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Artemis II के एस्ट्रोनॉट्स को NASA ने 5 तीखी चटनियां क्यों दी हैं?

Artemis II astronauts Food menu: अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने आर्टेमिस II क्रू के लिए 189 तरह की खाने की चीजें दी हैं. इनमें चाय, कॉफी, लेमोनोडा, चॉकलेट स्प्रेड, पीनट बटर, स्ट्रॉबेरी जैम, शहद, दालचीनी, बादाम बटर शामिल हैं .NASA के अनुसार, क्रू को एनर्जी देने के लिए 43 कप कॉफी की भी जरूरत होती है.

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Artemis क्रू अपने साथ 189 तरह के खाने के सामान लेकर गए हैं. (फोटो-Pexels)
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रदीफा कबीर

अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने Artemis II क्रू के लिए 189 तरह की खाने की चीजें दी हैं. इनमें चाय, कॉफी, लेमोनोडा, चॉकलेट स्प्रेड, पीनट बटर, स्ट्रॉबेरी जैम, शहद, दालचीनी, बादाम बटर शामिल हैं. क्रू के पास मीठे का भी ऑप्शन है. मतलब कुछ मीठा खाने का मन किया तो कुकीज, चॉकलेट, केक, पुडिंग भी है. NASA के अनुसार, क्रू को एनर्जी देने के लिए 43 कप कॉफी की भी व्यवस्था है.

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ये सब ठीक है. लेकिन क्रू के लिए नासा ने 5 तरह की हॉट सॉस भी रखी हैं. ऐसे में सवाल आया है कि अंतरिक्ष यात्री जेरेमी हैनसेन, मिशन स्पेशलिस्ट क्रिस्टीना कोच, कमांडर रीड वाइजमैन और पायलट विक्टर ग्लोवर को इतने तीखेपन की क्या जरूरत है? तो इसका जवाब है वातावरण का बदल जाना और हमारा शरीर का अलग तरह से रिएक्ट करना. कहें तो मिर्च क्रू को एक स्वाद देती है, जो स्पेस में कोई और खाना नहीं दे पाता.  

स्पेस और तीखेपन का कनेक्शन

इंडिया टुडे से जुड़ीं रदीफा कबीर की रिपोर्ट के मुताबिक, ओरियन कैप्सूल के अंदर का माहौल अलग होता है. धरती पर ग्रैविटी तरल को नीचे की तरफ खींचती है. लेकिन माइक्रोग्रैविटी (स्पेस) में ये खिंचाव खत्म हो जाता है और फ्लूड छाती, चेहरे और सिर की ओर बढ़ने लगता है. इसका असर सबसे पहले चेहरे पर दिखाई देता है. गाल सूजे हुए लगते हैं. साइनस में ऐसा तरल पदार्थ भर जाता है, जिसे रोकने के लिए वे बने ही नहीं थे. नाक के रास्ते संकरे हो जाते हैं और उनमें जमाव हो जाता है.   

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क्रू के साथ स्पेस गए फूड आइटम. (फोटो-नासा)

लोगों को अक्सर लगता है कि मीठा, नमकीन, खट्टा, कड़वा आदि का स्वाद बताने में सिर्फ जीभ ही सारा रोल प्ले करती है. मगर ऐसा नहीं है. जीभ दिमाग को सिग्नल पहुंचाती है और यहां नाक भी मिलकर काम करती है. दरअसल, एरोमेटिक कंपाउंड खाने चबाने और निगलने के दौरान मुंह के पिछले हिस्से से नेज़ल कैविटी तक पहुंचते हैं. जहां ओल्फेक्ट्री रिसेप्टर्स उन्हें पहचानते हैं और ब्रेन को टेस्ट के एक्सपीरियंस के लिए सिग्नल भेजते हैं. इस प्रक्रिया को रेट्रोनेजल ऑल्फेक्शन कहा जाता है.

ऐसे में जब खाने की खुशबूदार महक नाक के उन रास्तों की ओर बढ़ती है, जो सूजे हुए और ज्यादातर बंद होते हैं, तो फूड में कुछ स्वाद ही नहीं आता. कोई व्यक्ति जिस चीज को स्वाद समझता है वो लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा उसकी महक होती है. फ्लेवर, टेस्ट और सुंगध का एक मेल होता है. स्पेस के अंदर पैक खाने का छठवें दिन तक स्वाद भी बदलने लगता है. और नाक की वजह से बचा खुचा टेस्ट भी खत्म हो जाता है. इसलिए यहीं पर काम आती है तीखी चटनी. और इसे महसूस करवाता है कैप्सोसिन.

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Artemis II क्रू (फोटो-इंडिया टुडे)

कैप्सेसिन एक ऐसा कंपाउंड है, जो मिर्च को तीखा बनाता है. ये स्वाद के लिए नाक का इस्तेमाल नहीं करता. दरअसल, ज्यादातर फ्लेवर कंपाउंड सूंघने के प्रोसेस पर निर्भर करते हैं. लेकिन कैप्सेसिन ट्राइजेमिनल तंत्रिका को एक्टिव करती है. ये एक अलग न्यूरोलॉजिकल रास्ता है, जो गर्मी, दर्द और जलन आदि को सीधे दिमाग तक पहुंचाता है. इसलिए नाक चाहे बंद हो या फिर खुली, तीखेपन को इसकी परवाह नहीं होती. इसका स्वाद मिलता ही मिलता है.

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सॉस ना ही तो भूख मिटाती है और ना ही मन को तसल्ली देती है. लेकिन दिमाग को कुछ ना कुछ टेस्ट देती है. उसे कहती है कि आपके पेट में कुछ गया है. यानी नॉर्मल फील कराती है. क्योंकि बिना स्वाद के खाना जबरदस्ती का फैसला होता है. और जब कुछ चीज जबरदस्ती की जाए, तो मुमकिन है कि वो ठीक से काम न करे. 

इसलिए बस दिमाग को एक्टिव करने के लिए, उसे सिग्नल देने के लिए सॉस भी स्पेस में क्रू के साथ भेजी जाती है.

ये स्टोरी इंडिया टुडे के लिए रदीफा कबीर ने लिखी है.

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