्र में बहुत भारी होता है.

कौन हैं जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा? सिर्फ नाम नहीं, पूरा बैकग्राउंड समझिए

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा दिल्ली हाई कोर्ट की उन जजों में गिनी जाती हैं जिन्हें सख्त, टेक्निकल और सबूतों पर आधारित सोच (evidence driven approach) के लिए जाना जाता है. उनकी छवि एक ऐसी जज की है जो कोर्टरूम में भावनाओं से ज्यादा कानून की भाषा को तवज्जो देती हैं.

उनका करियर सिर्फ हाई कोर्ट तक सीमित नहीं रहा. वे उस सिस्टम से निकली हैं जहां रोज हजारों आम लोग आते हैं. छोटे विवाद, घरेलू झगड़े, जमीन के केस, धोखाधड़ी, क्रिमिनल ट्रायल, गवाही, जमानत, पुलिस की चार्जशीट, सब कुछ.

यानी उन्होंने कानून की किताब सिर्फ पढ़ी नहीं है, उसे जिया भी है.

वकालत से शुरुआत

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने 1991 में दिल्ली बार काउंसिल में बतौर वकील रजिस्ट्रेशन कराया था. ये वो दौर था जब दिल्ली की अदालतों में डिजिटल सबूत नहीं होते थे, CCTV का जमाना नहीं था, और मोटी-मोटी फाइलों का चलन था.

उस दौर में वकालत का मतलब था रोज कोर्ट जाना, बहस करना, जजों के सामने दलील (arguments) रखना, और सिस्टम की कमजोरियों को बहुत पास से देखना.

दिल्ली हायर जुडिशल सर्विस में एंट्री

साल 2002 में वे दिल्ली हायर जुडिशल सर्विस में शामिल हुईं. यहां से उनका रोल बदल गया. अब वे बहस करने वाली नहीं, बहस सुनकर फैसला देने वाली बन गईं.

यहां से उनका सफर असल में शुरू होता है. क्योंकि DHJS का मतलब है निचली अदालतों में क्रिमिनल और सिविल मामलों की सुनवाई. यही वो जगह है जहां भारत का न्याय तंत्र असल में सांस लेता है.

यहीं पर जज को पता चलता है कि एक FIR कैसे बनती है, पुलिस कैसे जांच करती है, गवाह कैसे पलटते हैं, और केस कैसे कमजोर या मजबूत होते हैं.

प्रिंसिपल जिला और सत्र न्यायाधीश तक पहुंच

हाई कोर्ट में आने से पहले वे साकेत कोर्ट में प्रिंसिपल जिला और सत्र न्यायाधीश जैसे पावरफुल पद पर रह चुकी हैं. यह कोई सामान्य पोस्ट नहीं है. यहां जज सिर्फ केस नहीं सुनता, बल्कि अदालत के प्रशासन, न्यायिक अनुशासन और केस मैनेजमेंट की जिम्मेदारी भी संभालता है.

इस पद पर बैठने वाला जज हजारों केसों की दिशा तय करता है. यही वजह है कि जस्टिस शर्मा को कोर्ट मैनेजमेंट और केस प्रोसेसिंग का अच्छा अनुभव माना जाता है.

दिल्ली हाई कोर्ट में जज बनीं

28 मार्च 2022 को उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट के जज के रूप में शपथ ली. अब यहां एक बात समझनी जरूरी है. हाई कोर्ट में आने के बाद जजों पर दबाव अलग होता है. यहां सिर्फ कानून नहीं, पब्लिक इंटरेस्ट, मीडिया scrutiny और राजनीतिक असर भी जुड़ जाता है.

और जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा का नाम हाई प्रोफाइल मामलों में लगातार सामने आने लगा.

जस्टिस शर्मा की पहचान क्या है

कानूनी गलियारों में उनकी पहचान एक सख्त व्याख्या (strict interpretation) करने वाली जज के रूप में बनती है. यानी कानून के शब्दों को पकड़कर चलने वाली. किसी भी पक्ष को सिर्फ सहानुभूति (sympathy) के आधार पर राहत देने वाली नहीं.

