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CM योगी आदित्यनाथ ने भदोही जिले का नाम संत रविदास नगर किया, पूरा 'दलित गणित' समझें

योगी आदित्यनाथ ने भदोही जिले का नाम बदलकर फिर से संत रविदास नगर कर दिया है. साल 1994 में भदोही वाराणसी से कटकर अलग जिला बना था. साल 1997 में मायावती सरकार ने इसका नाम बदलकर संत रविदास नगर कर दिया था. साल 2014 में तब के सीएम अखिलेश यादव ने फिर से जिले का नाम भदोही कर दिया था.

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योगी आदित्यनाथ ने भदोही जिले का नाम संत रविदास नगर करने की घोषणा की. (इंडिया टुडे)

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  • मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोषणा की है कि भदोही जिले का नाम फिर से संत रविदास नगर किया जाएगा, जो संत रविदास की 650वीं जयंती के अवसर पर लागू होगा।
  • भदोही जिले का नाम संघीय और राजनीतिक दबावों, दलित अस्मिता से जुड़े विवादों और पिछली सरकारों द्वारा नाम बदलने की कड़ी प्रतिक्रिया के कारण कई बार बदला गया है।
  • यह नाम परिवर्तन भाजपा की दलित समुदाय में राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है, और आगे भी ऐसे प्रतीकात्मक कदम उठाने की संभावनाएं हैं।
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कुमार अभिषेक

सियासत में वक्त की करवट पर फैसले उलटते पलटते रहते हैं. बिल्कुल तवे की रोटी की तरह. अंतर बस इतना है कि तवे की रोटी जल्दी जल्दी पलटनी होती है. सियासत में तो दशकों से सदियों तक का फासला कम होता है. लेकिन टाइमिंग दोनों की महत्वपूर्ण होती है. अब टाइमिंग भारत के सबसे बड़े सूबे के चुनाव का है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक घोषणा की है. भदोही जिले का नाम एक बार फिर से संत रविदास नगर किया जाएगा.

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योगी आदित्यनाथ ने नाम बदलने की घोषणा की

योगी आदित्यनाथ ने बताया कि संत गुरु रविदास की 650वीं जयंती के मौके पर राज्य सरकार यह फैसला लागू करेगी. वाराणसी में बीजेपी के 'समरसता संकल्प अभियान' की शुरुआत के मौके पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसकी घोषणा की. घोषणा के साथ ही योगी प्रतिद्वंद्वी सपा को निशाने पर लेना नहीं भूले. उन्होंने कहा, “सपा सरकार ने संत रविदास के नाम पर बने जिले का नाम बदलकर पाप किया था. अब राज्य सरकार उसे फिर से संत रविदास नगर के नाम से पहचान दिलाएगी.”

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मुख्यमंत्री यहीं नहीं रूके. उन्होंने समाजवादी पार्टी पर समाज को बांटने की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए बाबर और औरंगजेब को उनका आदर्श बता दिया. लगे हाथ ये गिनाना भी नहीं भूले कि सपा सरकार ने बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर बने कन्नौज मेडिकल कॉलेज का नाम भी बदल दिया था. लेकिन उनकी सरकार ने कोर्स करेक्शन करते हुए फिर से कॉलेज को बाबा साहेब के नाम पर किया.

तीसरी बार बदलेगा भदोही जिले का नाम

30 जून 1994 को वाराणसी से अलग होकर भदोही नाम से नया जिला. तब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे. 4 दिसंबर, 1997 में मुख्यमंत्री मायावती ने इसका नाम बदलकर संत रविदास नगर कर दिया. साल 2012 में फिर से सपा की सरकार आई. इस बार अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने. 6 दिसंबर 2014 को उन्होंने फिर से जिले का नाम बदलकर भदोही कर दिया.

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उत्तर प्रदेश में यह मुद्दा दलित अस्मिता से जुड़ा हुआ था. जिले का नाम फिर से भदोही करने को लेकर सपा और बसपा के बीच जमकर तकरार हुई. बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस फैसले को दलित संतों का अपमान बताया था.

ये बदलाव संत रविदास जिले भर सीमित नहीं था. मायवती सरकार ने जिन 8 जिलों का नाम दलित महापुरुषों और प्रतीकों के नाम पर रखा था, अखिलेश सरकार ने सबका पुराना नाम फिर से बहाल कर दिया था. जिनके नाम बदले गए उनमें कांशीराम नगर, छत्रपति शाहूजी महाराज नगर, रमाबाई नगर, भीम नगर, प्रबुद्ध नगर, पंचशील नगर, ज्योतिबा फुले नगर और महामाया नगर शामिल थे.

अखिलेश यादव सरकार ने कांशीराम नगर का नाम कासगंज, छत्रपति शाहूजी महाराज नगर का नाम पहले गौरीगंज फिर अमेठी, रमाबाई नगर का नाम कानपुर देहात, भीम नगर का नाम संभल, प्रबुद्ध नगर का नाम शामली, पंचशील नगर का हापुड़, ज्योतिबा फुले नगर का अमरोहा और महामाया नगर का नाम हाथरस कर दिया.

