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टाइम ज़ोन क्या होता है और क्या भारत में भी दो टाइम ज़ोन हो सकते हैं?

समझिए आसान भाषा में.

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फोटो - thelallantop
आपको ये कांसेप्ट तो मालूम ही होगा कि अलग अलग जगहों पर अलग अलग वक़्त सूरज निकलता है. क्योंकि धरती गोल है और घूम रही है. हर वक़्त, कहीं न कहीं गुड मॉर्निंग हो रही होती है और कहीं न कहीं गुड ईवनिंग. लेकिन क्या पूरी धरती पर एक साथ एक ही वक़्त हो रहा होता है? मसलन, जिस वक़्त इंडिया में रात के 9 बज रहे होते हैं, क्या न्यूयॉर्क में भी उस वक़्त रात के 9 ही बज रहे होते हैं? या लॉस एंजेलेस में भी? जवाब है नहीं. इंडिया में जब रात के 9 बजते हैं, न्यू यॉर्क में उस वक़्त सुबह के साढ़े 11 बज रहे होते हैं और लॉस एंजेलेस में सुबह के साढ़े 8. यानी एक देश अमेरिका में भी एक ही वक़्त पर घड़ी में अलग अलग टाइम हो रहा होता है. इंडिया में ऐसा नहीं होता है. पूरे देश में एक साथ 9 बजते हैं. लेकिन अब शायद ऐसा न हो. लोग इस कवायद में लगे हुए हैं कि भारत में दो-दो टाइम ज़ोन हों. इसके बारे में बताते हैं सब कुछ, आसान भाषा में. Time Zone पहला सवाल - टाइम ज़ोन क्या होता है? धरती गोल है. इस धरती पर लोकेशन देने के लिए इसे 360 खड़ी और 180 लेटी लाइनों में बांटा गया. खड़ी लाइंस हुईं देशांतर रेखाएं और लेटी हुई लाइनें कहलाईं अक्षांश रेखाएं. धरती पर किस वक़्त किस जगह पर क्या टाइम हो रहा होगा, खड़ी लाइंस यानी देशांतर रेखाओं के हिसाब से डिसाइड किया जाता है. वो एरिया जिसमें आने वाली सभी जगहों पर एक साथ एक ही वक़्त हो, टाइम ज़ोन कहलाता है. यानी लल्लनटॉप शो शुरू होने के वक़्त जितनी जगहों पर 9 बज रहे होते हैं, यो एक टाइम ज़ोन में आती हैं. जिन जगहों पर उस वक़्त साढ़े 9 बज रहा होगा, वो दूसरा टाइम ज़ोन कहलायेगा. दूसरा सवाल - किस जगह क्या टाइम होगा, ये कैसे डिसाइड किया जाता है? असल में धरती पर टाइम और टाइम ज़ोन से जुड़े हर सवाल का जवाब एक ही वाक्य से शुरू होगा - धरती गोल है. इस गोल धरती को 360 खड़ी लाइनों में बांटा गया. एक दिन में 24 घंटे होते हैं. यानी 360 लाइनें 24 घंटों में बंटी. यानी कायदे से हर लाइन के बीच में 4 मिनट का अंतर होगा. अब, एक लाइन को रेफरेंस ले लिया गया. बताया गया कि समय का बंटवारा वहां से होगा. उस लाइन के लेफ़्ट में समय घटता है और राइट में समय बढ़ता है. timezones तीसरा सवाल - इंडिया में टाइम का क्या लफड़ा चल रहा है? हमारे देश में हर जगह एक साथ एक ही वक़्त होता है. यानी भारत में एक ही टाइम ज़ोन है. साइंस समझने वाले सयाने लोग इस बात पर विचार कर रहे हैं कि देश में दो टाइम ज़ोन होने चाहिए. 2002 में एक कमिटी बनाई गई थी जो इस बात पर रीसर्च के दम पर फ़ैसला लेने वाली थी कि क्या देश में एक और टाइम ज़ोन होना चाहिए. कमिटी ने कहा कि दूसरा टाइम ज़ोन लाने पर बहुत कॉम्प्लेक्स सिचुएशन बन जाएंगी. गुवाहाटी कोर्ट में एक PIL भी दायर हुई थी जिसका कहना था कि नॉर्थ-ईस्ट के लिए दूसरा टाइम ज़ोन बनाया जाना चाहिए. कोर्ट ने इस PIL को ख़ारिज कर दिया था. चौथा सवाल - अलग टाइम ज़ोन से क्या होगा? ये असली मुद्दा है. इसे समझना ज़रूरी है. अगर दूसरे टाइम ज़ोन को introduce करने से मामला कॉम्प्लेक्स होगा तो दूसरी तरफ़ देश में बिजली बचेगी. कैसे? बताते हैं. नक़्शे पर अगर इंडिया को पूरब से पश्चिम तक देखा जाये तो पूर्व में सबसे किनारे पर जो गांव है वो है अरुणाचल प्रदेश का डोंग गाँव. वहीं पश्चिम में सबसे कोने में मिलता है गुजरात का गुहर मोटा गांव. यानी इंडिया डोंग से गुहर मोटा तक फैला हुआ है. अब देशांतर रेखाओं के हिसाब से देखा जाए तो इंडिया 97 डिग्री 24 मिनट पूर्व से लेकर 68 डिग्री 7 मिनट पूर्व तक फैला हुआ है. ये एक बड़ा एरिया है. Time in India अब आते हैं नॉर्थ ईस्ट में क्योंकि वहां के लिए एक अलग टाइम ज़ोन बनाए जाने की बात हो रही है. होता ये है कि नॉर्थ ईस्ट में बाकी इंडिया के मुकाबले सूरज जल्दी उग जाता है. लेकिन दफ़्तरों की टाइमिंग बाकी इंडिया के हिसाब से ही चलती है. सरकारी कामकाज 10 बजे से ही शुरू होता है. अब, अगर बाकी हिस्सों के मुकाबले सुबह जल्दी हो रही है तो शाम भी जल्दी होगी. यानी रोशनी कम हो जाने के बाद भी देश के उस हिस्से के दफ़्तरों में काम-काज चलता रहता है. यानी बिजली की खपत लगातार होती रहती है. ऐसे में अगर वहां के लिए नया टाइम ज़ोन बना दिया जाए तो वहां दिन के शुरू होते ही काम शुरू हो सकता है और दिन ढलने पर काम बंद किया जा सकता है. सरकारी कैलकुलेशन के हिसाब से नए टाइम ज़ोन को बनाने से एक साल में 2 करोड़ kWh बिजली बचाई जा सकती है. इतनी बिजली में 100 वाट के 23 हज़ार बल्ब एक साल के लिए जल सकते हैं. बाकी, आप खुद समझदार हैं.

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