साथ ही यह भी कहा जाता है कि वे डिजिटल एविडेंस, टेक्निकल दस्तावेज और प्रक्रियात्मक अनुपालन (procedural compliance) को लेकर काफी सख्त हैं. यही वजह है कि ED और CBI जैसे मामलों में जहां पेपरवर्क और डिजिटल ट्रायल अहम होता है, वहां उनके आदेशों पर सबकी नजर रहती है. 

और अब आते हैं असली सवाल पर…

केजरीवाल और जस्टिस शर्मा की खटास शुरू कहां से हुई

कहानी का बड़ा मोड़ आया 9 अप्रैल 2024 को. जब अरविंद केजरीवाल ने अपनी गिरफ्तारी को चुनौती दी थी. उनका तर्क था कि गिरफ्तारी गलत है, प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, और राजनीतिक बदले की भावना से काम किया गया.

लेकिन जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच ने केजरीवाल की याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने माना कि ED के पास गिरफ्तारी के लिए पर्याप्त आधार थे.

यहीं से टेंशन शुरू हुई. क्योंकि कोर्ट ने सिर्फ याचिका खारिज नहीं की. कोर्ट ने अपने आदेश में कुछ टिप्पणियां भी कीं. और वही टिप्पणियां केजरीवाल की टीम को चुभ गईं.

कौन सी टिप्पणियां विवाद की जड़ बनीं

कोर्ट ने कहा कि अदालतें राजनीति का अखाड़ा नहीं हैं. कोर्ट ने यह भी साफ किया कि कानून किसी आम आदमी और मुख्यमंत्री में फर्क नहीं करता. और कोर्ट ने यह माना कि जांच एजेंसी को अधिकार है कि वह पूछताछ के लिए बुला सकती है, चाहे आरोपी का कद कितना भी बड़ा क्यों न हो.

अब ये बातें तकनीकी रूप से देखें तो कानून की किताब में बिल्कुल फिट बैठती हैं. लेकिन राजनीति की भाषा में ये टिप्पणी बहुत तीखी लगती हैं. 

AAP का मानना है कि अदालत की भाषा में टोन न्यूट्रल होनी चाहिए. जबकि कोर्ट का नजरिया यह होता है कि यदि कोई पक्ष कोर्ट को राजनीतिक मंच बनाता दिखे, तो कोर्ट उसे रोकने के लिए ऐसी टिप्पणियां करता है.

यहीं से केजरीवाल की टीम को लगने लगा कि जस्टिस शर्मा का रुख उनके प्रति शत्रुतापूर्ण (hostile) हो सकता है.

रिक्यूजल (Recusal) क्या होता है. और केजरीवाल ने मांग क्या की है

अब आते हैं उस शब्द पर जिसने पूरे विवाद को आग लगा दी. Recusal. रिक्यूजल का मतलब है कि जज खुद को किसी केस की सुनवाई से अलग कर ले. यानी कह दे कि मैं इस मामले में नहीं बैठूंगा या बैठूंगी. यह केस किसी दूसरी बेंच को भेजा जाए.

केजरीवाल की दलील क्या है

केजरीवाल की तरफ से जो दलील दी गई, उसका सार यही है कि पिछले आदेशों में जस्टिस शर्मा ने ऐसी टिप्पणियां की हैं, जिससे लगता है कि उन्होंने पहले से धारणा बना ली है.

और अगर जज पहले से मन बना चुका हो, तो निष्पक्ष सुनवाई का भरोसा खत्म हो जाता है. केजरीवाल का तर्क है कि न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए. यानी जनता को भी दिखना चाहिए कि कोर्ट impartial है.

उनकी मांग यह भी है कि शराब नीति केस से जुड़ी उनकी याचिकाएं किसी दूसरी बेंच को ट्रांसफर की जाएं.

Recusal का कानून क्या कहता है? क्या जज को मजबूर किया जा सकता है

यहां असली पेंच है. भारत में किसी भी जज को recuse करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. यह पूरी तरह जज का अपना फैसला होता है.

