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मैरिटल रेप पर सरकार ने क्यों कहा, 'आंख मूंदकर पश्चिमी देशों को फॉलो नहीं कर सकते'

मैरिटल रेप को मोदी सरकार शादी तोड़ने वाला बता चुकी है.

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एर तरफ़ सरकार कह रही कि वेस्ट को फॉलो ना करें और दूसरी तरफ़ कह रही कि एक नया रुख रखना चाहती है.
'ये वेस्ट नहीं है. अपना देश थोड़ा अलग है.'
ये लाइन आपने बहुत सुनी होगी. सरकार ने मैरिटल रेप के अपराधीकरण की बहस में भी दिल्ली हाई कोर्ट से यही कहा.
केंद्र सरकार ने कहा कि भारत पश्चिमी देशों को आंख बंद करके फ़ॉलो नहीं कर सकता है, जिन्होंने मैरिटल रेप को अपराध बना दिया है क्योंकि भारत की सामाजिक स्थिति अलग है. अपने तर्क के पक्ष में सरकार ने साक्षरता की कमी, गरीबी, वित्तीय सशक्तिकरण की कमी और समाज की मानसिकता जैसे कारणों का हवाला दिया.
एक तरफ़ तो सरकार का ये स्टैंड है और वहीं शुक्रवार, 28 जनवरी, को केंद्र ने फिर से पूरे मामले पर अपना रुख साफ़ करने के लिए और समय मांगा है. क्या है पूरी बहस? दिल्ली हाई कोर्ट मैरिटल रेप के अपराधीकरण
की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है. 12 जनवरी को अदालत में केंद्र सरकार ने कहा था कि मैरिटल रेप का अपराधीकरण 'झूठे मामलों की बाढ़ ला सकता है.'
अपने लिखित बयान में केंद्र ने कहा था,
"कई अन्य देशों ने मैरिटल रेप को अपराध घोषित कर दिया है, ज़्यादातर पश्चिमी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत को भी आंख बंद करके उनका पालन करना चाहिए. इस देश की साक्षरता, महिलाओं के वित्तीय सशक्तिकरण की कमी, समाज की मानसिकता, विविधता, ग़रीबी जैसे अपनी अलग समस्याएं हैं और मैरिटल रेप को अपराध बनाने से पहले इन पर ध्यान से विचार किया जाना चाहिए."
मैरिटल रेप यानी पत्नी के मना करने के बावजूद पति का जबरन शारीरिक संबंध बनाना. अभी तक ये अपराध नहीं है. IPC का सेक्शन 375 पत्नी के साथ जबरन बनाए गए यौन संबंध को रेप नहीं मानता. दिल्ली हाई कोर्ट में कई याचिकाएं डालकर इस सेक्शन को बदलकर मैरिटल रेप को अपराध बनाने की मांग की गई. तब ही से ये बहस शुरू हुई है. अभी तक क्या हुआ है? दिल्ली हाईकोर्ट ने इसे लेकर केंद्र सरकार से जवाब मांगा था. 13 जनवरी को केंद्र सरकार के प्रतिनिधि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जब तक सभी स्टॉक-होल्डर्स से राय नहीं ली जाती, तब तक मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में नहीं लाया जा सकता है. सरकार ने पार्लियामेंटरी स्टैंडिंग कमिटी की 2008 और 2010 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था कि मैरिटल रेप को अपराध बनाने के लिए देश के क्रिमिनल-लॉ में बड़े बदलाव करने होंगे, किसी खास लेजिस्लेशन में छोटे बदलाव करने से कुछ नहीं होगा.
मैरिटल रेप
केंद्र ने 2017 में कहा था कि ये कदम शादी नाम की संस्था को तहस-नहस कर देगा

वहीं साल 2017 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि मैरिटल रेप को अपराध के दायरे में नहीं लाया जा सकता है, क्योंकि ये शादी नाम की संस्था को तहस-नहस कर देगा. ये भी कहा था कि मैरिटल रेप को अपराध बना देने से पत्नियां कानून का गलत इस्तेमाल कर पतियों को परेशान करेंगीं. क्या सरकार अपनी ही बात से पलट रही है? अब मसला ये है कि केंद्र की लिखित दलील उसी दिन दाखिल की गई, जिस दिन गृह मंत्रालय ने अदालत में हलफनामा दिया. हलफनामे में सरकार ने अदालत से कहा कि वह इस मामले में अदालत के सामने एक नया और रचनात्मक रुख रखना चाहती है.
लिखित दलील कह रही है कि वेस्ट को फॉलो ना करें और हलफनामा कह रहा है कि सरकार एक नया और रचनात्मक रुख रखना चाहती है. दोनों ही बयानों में अंतर साफ दिखाई दे रहा है.

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