मामा ने 1959 में बॉम्बे ले जाकर एक स्कूल में दाखिला करवा दिया. वहां भी वो नंगे पैर ही था. मगर टेनिस गेंद से गजब का क्रिकेट खेलने लगा था. गिरगांव के मराठा हाई स्कूल की टीम में इस लड़के के साथ शरद हज़ारे, वसंत कुंते और एकनाथ सोलकर जैसे क्रिकेटर भी खेल रहे थे. अपने हैसिस शील्ड के मैच में वो नंगे पांव ही खेला जिसमें उसने चैंपियन टीम के खिलाफ 9 विकेट लिए थे. फिर अगले मैच में भी 7 विकेट लिए थे. लोग उसे नंगे पांव बॉलिंग करते हुए विकेट लेते देख खिलखिला उठते थे.

ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ शानदार डेब्यू किया था.
बाएं हाथ के इस मीडियम पेसर को लोग उमेश कुलकर्णी के नाम से जानने लगे थे. उस दौर में वीनू मांकड़ टीम इंडिया के कप्तान थे और जब उन्होंने उमेश की गेंदबाजी देखी तो उसे बुलाया और पूछा- तुम्हारी किट कहां है? जवाब मिला- नहीं है. फिर क्या था. किसी से कमीज ली, किसी से पतलून. जूते पहनने की आदत तो थी नहीं, मगर फिर भी जुगाड़ लिए. अपने एक इंटरव्यू में खुद उमेश कुलकर्णी ने कहा था कि उस वक्त तक मुझे अंदाजा भी नहीं था कि रनअप और ग्रिप क्या होती है और न ही फील्डिंग पॉजिशन का अंदाजा था. मगर फिर भी मांकड़ ने पॉली उमरीगर औऱ विजय मांजरेकर जैसे बल्लेबाजों के सामने उमेश से गेंदबाजी करवाई.
पहले बॉम्बे की रणजी टीम में जगह मिल गई और फिर ईरानी ट्रॉफी में खेलते हुए नवाब पटौदी को आउट किया. इसी से 1967 में ऑस्ट्रेलिया दौरे के लिए भी उमेश को चुन लिया गया. एडिलेड टेस्ट में पहले ही ओवर में ओपनर बिल लॉरी को विकेट के पीछे कैच करवा दिया. उमेश की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी की तरह बदली थी मगर 5 टेस्ट खेलने के बाद वो कहां और कैसे खो गया इसका किसी के पास कोई जवाब नहीं था. खुद उमेश ने कहा था- पहले तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी इंडिया के लिए खेलूंगा. फिर जब खेला और सफल नहीं रहा तो मैं भयानक रूप से निराश हो गया. मैं रम ही नहीं पाया.

जिंदगी 360 डिग्री बदली थी उमेश कुलकर्णी की.
जब वापिस भारत लौटा तो एक भी रणजी और ईरान ट्रॉफी का मैच तक नहीं खेला. इक्का-दुक्का चैरिटी मैचों में दिखा और इस तरह 28 साल की उम्र में ही ये जेनुइन टैलंट खो गया. तब तक वो 10वीं पास हो चुका था और टाटा कंपनी में नौकरी करने लगा था.
नंगे पांव से चप्पल पहनने तक की आदत में ढलने के लिए जिस इंसान को मुश्किल हुई हो, उसके लिए टीम इंडिया में जगह पाना और उसे बरकरार रखना बेहद मुश्किल काम था. क्रिकेट जानकारों ने ये भी माना कि उमेश को टीम में ले तो लिया गया मगर मानसिक तौर पर वो उन परिस्थितयों का सामने करने में अभी सक्षम ही नहीं था. न ही उसपर किसी ने कोई काम किया. ये छोटा क्रिकेट करियर सही में उमेश कुलकर्णी के लिए घातक ही साबित हुआ.
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