मतलब अगर जज को लगता है कि उनका कोई कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इनरेस्ट (conflict of interest) है, तब वे खुद हट जाते हैं. जैसे अगर केस में किसी रिश्तेदार का नाम हो, या पहले उन्होंने उस केस में किसी पार्टी की तरफ से वकालत की हो, या उनका कोई निजी जुड़ाव हो.

लेकिन अगर कोई पक्ष दबाव डालकर कहे कि आप हट जाइए, तो जज इसे बेंच हंटिंग (bench hunting) मान सकता है.

बेंच हंटिंग क्या है

बेंच हंटिंग का मतलब होता है कि पार्टी अपनी पसंद का जज खोजने की कोशिश कर रही है. मतलब जिसे लगता है कि फलां जज से राहत नहीं मिलेगी, वो जज बदलवाने की कोशिश करे.

कोर्ट के नजरिए से यह न्याय व्यवस्था के लिए खतरा है. क्योंकि अगर हर आरोपी जज बदलवाने लगे, तो न्यायपालिका का सिस्टम ठप हो जाएगा. यही वजह है कि कई मामलों में जजों ने recusal की मांग को सख्ती से खारिज किया है.

केजरीवाल की मांग में दम है या नहीं? दोनों पक्षों का नजरिया समझिए

अब इस पूरे विवाद में दो साइड हैं. और दोनों के अपने अपने मजबूत तर्क हैं.

केजरीवाल पक्ष का तर्क

केजरीवाल की टीम कहती है कि अदालत का टोन और “भविष्य की सुनवाई का अवलोकन” (observations future hearing) को प्रभावित कर सकते हैं. उनका कहना है कि अगर जज पहले ही कह चुके हैं कि एजेंसी के पास पर्याप्त सामग्री है, तो आगे की सुनवाई में राहत मिलने की संभावना कम हो जाती है.

यहां वे न्यायिक पूर्वाग्रह (judicial bias) की बात करते हैं. यानी सोच समझकर (conscious) या अनजाने में (unconscious) पूर्वाग्रह से ग्रसित होना. और वे इसी आधार पर चाहते हैं कि नया जज इस मामले को फ्रेश माइंड से सुने.

दूसरी तरफ कोर्ट और सिस्टम का नजरिया

दूसरी तरफ अदालत और कानूनी सिस्टम यह कहता है कि सिर्फ इसलिए recusal नहीं हो सकता कि किसी पार्टी को आदेश पसंद नहीं आया. अगर किसी जज ने याचिका खारिज की है, तो इसका मतलब यह नहीं कि जज पूर्वाग्रह से ग्रसित है. इसका मतलब यह है कि उस समय जो तथ्य और कानून थे, उसके आधार पर फैसला हुआ.

और अगर हर हारने वाला पक्ष जज बदलने की मांग करने लगे, तो न्यायपालिका कमजोर हो जाएगी. यहां कोर्ट की गरिमा और निष्पक्षता का सवाल आता है.

असली कहानी जो बोली नहीं जा रही!

अब इस विवाद को अगर सिर्फ कानूनी चश्मे से देखेंगे तो लगेगा कि यह प्रक्रियात्मक मुद्दा (procedural issue) है. लेकिन असल में मामला धारणा बनाने की जंग (perception war) का है.

केजरीवाल की राजनीतिक गणित

केजरीवाल इस समय राजनीतिक रूप से एक नैरेटिव चला रहे हैं कि एजेंसियां केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रही हैं. उनके लिए यह साबित करना जरूरी है कि उन्हें उचित व्यवहार (fair treatment) नहीं मिल रहा.

अगर वे recusal मांगते हैं, तो उनके समर्थकों के बीच यह संदेश जाता है कि वे न्याय के लिए लड़ रहे हैं. और अगर recusal खारिज हो जाता है, तब भी उनके पास यह कहने का मौका होता है कि देखिए, सिस्टम हमारे खिलाफ है.

यह राजनीति का क्लासिक विन-विन नैरेटिव है.

