‘मुसलमानों का आतंक को मुंहतोड़ जवाब’.लेकिन मुझे लगता है कि इसको इतना फ़िल्मी बनाने की जगह इसके निहितार्थ तलाश लेने चाहिए. एक सेक्युलर मुल्क में ये ‘ख़बर’ है, इसकी कहीं न कहीं मेरे दिल में टीस ज़रूर है. मुल्क के मौजूदा माहौल के लिए ज़िम्मेदार तत्व और आपसी विश्वास को खोते समाज, दोनों को ही सोचना चाहिए कि एक नॉर्मल और जायज़ प्रतिक्रिया ‘ख़बर’ क्यों है?
या फिर ‘आतंक का कोई धर्म नहीं होता’.
या ‘मुसलमानों ने साबित किया कि वो आतंक के खिलाफ़ खड़े हैं’.

सलीम शेख के शहर वलसाड में इकट्ठा हुआ मुस्लिम समुदाय.
बहरहाल, टिप्पणियां नहीं करते हैं. सीधे बताते हैं आपको कि 12 जुलाई को ‘वलसाड’ शहर में हुआ क्या. ये वही शहर है जहां से वो फेमस बस अमरनाथ गई थी. ये वही शहर है, जहां अमरनाथ यात्रा से 7 लाशें, 19 घायल और 2 हीरो लौट कर आए.
बस सलीम चला रहे थे या हर्ष, ये मसला अब सुलझ चुका है. ड्राइविंग सीट पर सलीम थे और हर्ष उनके बराबर में. दोनों की मिली-जुली बहादुरी और सूझ-बूझ का ही नतीजा था कि उस घातक आतंकी हमले से कई जानें बच पाईं.

"आतंकवाद को संदेश है कि हिंदुस्तान का हर हिंदुस्तानी सलीम है."
12 जुलाई की रात वलसाड की जामा मस्जिद में इशा की नमाज़ के बाद कुछ लोग इकट्ठा हुए. इशा की नमाज़ यानी रात की नमाज़. वलसाड नगर पालिका के हॉस्पिटल कमिटी के चेयरमैन सोहेल भाई क़ादरी से हमने बात की. वो इस मीटिंग में मौजूद थे. उन्होंने कहा,
“नमाज़ के बाद तय हुआ कि इस घटना की एक रैली निकालकर निंदा होनी चाहिए. वलसाड के तमाम मुसलमान इस रैली में शरीक हों. ये स्टेटमेंट देने के लिए कि हम आतंकवाद के खिलाफ़ हैं. इस्लाम किसी को मारने की इजाज़त नहीं देता. तकरीबन ढाई से तीन हज़ार लोगों ने इसमें शिरकत की.”

13 जुलाई को शाम चार बजे के करीब वलसाड के बस डिपो के पास वाली फातिमा मस्जिद में सब लोग जमा हुए. वहां से शहर के आज़ाद चौक तक जुलूस निकाला गया. सलीम शेख वहां मौजूद थे. मस्जिद से लेकर आज़ाद चौक तक, वो भी लोगों के साथ चलते रहे. आज़ाद चौक पहुंच कर मृत लोगों के लिए दुआ की गई. एक मिनट का मौन रखा गया.

मारे गए लोगों के लिए मौन रखते लोग.
एक्स कॉर्पोरेटर इम्तियाज़ुद्दीन क़ाज़ी भी इस रैली को ऑर्गनाइज़ करने वालों में शामिल थे. उन्होंने हमसे फोन पर कहा,
“ये रैली निकालने की मेन वजह ये थी कि हर वक़्त मुसलमानों को शक़ की नज़र से देखा जाता है. जबकि हम भी इसी मुल्क के रहने वाले हैं. हमें भी आतंकवादियों से नफरत है. हम किसी भी तरह के आतंकवाद के फेवर में नहीं हैं. जैसे हर आम भारतीय सोचता है, हम भी वैसे ही सोचते हैं. हम इस रैली के माध्यम से भारत सरकार से अपील करना चाहते थे कि वो इस घटना के दोषियों को कड़ी सी कड़ी सज़ा दे.”

इम्तियाज़ुद्दीन काज़ी और सोहेल भाई क़ादरी.
इम्तियाज़ुद्दीन काज़ी साहब ने आगे बताया कि वलसाड का मुस्लिम समाज एक अलग समारोह आयोजित करके सलीम शेख का ग्रैंड सम्मान करेगा. उन्हें किसी इनाम से नवाज़ेगा. हर्ष देसाई के बारे पूछने पर उन्होंने बताया कि वो अस्पताल में हैं. उनका ट्रीटमेंट चल रहा है. उन्होंने इस प्रोपगेंडा पर नाखुशी ज़ाहिर की, जिसमें सलीम की जगह हर्ष के बस चलाने की बातें उड़ाई जा रही हैं.

एक ख़ास बात काज़ी जी ने बताई. हमने उनसे पूछा कि इंटरनेट पर तरह-तरह के वर्जन आने के बाद माहौल ख़राब हुआ जा रहा है. क्या वलसाड में भी कोई कम्युनल टेंशन है? इस पर उनका कहना था कि ऐसी कोशिशें हुई तो थीं, लेकिन कामयाब न हो सकीं. कुछ तो ड्राइवर के 'सलीम' होने ने और कुछ मुसलमानों द्वारा निकाले गए इस जुलूस ने, ऐसी किसी भी मंशा का डंक निकाल दिया.

वलसाड के मुसलमानों का ये क़दम ज़रूरी था भी और नहीं भी. आदर्श भारत में ऐसे किसी कदम की ज़रूरत नहीं होती. लेकिन हम उस भारत से कोसों दूर आ गए हैं. इसलिए इन तस्वीरों की एकदम से अहमियत बन गई है. इन तस्वीरों को देखिए और किसी भी समुदाय की लेबलिंग करने से पहले थम कर सोचिए. बेसिकली हर आम आदमी खूंरेज़ी के, हिंसा के खिलाफ़ ही होता है. चाहे पैदा किसी भी मज़हब में हुआ है. यकीन कीजिएगा.

जुलूस के साथ सलीम शेख.
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