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परवेज़ मुशर्रफ़ के निधन पर विदेशी मीडिया में क्या छपा?

परवेज़ मुशर्रफ़ का 5 फ़रवरी 2023 को निधन हो गया

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परवेज़ मुशर्रफ़ का 5 फ़रवरी 2023 को निधन हो गया

पाकिस्तान के पूर्व सैन्य तानाशाह और राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ का 05 फ़रवरी 2023 को निधन हो गया. वो निर्वासन में दुबई में रह रहे थे. मौत के बाद उनके शरीर को पाकिस्तान लाया गया. उनका अंतिम-संस्कार पाकिस्तान में ही किया जाएगा. कारगिल युद्ध थोपने वाले मुशर्रफ़ अक्टूबर 1999 में नवाज़ शरीफ़ का तख़्तापलट कर सत्ता में आए थे. उन्होंने मिलिटरी के चाबुक से 2008 तक पाकिस्तान पर शासन किया. उसके बाद उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा. उन्हें पाकिस्तान की अदालत ने मौत की सज़ा भी सुनाई. हालांकि, बाद में इस फ़ैसले को पलट दिया. 2022 में मुशर्रफ़ ने पाकिस्तान लौटने की इच्छा जताई थी. लेकिन उनकी ये इच्छा जीते-जी पूरी नहीं हो सकी.

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मुशर्रफ़ उन चुनिंदा लोगों में से थे, जिन्होंने 21वीं सदी में भारतीय उपमहाद्वीप की दशा और दिशा पर अभूतपूर्व प्रभाव डाला. ये प्रभाव कई मायनों में प्रतिकूल भी रहा. मुशर्रफ़ की ज़िद के चलते कारगिल युद्ध हुआ. उन्हीं के कार्यकाल में भारत की संसद पर हमला हुआ. हालांकि, बाद में उन्होंने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर शांति की पहल भी की. 9/11 हमले के बाद मुशर्रफ़ ने अमेरिका का साथ दिया. इससे उन्हें ख़ूब सारा पैसा तो मिला. लेकिन पूरे पाकिस्तान में आतंकवाद चरम पर पहुंच गया. तहरीके तालिबान पाकिस्तान (TTP) का दंश आज तक परेशान कर रहा है. TTP की बुनियाद में मुशर्रफ़ का विरोध रहा है. 

इन सबके अलावा, मुशर्रफ़ ने पाकिस्तान लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी काफ़ी चोट पहुंचाई. इसका असर गाहे-बगाहे पाकिस्तान की राजनीति में दिख ही जाता है. लेकिन उनके निधन पर विदेशी मीडिया में कई तरह की बातें छपी हैं. आइए जानते हैं कि परवेज़ मुशर्रफ़ को इंटरनैशनल प्रेस में कैसे याद किया जा रहा है?

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अमेरिकी अखबार न्यू यॉर्क टाइम्स ने सुर्खी लगाई,
Pervez Musharraf, Former Military Ruler of Pakistan, Dies at 79
पाकिस्तान के पूर्व सैन्य शासक परवेज़ मुशर्रफ़ का 79 वर्ष की उम्र में निधन

अखबार ने लिखा,

परवेज़ मुशर्रफ़ ने 1999 में रक्तहीन तख्तापलट से लेकर 2008 में अपने इस्तीफ़े तक दुनिया को एक ज़ोरदार सैन्य कमांडो की छवि पेश की. मुशर्रफ़ ने 9/11 के हमलों के बाद अलक़ायदा के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए अमेरिका का साथ देने का वादा किया था. इस फैसले के बाद उन्हें पाकिस्तान में विरोध का सामना करना पड़ा था. पाकिस्तानी मुसलमान इससे काफ़ी नाराज़ थे.

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मुशर्रफ़ एक ऐसे देश में धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देने की बात कर रहे थे, जहां धार्मिक कट्टरपंथियों का ज़बरदस्त प्रभाव था. इस वजह से कुछ लोग दुश्मन भी बने. मुशर्रफ़ को एक अमेरिका-परस्त नेता की तरह देखा जाता था,

क़तर के मीडिया हाउस अलजज़ीरा ने सुर्खी चलाई,
Pervez Musharraf: The Pakistani ex-president’s chequered legacy
परवेज़ मुशर्रफ़: पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति की रंग-बिरंगी विरासत

अल जज़ीरा लिखता है,

2014 में एक इंटरव्यू में परवेज़ मुशर्रफ़ से पूछा गया कि, क्या आपको आपके शासन से कोई मलाल रहा? मुशर्रफ़ का जवाब था, 

‘बिलकुल नहीं! मैंने अपने देश और अपने लोगों के लिए बहुत कुछ किया.’ 