बीजेपी दलित वोटों को साधने में जुटी

दलित महापुरुषों और प्रतीकों से जुड़े नामों को बदलकर पुराने नाम वापस करने को लेकर मायावती और बीजेपी अखिलेश यादव को घेरती रहती हैं. लोकसभा चुनाव में दलित वोटों का एक बड़ा हिस्सा सपा और कांग्रेस के खाते में गया था. इसके साथ ही आजाद समाज पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर भी चुनावी सफलता हासिल कर चुके हैं. और दलित वोटों की दावेदारी कर रहे हैं. ऐसे में बीजेपी ने फिर से दलित अस्मिता का मुद्दा अपने झोले से निकाला है. इसकी शुरुआत फिलहाल संत रविदास के नाम पर बने जिले से हुई है. आगे भी प्रतीकात्मक तौर पर योगी सरकार की ओर से ऐसे फैसले दिख सकते हैं.

लोकसभा चुनाव में लगा था झटका

उत्तर प्रदेश में दलित वोटों की हिस्सेदारी करीब 21 फीसदी बताई जाती है. राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से 84 उनके लिए आरक्षित हैं. साल 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसकी सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) ने मिलकर इसमें 63 सीटें जीती थी, वहीं सपा को केवल 20 फीसदी सीटें मिली थीं. दलित मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रभावशाली हैं.

विधानसभा में दलित समुदाय के लिए आरक्षित सीटों पर बीजेपी का दबदबा था. लेकिन लोकसभा चुनाव में पलड़ा लगभग बराबरी का हो गया. अनुसूचित जाति के लिए 80 में से 17 सीटें आरक्षित हैं. इनमें से सपा ने 7 और कांग्रेस ने एक सीट जीती, जबकि बीजेपी के खाते में एक सीट आई. बाकी बची एक सीट चंद्रशेखर आजाद के हिस्से गई.

इसके अलावा फैजाबाद जैसी सामान्य सीट से भी पासी समुदाय से आने वाले सपा के अवधेश प्रसाद ने जीत हासिल की. बीजेपी के ‘अबकी बार 400 पार’ के नारे को कांग्रेस और सपा ने संविधान बदलने के तौर पर प्रचारित किया. इसका असर भी दिखा. विधानसभा चुनाव में बड़ी संख्या में बीजेपी के पाले में गए दलित वोटों का रुझान सपा और कांग्रेस की तरफ हुआ. नतीजा बीजेपी की सीटें 62 से घटकर 33 रह गईं.

बीजेपी कोर्स करेक्शन की तैयारी में

बीजेपी ने लोकसभा चुनाव से सबक लेते हुए कोर्स करेक्शन की तैयारी शुरू कर दी है. भदोही का नाम संत रविदास नगर करना इसी कवायद का हिस्सा है. इसके अलावा योगी आदित्यनाथ कैबिनेट ने डॉ. बीआर आंबेडकर मूर्ति विकास योजना शुरू की है, इसका मकसद सभी 403 विधानसभाओं में बाबासाहेब आंबेडकर की मूर्तियों का सौंदर्यीकरण, विकास और रखरखाव करना है. इसके अलावा मुख्यमंत्री ने ये घोषणा भी की है कि राज्य भर में आंबेडकर और सामाजिक न्याय के दूसरे प्रतीक चिह्नों की मूर्तियों पर प्रतीकात्मक छतरियां (छत्र) लगाई जाएंगी.

संत रविदास के नाम पर यूपी से पंजाब तक नजर

संत रविदास 15वीं और 16वीं शताब्दी के महान संत, कवि और समाज सुधारक थे. वे भक्ति आंदोलन की परंपरा से जुड़े हुए थे. उन्होंने समाज में छुआछूत और गैर-बराबरी के खिलाफ समाज में अलख जगाई. उन्होंने एक ऐसे आदर्श (बेगमपुरा) का सपना देखा था जहां किसी भी प्रकार का दुख, कर और जात-पात के भेद न हों.

योगी आदित्यनाथ ने जिले का नाम बदलने के साथ ये संकेत दे दिया कि आने वाले दिनों में पार्टी इस मुद्दे पर सपा की घेरेबंदी करने वाली है. संत रविदास को मानने वाले पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश तक में फैले हुए हैं. उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पंजाब में बड़ी संख्या संत रविदास के भक्तों की है. बीजेपी पंजाब में भी इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश करेगी. यूपी की बात करें तो यह वोट बैंक कभी कांग्रेस और उसके बाद बहुजन समाज पार्टी के साथ रहा है. लेकिन बीजेपी साल 2027 के विधानसभा चुनाव में रविदासियों के बीच अपनी पैठ बनाने में जुट गई है. 

वीडियो: राजधानी: CJP प्रोटेस्ट के बाद दबाव में बीजेपी?

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