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NCPI का एक भी MP-MLA नहीं, NOTA से भी कम वोट मिले, TMC के 20 बागी सांसदों ने ये पार्टी क्यों चुनी?

TMC rebel MP joins NCPI: तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने पार्टी छोड़ दी है और अपने गुट का विलय NCPI में कर दिया है. लेकिन सवाल ये है कि आखिर इतनी कम चर्चित पार्टी का चयन क्यों किया गया? NCPI की पूरी कहानी जानिए.

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NCPI पार्टी के बारे में सब कुछ. (फोटो-इंडिया टुडे)

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  • पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस से 20 सांसदों ने पार्टी छोड़कर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय कर लिया है, जो संसद की पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी बन गई है।
  • 2024 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के खराब प्रदर्शन और नेताओं के नेतृत्व से असंतोष के कारण सांसदों ने दल-बदल विरोधी कानून के तहत दो-तिहाई बहुमत के साथ NCPI में विलय का निर्णय लिया।
  • इस विलय के परिणामस्वरूप NCPI संसद में प्रभावशाली हो जाएगी और NDA को समर्थन देने के कारण केंद्र सरकार के लिए संवैधानिक संशोधनों और विधेयकों को पारित कराना आसान होगा।

क्या आपने कभी सोचा है कि एक ऐसी राजनीतिक पार्टी, जिसे एक राज्य के चुनाव में NOTA से भी कम वोट मिले हों, वो रातों-रात संसद की 5वीं सबसे बड़ी और चर्चित पार्टियों में से एक बन सकती है? लेकिन पश्चिम बंगाल की राजनीति में ठीक यही हुआ है.

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ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में बगावत के बाद 20 सांसदों ने TMC छोड़ दी है. लेकिन सबसे दिलचस्प बात ये नहीं है कि उन्होंने TMC छोड़ी. असली सवाल ये है कि उन्होंने किस पार्टी को चुना? कांग्रेस नहीं, बीजेपी नहीं, कोई बड़ी रीजनल पार्टी भी नहीं. इन सांसदों ने खुद का मर्जर एक ऐसी पार्टी में कर लिया है जिसका नाम देश के ज्यादातर लोगों ने शायद पहली बार सुना होगा. नाम है - नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया, यानी NCPI.

अब सवाल है कि आखिर ये NCPI है क्या? और TMC के 20 सांसदों को अचानक इसी पार्टी में क्यों जाना पड़ा?

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सांसदों ने पार्टी क्यों छोड़ी?  

4 मई को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आए. चुनावी नतीजों के बाद तृणमूल कांग्रेस के अंदर असंतोष खुलकर सामने आने लगा. पार्टी के कई वरिष्ठ सांसद और नेता ममता बनर्जी के नेतृत्व से नाराज बताए गए. फिर घटनाएं तेजी से बदलीं.

14 जून को TMC के 20 बागी सांसदों का एक समूह केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से मिला. इसके बाद इन सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात की. और फिर कुछ ही घंटों के भीतर घोषणा हुई कि ये सभी सांसद नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI में विलय कर चुके हैं. बागी सांसदों की अगुआई कर रहीं सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर मांग की है कि संसद में उन्हें TMC से अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता दी जाए.

बागी गुट की लीडर काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि उनके साथ टीएमसी के 20 बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर से मुलाकात की. उन्हें लोकसभा में टीएमसी से अलग बैठने की व्यवस्था करने की अपील करते हुए एक चिट्ठी सौंपी. दस्तीदार ने कहा कि उनकी संख्या दो तिहाई के आंकड़े से ज्यादा है और वो एनसीपीआई में अपना विलय कर रहे हैं. उन्होंने पीएम मोदी के नेतृत्व में एनडीए के साथ काम करने की भी बात कही.

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NCPI ही क्यों चुना?

अब बात उस पार्टी की जो रातों-रात सबके ज़ुबान पर आ गई. इस सवाल का जवाब राजनीति से ज्यादा कानून में छिपा है. भारत में दल-बदल विरोधी कानून यानी Anti-Defection Law लागू है. संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अगर कोई सांसद अपनी पार्टी छोड़ देता है तो उसकी सदस्यता खतरे में पड़ सकती है. लेकिन इसी कानून में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है.