कोर्ट की संस्थागत गणित (institutional calculus)

कोर्ट के लिए यह लड़ाई अपनी साख (credibility) की है. अगर कोर्ट recusal मांग पर झुक जाता है, तो इससे यह मिसाल (precedent) बन सकता है कि हाई प्रोफाइल लोग दबाव डालकर बेंच बदलवा सकते हैं.

यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खराब संकेत होगा. यही वजह है कि अदालतें recusal के मामलों में बहुत सतर्क रहती हैं.

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के बड़े फैसले. किस तरह की जज मानी जाती हैं

जस्टिस शर्मा के आदेशों में कुछ पैटर्न दिखते हैं. भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में वे तकनीकी अनुपालन (technical compliance) और सबूतों (evidence) को प्राथमिकता देती दिखती हैं.

महिला अधिकारों से जुड़े मामलों में उनके आदेश कई बार सख्त रहे हैं. डिजिटल एविडेंस, CCTV, कॉल रिकॉर्ड, चैट, और प्रक्रिया के दस्तावेजीकरण (procedural documentation) पर उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है.

उनके दृष्टिकोण (approach) का एक कॉमन हिस्सा यह है कि वे जांच एजेंसी के अधिकारों को पूरी तरह खत्म करने वाली नहीं हैं, लेकिन एजेंसी को कानून के दायरे में रहने की नसीहत भी करती हैं.

यानी वे ना पूरी तरह प्रॉसीक्यूशन फ्रेंडली कहलाती हैं, ना डिफेंस फ्रेंडली. बल्कि वो लॉ और प्रॉसेस फ्रेंडली. और यही बात कई बार आरोपी (accused) पक्ष को असहज (uncomfortable) कर देती है.

यह केस सिर्फ केजरीवाल का नहीं, आम आदमी के लिए इसका मतलब क्या है

अब सवाल उठता है कि एक आम आदमी को इससे क्या लेना देना. सीधा जवाब है, बहुत लेना देना है. आम आदमी का केस अगर कोर्ट में फंस जाए तो भारत में न्याय मिलने में समय लगता है. नीती आयोग और कई सरकारी रिपोर्ट्स बार बार कह चुकी हैं कि लंबित कोर्ट केस भारत की बड़ी समस्या है.

डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट तक लाखों केस लंबित हैं. ऐसे में अगर recusal जैसे आवेदन बढ़ने लगे, तो देरी और बढ़ेगी. आम आदमी का केस पहले ही 5 साल, 10 साल खिंचता है. अगर हर केस में जज बदलने की मांग होने लगी, तो न्याय और दूर हो जाएगा.

मिडिल क्लास का एंगल

मिडिल क्लास आदमी कोर्ट से डरता है. क्योंकि कोर्ट का मतलब है वकील की फीस, तारीख पर तारीख, और मानसिक तनाव. अब अगर उसे लगे कि हाई प्रोफाइल लोग जज बदलवा सकते हैं, तो सिस्टम पर भरोसा और कमजोर होगा.

यानी इस लड़ाई में एक ना दिखाई देने वाला पक्ष (invisible stakeholder) भी है. भारत का मध्यम वर्गीय करदाता.

न्यायपालिका बनाम एजेंसियां का नया मॉडल बन रहा है

पिछले 10 साल में भारत में एक ट्रेंड साफ दिखा है. ED और CBI जैसी एजेंसियों की भूमिका बहुत बढ़ी है. मनी लॉन्ड्रिंग, बैंक फ्रॉड, आर्थिक अपराध, राजनीतिक भ्रष्टाचार. इन सबमें ED की भागीदारी बढ़ी है. सरकार का तर्क होता है कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए एजेंसियों को मजबूत करना जरूरी है.

विपक्ष का आरोप होता है कि एजेंसियां राजनीतिक हथियार बन गई हैं. और कोर्ट इसी रस्साकशी (tug of war) का रेफरी बन चुका है.

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की भूमिका

सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट बार बार यह कहते हैं कि एजेंसी के पास पावर है, लेकिन वो पावर नियंत्रण से परे (power absolute) नहीं है. अदालतें तय प्रकिया, गिरफ्तारी की प्रक्रिया, जमानत का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जोर देती हैं.

