स्क्रीन पर आपको एक तस्वीर दिख रही होगी. आपको दिख रहे होंगे...जले हुए गद्दों के चीथड़े.... और उनकी राख. आपको टूटे हुए शेल्फ भी दिख रहे होंगे. जिनमें गद्दे रखे जाते थे. आपको इस तस्वीर में सफेद कुर्ता-पजामा भी दिखेगा. दिख तो आपको दाढ़ी भी सकती है. लेकिन आंखों से धर्म का चश्मा हटाकर देखेंगे तो आपको इन बूढ़ी आंखों में बेबसी दिखेगी. लाचारी भी दिखेगी. मदद की टूटती आस दिखेगी. दिखेगी कुछ ना कर पाने की हताशा. और एक सवाल दिखा कि मेरी दुकान क्यों जलाई गई?
दी लल्लनटॉप शो: नूह हिंसा पर मोदी सरकार के मंत्री ने अपनी ही सरकार पर सवाल उठा दिए, CM खट्टर क्या बोले?
नूह और गुरुग्राम में जिनकी जिम्मेदारी हिंसा रोकने की थी वो आखिर कर क्या रहे थे?
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गुरुग्राम के सेक्टर 66 की तस्वीर बताती है कि धार्मिक उन्माद जब फैलता है तो क्या होता है. 31 जुलाई को जो नूह में हुआ वो भी और उसके बाद से जो गुरुग्राम में दिखा वो भी. आप ये कह सकते हैं कि बवाल करने वालों का मजहब अलग-अलग है. लेकिन असल बात ये है कि इनका मजहब सिर्फ नफरत है. उन्माद है. कट्टरता है.
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