पीड़ाएं सबकी साझी होती हैं. उनमें एक अलग किस्म का आकर्षण होता है. वे सीने में ज़रा सा भी मोम रखने वाले इंसानों को अपनी तरफ़ खींचतीं हैं. जब एक पिता अपनी बच्ची के बेजान हाथ को थामे बैठा दिखता है, हम सब एक साथ पिता हो जाते हैं. हमारा शरीर भी धम्म से ज़मीन पर पसर जाता है. गला रुंधने लगता है. हम घबराए से अपने आस-पास टटोलने लगते हैं. दिल का एक हिस्सा कहता है, तुम्हें क्या? वो हज़ारों किलोमीटर दूर तुर्किए में घटी एक त्रासदी की इकाई भर है. उनसे तुम्हारा क्या लेना-देना? मगर दूसरा हिस्सा अभी भी उस पिता जैसा ही बर्ताव कर रहा है. पिता होते ही सारी भावनाएं स्वर खो देती हैं. एक भंवर उठता है. जिसके अंदर का खालीपन सिर्फ एक पिता ही समझ सकता है.
तुर्की और सीरिया में आए भूकंप के बीच से आईं इन 6 कहानियों को सुनकर दिल पिघल जाएगा
सोचिए उस बच्ची का ये कहना भी कितना दर्दनाक रहा होगा, ‘मुझे बाहर निकाल लो. मैं ज़िंदगी भर आपकी ग़ुलामी करूंगी.’
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