इसी संतुलन को बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है. केजरीवाल का मामला इसी बड़ी नीतिगत बहस (larger policy debate) का हिस्सा बन चुका है.

इन मामलों से बाजार को क्या संदेश जाता है

आप सोचेंगे कि जज और केजरीवाल की लड़ाई से बिजनेस का क्या लेना देना. केजरीवाल बनाम जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा. दिल्ली हाई कोर्ट का वो पावर प्ले, जिसने राजनीति और न्यायपालिका को आमने-सामने खड़ा कर दिया

लेकिन इकोनॉमिक परसेप्शन (economic perception) का खेल बड़ा खतरनाक होता है. जब बड़े नेताओं और बड़े मामलों में कानूनी अनिश्चितता (legal uncertainty) बढ़ती है, तो निवेशकों का भरोसा प्रभावित होता है.

शराब नीति केस और उद्योग जगत पर असर

दिल्ली की शराब नीति एक बिजनेस मॉडल से जुड़ी थी. रिटेल लाइसेंस, होसेल ठेके, डिस्ट्रीब्यूशन चेन. इस केस ने शराब इंडस्ट्री, हॉस्पिटैलिटी सेक्टर (hospitality sector) और दिल्ली के रेवेन्यू मॉडल को प्रभावित किया.

इससे सरकारों को यह सबक भी मिला कि पॉलिसी रिफॉर्म जितने बोल्ड होंगे, उतने ही ज्यादा कानूनी जांच (legal scrutiny) में आएंगे. बिजनेस मॉडल में मैसेज यह जाता है कि रेगुलेटरी बदलाव (regulatory changes) का डॉक्यूमेंटेशन और पारदर्शिता बहुत मजबूत होनी चाहिए.

जनता कोर्ट से क्या उम्मीद करती है

भारत में कोर्ट को लोग आखिरी उम्मीद मानते हैं. लेकिन कोर्ट की साख सिर्फ फैसलों से नहीं बनती, धारणा से भी बनती है. अगर लोग मानने लगें कि जज पक्षपाती हैं, तो लोकतंत्र की नींव हिलती है.

और अगर लोग मानने लगें कि बड़े लोग जज बदलवा सकते हैं, तो भी फाउंडेशन हिलती है. यानी दोनों तरफ खतरा है. इसलिए recusal का मुद्दा इतना संवेदनशी है. यह सिर्फ कानून नहीं, जनता के विश्वास का मामला है.

पूरा घटनाक्रम किस तरह बढ़ा

यहां पूरा घटनाक्रम संक्षेप में समझिए ताकि दिमाग में map बन जाए.

  • दिल्ली शराब नीति लागू हुई.
  • नीति पर आरोप लगे.
  • CBI और ED की जांच शुरू हुई.
  • AAP के कई नेता गिरफ्तार हुए.
  • अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी हुई.
  • केजरीवाल ने गिरफ्तारी को चुनौती दी.
  • दिल्ली हाई कोर्ट में मामला आया.
  • 9 अप्रैल 2024 को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने गिरफ्तारी के खिलाफ याचिका खारिज की.
  • कोर्ट की टिप्पणियां चर्चा में आईं.
  • फिर केजरीवाल ने recusal की मांग रख दी.

अब इस recusal एपिसोड ने केस को एक नए मोड़ पर ला दिया है.

जस्टिस शर्मा recuse कर लेती हैं तो क्या होगा

अगर जस्टिस शर्मा सुनवाई से हट जाती हैं, तो केस किसी दूसरी बेंच को चला जाएगा. इसका तत्काल असर यह होगा कि सुनवाई नए सिरे से होगी. नई बेंच पुराने आदेशों से बंदी रहेगी, लेकिन अप्रोच अलग हो सकती है.

राजनीतिक तौरपर केजरीवाल को यह नैतिक जीत मिलेगी कि उनकी बात सुनी गई. लेकिन संस्थागत तौरपर कोर्ट के लिए यह संवेदनशील होगा, क्योंकि इससे भविष्य में और recusal की मांग बढ़ सकती हैं.

