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जेकरा गला में शिवजी सुर भरत रहलन, अब ऊ आवाज ना सुनाई दी

जब गाने बैठीं, तो लोग ही नहीं थे, गाना खत्म हुआ तो हजारों की भीड़ तालियां बजा रही थी.

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88 साल की उम्र में भी गिरिजा देवी प्रस्तुति के लिए सहज ही तैयार हो जाती थीं.
रात का वक्त. बिहार के एक छोटे से शहर आरा में देश भर के दिग्गज संगीतकार जुटे हैं. साल था 1951. 22 साल की एक युवती स्टेज पर आती है. सामने बहुत कम लोग हैं. जो बैठे हैं, वो भी ऊंघते हुए नजर आ रहे हैं. युवती आंखें बंद करती है और गाना शुरू करती है. तीन घंटे के बाद जब उसकी आंखें खुलती हैं तो सामने हजारों की भीड़ है, जो लगातार तालियां बजाए जा रही है. उस वक्त इस युवती को गिरिजा देवी के नाम से जाना गया और आज उनके लिए विशेषण कम पड़ गए हैं. अप्पाजी, स्वर साम्राज्ञी, ठुमरी साम्राज्ञी, पद्मभूषण और न जाने कितने ही विशेषणों से नवाजी गईं गिरिजा देवी अब हमारे बीच नहीं हैं. 24 अक्टूबर को कोलकाता में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया.

मुंह में पान और होठ पर काशी का नाम

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एक कार्यक्रम के दौरान आलाप की मुद्रा में गिरिजा देवी.

रात के तीसरे पहर में जब गिरिजा देवी अपनी मनपसंद ठुमरियों में से एक 'रस से भरे तोरे नैन' या फिर 'बाबुल मोरा नैहर गाती थीं' तो लोग सांसें रोककर उनके गाने सुनते थे. आलाप लेतीं तो ऐसा कि खुद ही किसी दूसरी दुनिया में पहुंच जातीं और लोगों के पास तो महसूस करने के लिए जैसे कुछ होता ही नहीं था. गिरिजा देवी से जब मिलो, मुंह में पान दबाए रहतीं. देश-दुनिया कहीं भी प्रस्तुति हो, जुबान पर भगवान भोलेनाथ और उनकी नगरी काशी का नाम लिए बिना प्रस्तुति पूरी ही नहीं होती.

पूरी दुनिया में ठुमरी को दी मुकम्मल पहचान

गाने के अलावा किचन में चूड़ा-मटर बनाने वाली और पूरे शौक से सब्जी छौंकने वाली गिरिजा देवी ने ठुमरी को पूरी दुनिया में मुकम्मल पहचान दी है. गिरिजा देवी ने गाने की अलग-अलग विधाओं खयाल, टप्पा, दादरा, तराना, चैती, होरी, भजन सब गाया लेकिन उनके लिए खास ठुमरी ही रही. वो खुद भी कहती थीं कि जिंदगी की जद्दोजहद के जितने रंग ठुमरी में दिखते हैं, वो किसी और जगह नहीं मिल सकते हैं. शायद यही वजह है कि ठुमरी के बिना गिरिजा देवी और गिरिजा देवी के बिना ठुमरी अधूरी सी लगती है. उनकी खास ठुमरियों में शुमार एक दिन मुरली श्याम बजाई, आप भी सुनिए- अपने अंतिम दिनों में कोलकाता में रहने वाली गिरिजा देवी की चाहत थी कि वो अपने आखिरी पल काशी में ही गुजारें. उनके दत्तक पुत्र प्रकाश ने मीडिया को बताया कि 22 अक्टूबर को ही उन्होंने बनारस चलने के लिए कहा था. कह रहीं थीं कि आखिरी क्षण त बाबा के दरबारे में बीती लेकिन ऐसा नहीं हो सका. जब कोई उनके गाने के लिए उनकी तारीफ करता, तो वो हमेशा कहती थीं-
"हमार शरीर त तनपुरा ह, शिवजी के अइसने लागत रहे, एही से ऊ तनपुरा में सुर भर देत रहलन, हम त खाली मुंह हिलावत रहनी."
घर और परिवार के विरोध के बाद भी 1949 से ऑल इंडिया रेडियो, इलाहाबाद से सार्वजनिक तौर पर गायन शुरू करने वाली गिरिजा देवी अभी इसी साल 29 अक्टूबर को भी पुणे में प्रस्तुति देने वाली थीं. मौका था पंडित किशन महाराज की याद में आयोजित संगीत समारोह का, लेकिन उनकी ये ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी. सुनिए चलते-चलते राग केदार में गाई उनकी ठुमरी जोगिया मन भायो-


वीडियो में देखें पीयूष मिश्रा के लल्लनटॉप किस्से
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