मुशर्रफ़ की मौत की ख़बर पाकिस्तानियों के लिए एक अलग तरह की विरासत छोड़ गई है. मुशर्रफ़ को लोग मानवाधिकार हनन और अमेरिका के तथाकथित वॉर ऑन टेरर का समर्थन देने वाले नेता के रूप में भी याद करते हैं.

बांग्लादेशी अखबार ढाका ट्रिब्यून ने लिखा,

शुरुआती सालों में मुशर्रफ़ ने अपने सुधारवादी प्रयासों से अंतरराष्ट्रीय जगत में वाह-वाही बटोरी. उन्होंने महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए बने कानून को मज़बूत किया, प्राइवेट न्यूज़ चैनलों चलाने की अनुमति दी. सिगार और इम्पोर्टेड विस्की के शौक़ीन मुशर्रफ़ मुसलमानों को आधुनिक जीवन-शैली जीने के लिए मनाते रहे. इस वजह से वो पश्चिमी दुनिया के चहेते भी रहे. ये चाहत 9/11 हमलों के बाद और बढ़ी, जब वे अमेरिका के सबसे अहम सहयोगियों में से एक बने. 2002 में उन्होंने पूरी दुनिया को तब चौंका दिया  जब एक सम्मलेन के दौरान भाषण खत्म करके वो भारत के तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की ओर बढ़े और शांति की पेशकश की. इसके पहले उन्होंने भारत के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान छेड़ रखा था. मुशर्रफ के दौर में विदेशी निवेश भी फला-फूला और पाकिस्तान ने सालाना 7.5% की आर्थिक वृद्धि देखी.

ब्रिटिश अखबार गार्डियन ने मुशर्रफ़ की ऑबिच्युरी में लिखा,

मुशर्रफ का 79 की उम्र में निधन हो गया है. उनकी जितनी सराहना की गई है, उन्हें उतना ही अपमानित भी किया गया. हालांकि उनको सबसे ज़्यादा सराहना अपने देश के बाहर से ही मिली है. उन्हें राष्ट्रपति बुश के ‘सबसे अच्छे दोस्तों’ में गिना जाता था.  9/11 के अटैक के बाद वो एक उदार चेहरे के रूप में जाने जाने लगे थे. लेकिन इसके पहले उनकी छवि भारत से दुश्मनी करने वाले नेता के रूप में बनी हुई थी. भारत-विरोधी ये छवि बाद में बदली भी. 2006 में उन्होंने कश्मीर पर भारत के साथ एक समझौता करने का प्रयास किया. जिसके लिए उनकी सराहना भी हुई.

तुर्किए के मीडिया संस्थान TRT वर्ल्ड ने सुर्खी चलाई,

Former Pakistan president Pervez Musharraf’s passing leaves divided legacy
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ का निधन और उनकी विभाजित विरासत

TRT वर्ल्ड ने लिखा,

परवेज मुशर्रफ ने तुर्किए की राजधानी अंकारा और बाद में मिलिट्री स्टाफ कॉलेज से तालीम हासिल की थी. इस वजह से वो धाराप्रवाह टर्किश बोल सकते थे. उन्होंने अपने शुरुआती साल 1949 से 1956 तक तुर्की में बिताए, उस वक्त उनके पिता की पोस्टिंग अंकारा में पाकिस्तान के दूतावास में थी. मुशर्रफ का तुर्किए के साथ करीबी नाता था. साल 2005 में पाकिस्तान में भूकंप आया था. उस वक्त तुर्किए की सरकार और तुर्किए के लोगों ने बड़े पैमाने पर पाकिस्तान की मदद की थी. इसपर मुशर्रफ ने कहा था कि

‘इससे पहले कि मैं अपने संसाधनों को जुटा पाता, तुर्क पहले से ही ज़मीनी स्तर पर लोगों की मदद कर रहे थे.’

परवेज़ मुशर्रफ़ के निधन के बाद हर तरफ उनकी विरासत पर बहस हो रही है. किसी के लिए वो एक उदार राजनेता और मिलिटरी जनल थे, जो मुसलामानों को कट्टरता से निकाल कर आधुनिकता में ले जाना चाहते थे. तो, किसी के लिए उनकी छवि तानाशाह, मानवाधिकार हनन के आरोपी और अमेरिका के साथ मिलकर अपनी क़ौम की पीठ में छुरा घोंपने वाले की भी है.

वीडियो: दुनियादारी: पाकिस्तान के पेशावर में मस्जिद पर हमला, शहबाज़ शरीफ़ क्या करने वाले हैं?

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