अगर जस्टिस शर्मा recuse नहीं करतीं तो क्या होगा

अगर जस्टिस शर्मा recusal से इनकार करती हैं, तो केजरीवाल के पास विकल्प होंगे. वे सुप्रीम कोर्ट में जा सकते हैं. वे यह कह सकते हैं कि हाई कोर्ट में उन्हें निष्पक्ष सुनवाई का भरोसा नहीं है.

लेकिन यहां जोखिम यह है कि सुप्रीम कोर्ट इसे मनपसंद जज रखवाने (bench hunting) की कोशिश मान सकता है. और अगर सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त टिप्पणी कर दी, तो केजरीवाल की लीगल स्ट्रैटेजी को नुकसान हो सकता है.

क्या जज की पुरानी टिप्पणी भविष्य के फैसले को प्रभावित करती है

यह बहुत बड़ा सवाल है. कानूनी सिद्धांत कहता है कि हर सुनवाई तथ्यों और कानून पर आधारित होती है. लेकिन प्रैक्टिकल रिएलिटी यह है कि जज का दिमाग ऑब्जर्वेशन से शार्प होता है. अगर किसी आदेश में कड़ी भाषा है, तो अगली सुनवाई में आरोपी पक्ष को डर लगता है.

इसीलिए बचाव पक्ष के वकील अक्सर recusal की मांग करते हैं.

लेकिन अदालतें आम तौरपर यही कहती हैं कि ज्यूडिशियल रिमार्क को पक्षपातपूर्ण नहीं माना जा सकता, जब तक व्यक्तिगत हित या साफ तौरपर पूर्वाग्रह साबित न हो.
यानी पक्षपातपूर्ण साबित करना बहुत मुश्किल है.

इस विवाद से न्यायपालिका को क्या खतरा है

यह मामला हाई प्रोफाइल है. मीडिया में है. जनता देख रही है. ऐसे में न्यायपालिका के लिए सबसे बड़ा खतरा है कि लोग इसे पॉलिटिकल मैच समझने लगें. कोर्ट की अथॉरिटी इस बात पर टिकी होती है कि लोग कोर्ट को न्यूट्रल रेफरी (neutral referee) मानें. 

अगर कोर्ट पर भरोसा घटा, तो लोकतंत्र में अराजकता बढ़ती है. इसलिए अदालतें इस तरह के मामलों में भाषा और आचरण को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरततीं हैं.

केजरीवाल के लिए ये केस नहीं सियासी भविष्य का सवाल

केजरीवाल के लिए यह केस सिर्फ जमानत या गिरफ्तारी का नहीं है. यह उनके पॉलिटिकल ब्रांडिंग का मामला है. उनका ब्रांड बना था भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा (anti-corruption crusader) का. अब वही आदमी भ्रष्टाचार और मनी लॉड्रिंग के केस में घिरा है.

उनके लिए नैरेटिव कंट्रोल जरूरी है. और recusal मांग नैरेटिव कंट्रोल का एक हिस्सा है. अगर वे यह दिखा दें कि उनके साथ अनफेयर ट्रीटमेंट हो रहा है, तो उनके समर्थक उनके साथ बने रहेंगे.

और अगर वे यह नहीं दिखा पाए, तो विपक्ष उनके खिलाफ करप्शन का लेबल और मजबूत करेगा.

BJP और केंद्र सरकार का नजरिया क्या है

BJP की तरफ से नैरेटिव सीधा है. उनका कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है. जांच एजेंसियां सबूतों के आधार पर काम कर रही हैं. और कोर्ट ने भी कहा कि गिरफ्तारी में दम है.

BJP यह भी कहती है कि केजरीवाल हमदर्दी लेने के लिए अदालतों पर दबाव बना रहे हैं. उनके लिए यह मौका है AAP को एंटी करप्शन पॉलिटिक्स से बाहर निकालने का.

AAP का नजरिया क्या है

AAP कहती है कि यह केस राजनीतिक प्रतिशोध (political vendetta) है. उनका आरोप है कि ED और CBI का इस्तेमाल विपक्ष को दबाने के लिए किया जा रहा है.
AAP का कहना है कि जब चुनाव आते हैं, तब जांच तेज हो जाती है.

