एक महिला अस्पताल की इमरजेंसी सर्विसेज में दाखिल हुई. उसने कहा, उसे गोली लग गई है. सीने में. खून बह रहा था. लेकिन महिला आराम से बात कर रही थी. चल-फिर रही थी. ये देखकर इमरजेंसी वालों के सिर चकराए. उन्होंने फौरन उसे दाखिल किया. एक्सरे वगैरह करवाए. पता करने की कोशिश की कि आखिर सीने में गोली लगने के बाद ये महिला नॉर्मल कैसे है.
क्या पता चला?
पता चला कि महिला को बाईं तरफ छाती में गोली तो लगी थी. लेकिन महिला के ब्रेस्ट्स में सिलिकोन इम्प्लांट लगे हुए थे. उनमें फंस कर गोली ने रास्ता बदल दिया, और दाईं तरफ की पसली में जाकर अटक गई. ये केस स्टडी Sage जर्नल्स में छपी है. इस के मुताबिक़,
पेशेंट ने बताया कि वो सड़क पर चल रही थी जब अचानक उसे अपनी छाती में बाईं तरफ तेज़ गर्मी और दर्द का एहसास हुआ. उसने नीचे देखा तो खून बह रहा था. इसके बाद वो हॉस्पिटल के इमरजेंसी सर्विसेज में गई. जिस हथियार से गोली चली, उसका पता नहीं चला, और गोली किसने चलाई, ये भी आज तक पता नहीं लगाया जा सकता है.
वो इम्प्लांट जिससे होकर गोली गुजरी. उसका रास्ता देखा जा सकता है, जहां से एक पतला-सा तार गया हुआ है. (तस्वीर साभार: Sage Publications)इम्प्लांट की वजह से गोली का रास्ता बदल गया. और दिल/ फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने के बजाए गोली छिटक कर पसली में फंस गई.
क्या होते हैं ये ब्रेस्ट इम्प्लांट? कैसे लगवाए जाते हैं?
दो बेसिक तरह के ब्रेस्ट इम्प्लांट्स होते हैं. सलाइन और सिलिकॉन जैल. सलाइन में ऊपरी सतह सिलिकॉन की होती है और अंदर सलाइन यानी नमकीन लिक्विड भरा होता है. सिलिकॉन जेल में ऊपरी सतह और अंदर दोनों जगह सिलिकॉन होता है. सिलिकॉन जेल नरम और लचीली होती है.
इम्प्लांट लगाने के पूरे प्रोसेस में एक से दो घंटे लगते हैं. एनेस्थीसिया दिया जाता है ताकि आप सो जाएं और दर्द का अहसास न हो. सर्जन ब्रेस्ट या निप्पल के आस-पास कट लगाता है. ये सब निर्भर करता है कि आपको किस तरह का इम्प्लांट चाहिए और अपने ब्रेस्ट कितने बड़े करवाने हैं. सर्जन रिब्स और चेस्ट मसल के बीच में सेलाइन या सिलिकॉन जैल इम्प्लांट करता है. इसके बाद कट्स पर टांके लगा दिए जाते हैं.
अमेरिकन सोसाइटी ऑफ प्लास्टिक सर्जन्स ने बताया कि सिर्फ साल 2016 में ही लगभग तीन लाख महिलाओं ने ब्रेस्ट इम्प्लांट लगवाए. ये बहुत ही कॉमन सर्जरी है. (सांकेतिक तस्वीर : Pixabay)बाल बाल बचे
ये तो एक उदाहरण है जिसमें इम्प्लांट की वजह से महिला की जान बच गई. ये अपने आप में पहला केस नहीं है, ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें इम्प्लांट नहीं, तो किसी और चीज़ ने गोली से लोगों को बचाया. 2012 में मिड डे में छपी एक स्टोरी के अनुसार एक चाय बेचने वाले पर गोली चलाई गई थी. लेकिन उसकी जेब में कई सिक्के पड़े रहते थे, जिनसे टकरा कर गोली छिटक गई. और चाय वाला बच गया.
इसी तरह 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकी हमले में होटल ताज के एक शेफ़ की जान चॉपस्टिक्स ने बचाई थी. वो हमेशा अपने कोट की पॉकेट में दो चॉपस्टिक्स रखा करते थे. ये मामला द सीज, 68 आवर्स इनसाइड द ताज होटल नाम की किताब में पढ़ने को मिलता है.
यही नहीं, दीवार फिल्म में अमिताभ बच्चन को उनके बिल्ले ने बचाया था गोली से. कुछ वैसा ही हुआ मुज़फ्फरनगर की शबनम के साथ.
शबनम की तस्वीर जिसमें देखा जा सकता है किगोली लॉकेट से टकरा कर छिटक गई, लेकिन उसके जोर की वजह से चोट लगी और खून निकल आया. (तस्वीर साभार: दैनिक भास्कर)दैनिक भास्कर में आई एक ख़बर के अनुसार मामला 2016 का है. शबनम जिस लड़के से प्यार करती थी, उससे शादी करना चाहती थी. लेकिन उसके भाई को ये मंज़ूर नहीं था. इसलिए उसने शबनम पर गोली चला दी. लेकिन वो गोली शबनम के गले में पहने हुए लॉकेट से टकराकर छिटक गई.
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