मुंह में पान और होठ पर काशी का नाम

एक कार्यक्रम के दौरान आलाप की मुद्रा में गिरिजा देवी.
रात के तीसरे पहर में जब गिरिजा देवी अपनी मनपसंद ठुमरियों में से एक 'रस से भरे तोरे नैन' या फिर 'बाबुल मोरा नैहर गाती थीं' तो लोग सांसें रोककर उनके गाने सुनते थे. आलाप लेतीं तो ऐसा कि खुद ही किसी दूसरी दुनिया में पहुंच जातीं और लोगों के पास तो महसूस करने के लिए जैसे कुछ होता ही नहीं था. गिरिजा देवी से जब मिलो, मुंह में पान दबाए रहतीं. देश-दुनिया कहीं भी प्रस्तुति हो, जुबान पर भगवान भोलेनाथ और उनकी नगरी काशी का नाम लिए बिना प्रस्तुति पूरी ही नहीं होती.
पूरी दुनिया में ठुमरी को दी मुकम्मल पहचान
गाने के अलावा किचन में चूड़ा-मटर बनाने वाली और पूरे शौक से सब्जी छौंकने वाली गिरिजा देवी ने ठुमरी को पूरी दुनिया में मुकम्मल पहचान दी है. गिरिजा देवी ने गाने की अलग-अलग विधाओं खयाल, टप्पा, दादरा, तराना, चैती, होरी, भजन सब गाया लेकिन उनके लिए खास ठुमरी ही रही. वो खुद भी कहती थीं कि जिंदगी की जद्दोजहद के जितने रंग ठुमरी में दिखते हैं, वो किसी और जगह नहीं मिल सकते हैं. शायद यही वजह है कि ठुमरी के बिना गिरिजा देवी और गिरिजा देवी के बिना ठुमरी अधूरी सी लगती है. उनकी खास ठुमरियों में शुमार एक दिन मुरली श्याम बजाई, आप भी सुनिए-"हमार शरीर त तनपुरा ह, शिवजी के अइसने लागत रहे, एही से ऊ तनपुरा में सुर भर देत रहलन, हम त खाली मुंह हिलावत रहनी."घर और परिवार के विरोध के बाद भी 1949 से ऑल इंडिया रेडियो, इलाहाबाद से सार्वजनिक तौर पर गायन शुरू करने वाली गिरिजा देवी अभी इसी साल 29 अक्टूबर को भी पुणे में प्रस्तुति देने वाली थीं. मौका था पंडित किशन महाराज की याद में आयोजित संगीत समारोह का, लेकिन उनकी ये ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी. सुनिए चलते-चलते राग केदार में गाई उनकी ठुमरी जोगिया मन भायो-
वीडियो में देखें पीयूष मिश्रा के लल्लनटॉप किस्से
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