AAP के लिए यह लड़ाई लोकतंत्र बचाने की लड़ाई बनाकर पेश की जा रही है.

जनता किस तरफ है: जमीनी हकीकत क्या कहती है

दिल्ली की जनता दो हिस्सों में बंटी हुई दिखती है. एक हिस्सा मानता है कि केजरीवाल के साथ राजनीतिक बदले की भावना के तरहत एक्शन हो रहा है. दूसरा हिस्सा मानता है कि केजरीवाल भी बाकी नेताओं जैसे ही निकले, फर्क सिर्फ मार्केटिंग का था.

यह केस चुनावी राजनीति में एक बड़ा हथियार बन चुका है. और यही वजह है कि अदालत का हर शब्द हेडलाइन बन रहा है.

इस पूरे विवाद का लॉन्ग टर्म असर क्या होगा

यहां शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म दोनों असर हैं.

शॉर्ट टर्म असर
  • केस की सुनवाई और ज्यादा चर्चा में आएगी.
  • मीडिया ट्रायल तेज होगा.
  • AAP खुद को विक्टिम की तरह पेश करेगी
  • BJP इसे करप्शन नैरेटिव में बदलना चाहेगी
  • अदालत पर दबाव बढ़ेगा कि वह भाषा पर कंट्रोल रखे.
लॉन्ग टर्म असर

Recusal के मुद्दे पर एक बड़ा मिसाल बन सकता है. अगर अदालतें कड़ा रुख अपनाती हैं, तो भविष्य में राजनीतिक आरोपियों के लिए recusal मांगना मुश्किल होगा. अगर कोर्ट नरम पड़तीे हैं, तो बेंच हंटिंग का खतरा बढ़ेगा.

इसके अलावा एक बड़ा असर यह होगा कि ED और CBI की शक्तियों पर बहस और तेज होगी. भारत में एजेंसियों की ताकत बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मुद्दा अगले कई साल तक राजनीति और कानून का कोर बैटल रहेगा.

क्या इससे आम आदमी को कोई सीख मिलती है

जवाब है हां, और बहुत प्रैक्टिकल सीख मिलती है.

1. कोर्ट में ‘जुबान संभाल के’: अगर आप अदालत में जाते हैं, तो आपको समझना होगा कि इमोशनल स्पीच नहीं, तथ्यों पर आधारित जिरह काम आती है.

2. डॉक्यूमेंटेशन सबसे बड़ा हथियार है: ED और CBI जैसे मामलों में डिजिटल ट्रायल और पेपरवर्क ही सब कुछ है. अगर आप बिजनेस करते हैं, या टैक्स, GST, या किसी भी compliance वाली दुनिया में हैं, तो डॉक्यूमेंटेशन कमजोर हुआ तो आप फंस सकते हैं.

3. परसेप्शन भी लीगल रिएलिटी बन जाता है: अगर आपके केस में परसेप्शन खराब बन गया, तो अदालत में लड़ाई कठिन हो जाती है. इसलिए पब्लिक स्टेटमेंट, प्रेस कॉन्फ्रेंस और आरोप प्रत्यारोप का असर कोर्टरूम में अप्रत्यक्ष तौरपर पड़ता है.

4. जमानत और गिरफ्तारी का कानून बहुत पेंचीदा है: भारत में जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि जमानत नियम है, जेल अपवाद. लेकिन मनी लॉन्ड्रिंग लॉ जैसे PMLA में बेल का नियम उल्टा हो जाता है. यही वजह है कि ED वाले केस लंबे चलते हैं.

सिस्टम में क्या सुधर सकता है

अब सवाल है कि यह सब देखकर आम आदमी सिर्फ पॉपकॉर्न लेकर देखता रहे या कुछ सीख भी ले. कुछ चीजें हैं जो सिस्टम लेवल पर बदल सकती हैं.

1. Recusal गाइडलाइन ज्यादा स्पष्ट होनी चाहिए: भारत में recusal का कोई संहिताबद्ध (codified) कानून नहीं है. यह मोटे तौरपर चल रही परंपराओं और चलन पर आधारित हैै. अगर सुप्रीम कोर्ट या संसद एक तयशुदा गाइडलाइन बना दे कि किन परिस्थितियों में recusal जरूरी होगा, तो विवाद कम होंगे.

