
ड्रॉप इन पिच तैयार होकर ऐसे फिट हो जाती है.
पर्थ के इस नए स्टेडियम का नाम ओप्टस स्टेडियम है. और यहां 'ड्रॉप इन' पिच लगाई गई है. 'ड्रॉप-इन' पिच उसे कहा जाता है जो कहीं और तैयार की जाती है और फिर ये रेडिमेड पिच क्रेन से लाकर मैदान में फिट कर दी जाती है. जैसा कि तस्वीर में दिख रहा है, 22 यार्ड की ये पूरी पट्टी लगाकर फिट की जा रही है. पिछले कुछ सालों से इस तरह की पिचों का ट्रेंड खूब बढ़ रहा है. पहली बार इस तरह की पिच बगल के वाका स्टेडियम में लगाई गई थी. इस तरह की पिचों को ऑफ सीजन में लाकर फिट किया जाता है. उसके ऊपर मिट्टी की एक परत चढ़ा कर रखी जाती है ताकि पिच को मोइचर यानी नमी मिलती रहे. फिर क्रिकेट सीजन शुरू होने से पहले पिच क्यूरेटर अपनी घरेलू टीम की जरूरत और विरोधी टीम की कमजोरी के हिसाब से घास कम या ज्यादा करते हैं. क्रिकेट जानकार मानते हैं कि इस तरह की पिचें उसी नेचर की होती हैं जैसी पारंपरिक पिचें. वही मिट्टी, वही घास और बनाने का तरीका भी वही होता है जैसा नॉर्मल पिचों का.

क्रेन से लाई जाती हैं ये पिचें.
ड्रॉप-इन पिचों का कल्चर ऑस्ट्रेलिया में सबसे ज्यादा रहा है. पहले इस तरह की रेडीमेड पिचों को इसलिए यूज किया जाता था ताकि क्रिकेट ग्राउंड्स को दूसरे इवेंट्स के लिए भी यूज किया जा सके. इन्हीं मैदानों पर म्यूजिक कॉन्सर्ट, रग्बी और फुटबॉल के मैच भी होते रहे हैं. साथ ही जब 1970 के दशक में कैरी पैकर ने वर्ल्ड सीरीज क्रिकेट शुरू की थी तब इस तरह की ड्रॉप इन पिचें यूज कीं थी क्योंकि उन्हें कई वैन्यू यूज करने की इजाज़त नहीं मिली थी. उसके बाद अब विंटर्स में ऑस्ट्रेलिया में जिन मैदानों पर फुटबॉल मैच होते हैं, वहां क्रिकेट सीजन में ड्रॉप इन पिचें यूज की जाती हैं.
अब इंडिया इस पिच को पढ़ने में चूक गई है क्योंकि यहां कोहली चार पेसरों के साथ एक पार्ट टाइम स्पिनर के साथ उतरे हैं. टीम में इशांत, बुमराह, उमेश और शमी के अलावा हनुमा विहारी हैं. ऐसे में एक फुल टाइम स्पिनर की जरूरत इंडिया को खल सकती है क्योंकि इस पिच से तेज गेंदबाजों को कोई मदद मिलती नहीं दिख रही है और इस बात से ऑस्ट्रेलिया वाकिफ थी. इसलिए उन्होंने टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी नहीं, बैटिंग ली है. लंच तक इंडिया के गेंदबाज हांफते दिखे हैं.





