अगर किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सांसद एक साथ किसी दूसरी पार्टी में विलय कर जाएं, तो उसे वैध राजनीतिक विलय माना जाता है. ऐसी स्थिति में सांसदों की सदस्यता बची रह सकती है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि TMC के बागी सांसदों ने इसी रास्ते को चुना है. अगर वे सिर्फ अलग गुट बनाते तो उनकी संसद सदस्यता पर खतरा मंडरा सकता था. लेकिन पहले से पंजीकृत एक राजनीतिक दल में विलय करके उन्होंने अपने लिए कानूनी सुरक्षा कवच तैयार कर लिया.

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NCPI का इतिहास

इलेक्शन कमीशन के रिकॉर्ड के मुताबिक नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI का रजिस्ट्रेशन 20 जनवरी 2023 को हुआ था. पार्टी का मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा में है. जबकि इसकी राजनीतिक गतिविधियां मुख्य रूप से त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के कुछ इलाकों तक सीमित रही हैं. 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में पार्टी ने अपनी किस्मत आजमाई थी. लेकिन नतीजे बेहद निराशाजनक रहे. कुछ सीटों पर पार्टी को इतने कम वोट मिले कि उसका प्रदर्शन NOTA के आसपास या उससे भी नीचे रहा.

दिलचस्प बात ये है कि उस समय पार्टी का नारा था 'राजनीतिक दलबदलुओं को खारिज करो'. लेकिन आज वही पार्टी देश के सबसे बड़े राजनीतिक दलबदल की होस्ट बन गई है. जो पार्टी अभी तक लगभग राजनीतिक गुमनामी में थी, अब वही 20 सांसदों का नया ठिकाना बन गई है.

NCPI के राष्ट्रीय अध्यक्ष उत्तीय कुंडू हैं. उनकी पत्नी शिउली कुंडू पार्टी की कोषाध्यक्ष हैं. पार्टी के बारे में सार्वजनिक जानकारी बहुत सीमित है. शांतनु डे ने इंडिया टुडे से फोन पर बातचीत में दावा किया कि वो RSS कार्यकर्ता और समाज सेवक हैं. पार्टी के संस्थापक सदस्य भी हैं. लेकिन बागी TMC सांसदों के NCPI में शामिल होने के फैसले से नाखुश हैं. डे ने कहा कि उनकी पार्टी ने त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में TMC के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी. NCPI का राजनीतिक रुख TMC विरोधी है.

लेकिन अब जब 20 सांसदों का समूह इस पार्टी में आ चुका है, तो राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं. अगर लोकसभा अध्यक्ष इस मर्जर को स्वीकार कर लेते हैं तो NCPI सीधे 20 सांसदों वाली पार्टी बन सकती है. और इसका असर सिर्फ पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा. क्योंकि बागी सांसद पहले ही NDA को समर्थन देने का ऐलान कर चुके हैं.

NDA सरकार का क्या फायदा? 

ऐसे में केंद्र सरकार को संसद में अतिरिक्त संख्या बल मिल सकता है. खासकर उन विधेयकों और संवैधानिक संशोधनों के दौरान जहां हर वोट की अहमियत होती है. NCPI, एनडीए के सहयोगी दलों में शाम‍िल 16 सीटों वाली टीडीपी और 12 सीटों वाली जेडीयू से भी बड़ी सहयोगी बन जाएगी. इससे केंद्र सरकार को महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों और विधेयकों को पारित कराने में बड़ी बढ़त मिलेगी.

लेकिन अभी कहानी में एक और ट्विस्ट आ सकता है. शुरुआत में माना जा रहा था कि बागी सांसद महाराष्ट्र मॉडल पर आगे बढ़ सकते हैं. यानी जैसे एकनाथ शिंदे ने शिवसेना पर दावा किया था, वैसे ही TMC के भीतर भी असली और नकली की लड़ाई शुरू हो सकती है. बागी सांसद जगदीश चंद्र ने संकेत दिया था कि उनका गुट खुद को असली TMC साबित करने की कोशिश करेगा. वहीं सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने भी कहा है कि उनके पास दो-तिहाई बहुमत है और भविष्य में वे पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा कर सकते हैं.

अगर ऐसा होता है तो मामला सिर्फ सांसदों की बगावत तक सीमित नहीं रहेगा. ये लड़ाई सीधे तृणमूल कांग्रेस के अस्तित्व तक पहुंच सकती है.

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