2. एजेंसियों की जवाबदेही बढ़नी चाहिए: ED और CBI जैसी एजेसियों असीमित अधिकार मिले हैं. लेकिन पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठते रहते हैं. अगर इनके लिए स्वतंत्र निरीक्षण मजबूत हो, तो पॉलिटिकल मिस्यूज का परसेप्शन घटेगा.

3. अदालती आदेशों की भाषा पर ट्रेनिंग: जज की स्वतंत्रता सर्वोपरि है, लेकिन हाई प्रोफाइल मामलों में भाषा जन विश्वास को प्रभावित करती है. इसलिए संतुलित शब्दों और कम से कम टिप्पणी वाली सोच कई बार बेहतर होती है.

आगे क्या हो सकता है? 

अब तीन परिदृश्य (scenarios) बनते हैं.

परिदृश्य 1: जस्टिस शर्मा खुद हट जाती हैं

इससे केजरीवाल को मॉरल बूस्ट मिलेगा. केस नई बेंच में जाएगा. लेकिन इससे recusal कल्चर को बढ़ावा मिलने का खतरा होगा.

परिदृश्य 2: जस्टिस शर्मा हटने से इनकार करती हैं

केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट जाएंगे. वहां यह तय होगा कि क्या उनकी ये आशंका सही है या बेंच हंटिंग.

परिदृश्य 3: सुप्रीम कोर्ट व्यापक गाइडलाइंन दे

यह सबसे बड़ा और असरदार परिदृश्य होगा. अगर सुप्रीम कोर्ट recusal और bench hunting पर बड़ी गाइडलाइन दे देता है, तो भारत की ज्यूडिशरी में लॉन्ग टर्म बदलाव आएगा. और इस पूरे विवाद का असर सिर्फ केजरीवाल तक सीमित नहीं रहेगा.

यह लड़ाई किसकी जीत और किसकी हार तय करेगी

दिल्ली हाई कोर्ट का यह पावर प्ले सिर्फ केजरीवाल बनाम जस्टिस शर्मा नहीं है. यह उस लाइन की लड़ाई है जो लोकतंत्र में बहुत महीन होती है. एक तरफ जनता का चुना हुआ नेता. दूसरी तरफ संविधान की रक्षा करने वाली संस्था.

अगर नेता अदालतों पर भरोसा खोने लगे, तो लोकतंत्र कमजोर होता है. और अगर अदालतें नेताओं की आलोचना से डरने लगें, तो न्यायपालिका कमजोर होती है.
यही वजह है कि यह केस भारत की राजनीति और न्यायपालिका के रिश्ते का लिटमस टेस्ट बन चुका है.

केजरीवाल को शायद अपने केस में राहत मिले या ना मिले. जस्टिस शर्मा recuse करें या ना करें. लेकिन इस विवाद ने एक बात तय कर दी है. भारत में अदालतें अब सिर्फ कोर्ट रूम तक सीमित नहीं रहीं. वे पब्लिक परसेप्शन और पॉलिटिकल नैरेटिव की फ्रंटलाइन बन चुकी हैं. और यही सबसे बड़ी कहानी है.

इस केस का असली फैसला सिर्फ बेल या अरेस्ट नहीं होगा. असली फैसला होगा कि भारत का सिस्टम बेंच हंटिंग से बचेगा या परसेप्शन वॉर में फंस जाएगा.

अब सबकी नजरें दिल्ली हाई कोर्ट की उस कुर्सी पर हैं, जहां जज बैठता है. और उस याचिका पर भी, जिसमें एक पूर्व मुख्यमंत्री ने साफ लिखा है, 

"मुझे इस बेंच पर भरोसा नहीं."

यही लाइन इस पूरे युग की सबसे बड़ी बहस बन गई है.  

वीडियो: राजधानी: राघव चड्ढा और केजरीवाल के रिश्ते में दरार कैसे आई?

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