अमेरिका ने अपने 2 जंगी जहाज़ ताइवान स्ट्रेट की तरफ रवाना किए हैं. अमेरिकी नौसेना ने खुद इसकी जानकारी दी है. एंटीएटम और चांसलर्सविले नाम के ये जहाज़ रविवार को रवाना किए गए हैं. अमेरिका ने कहा है कि चीन ने उस पर जल मार्ग को कंट्रोल करने का आरोप लगाया है, लेकिन अमेरिका को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता. अमेरिका का कहना है, हम ताइवान के क्षेत्र में अपनी नेवी ऑपरेट करना जारी रखेंगे. चीन ने अमेरिका के इस मूव पर आपत्ति जताई. चेतावनी दे डाली. कहा कि हम जहाज़ों पर निगरानी रख रहे हैं. अगर हमारी संप्रभुता पर खतरा हुआ तो इसका पलट कर जवाब दिया जाएगा. नैंनी पेलोसी की अगस्त माह में हुई ताइवान यात्रा के बाद से ही अमेरिका और चीन के बीच तनाव लगातार बढ़ता ही जा रहा है.
ताइवान के रास्ते निकले अमेरिका के दो जंगी जहाज़, चीन ने दी वार्निंग!
चीन ने कहा हम पलट कर जवाब देने के लिए तैयार


दुनिया की ख़बरों में आज लीबिया भी बना रहा. वजह? लीबिया की राजधानी त्रिपोली में शनिवार को हिंसक झड़पे हुईं. इन झड़पों में 32 लोग मारे गए और 159 घायल हुए हैं. मरने वालों में लीबिया के कॉमेडियन मुस्तफा बराका भी शामिल हैं. बराका सोशल मीडिया में अपने वीडियोज़ से सरकार का मज़ाक बनाया करते थे. लीबिया में हालात अभी बेकाबू हैं. वहां हिंसा इतनी बढ़ गई है कि अस्पतालों तक को बक्शा नहीं जा रहा. अब तक कुल 6 अस्पतालों को निशाना बनाया जा चुका है.
इन झड़पों के पीछे की वजह क्या है?वजह हैं लीबिया में चल रही दो अलग-अलग सरकारें. एक जो लीबिया की राजधानी त्रिपोली से चलती है और जिसे संयुक्त राष्ट्र का समर्थन हासिल है. इस सरकार के नेता हैं अब्दुल हमीद. इसी के बरक्स एक और सरकार है, जो लीबिया के दूसरे इलाके तोबरुक पर कंट्रोल करती है. इस सरकार ने फ़तही बशाग़ा को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त कर रखा है.
दोनों पक्ष एक-दूसरे को अवैध बताते हैं. एक-दूसरे को पद से हटाने की धमकी देते हैं. ताजा झड़प भी इसी लड़ाई का हिस्सा है. इससे पहले मई में भी इसी प्रकार दोनों पक्ष आपस में भिड़ गए थे. जानकार बताते हैं कि इस हमले से लीबिया में वापस गृह युद्ध जैसे हालात बन सकते हैं.
अमेरिका भी आज ख़बरों में बना रहा. एक अमेरिकी जज की राय ने राष्ट्रपति बाइडन को कश्मकश में डाल दिया है. मुद्दे की शुरुआत साल 2012 से हुई. उस साल 9/11 हमले में मारे गए लोगों के परिवारजनों ने मिलकर अलकायदा और तालिबान पर केस कर दिया था. इनकी मांग थी कि इन्हें मुआवजा मिलना चाहिए. आने वाले सालों में ये लोग मुआवजे के लिए एक लम्बी लड़ाई लड़ते रहे.
इस बीच अगस्त 2021 में अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का कब्ज़ा हो गया. अफ़ग़ान सेन्ट्रल बैंक का 56 हजार करोड़ अमेरिका में था. सरकार ने उसे फ्रीज़ कर दिया. तालिबान लगातार इस पैसे की मांग करता रहा है, लेकिन अमेरिकी सरकार चूंकि तालिबान सरकार को मान्यता नहीं देती, इसलिए ये पैसा फ्रीज़ ही रखा गया. इस बीच 9/11 हमले में मारे गए लोगों के परिवारों ने राष्ट्रपति से मांग की कि इस पैसे को पीड़ित परिवारों में बांट देना चाहिए. इसके बाद इसी साल फरवरी महीने में राष्ट्रपति जो बाइडन ने एक एग्जीक्यूटिव आर्डर जारी करते हुए कहा कि 56 हजार करोड़ में से आधी रकम अफ़ग़ान लोगों की बेहतरी के लिए इस्तेमाल होगी. बाकी रकम के लिए पीड़ित परिवार अदालत जा सकते हैं. इसके अलावा सरकार ने इस मामले में एक समिति का गठन किया और इस मुद्दे पर विचार करने को कहा. समिति ने शुक्रवार को अपनी राय दी. एक मेंबर जज सैरा नेटबर्न ने कहा,
“अगर सरकार अफ़ग़ान सेन्ट्रल बैंक के पैसों को सीज कर लेती है, तो इसका मतलब होगा तालिबान सरकार को मान्यता देना. और इसका फैसला सिर्फ राष्ट्रपति ले सकते हैं”
अब बॉल दोबारा जो बाइडन के पाले में है. और देखना दिलचस्प होगा कि वो इस मामले में क्या फैसला लेते हैं. अमेरिका में फ्रीज़ रकम के अलावा अफ़ग़ान सेन्ट्रल बैंक का लगभग 20 हजार करोड़ बाकी देशों ने फ्रीज़ किया हुआ है. ये पैसा आधिकारिक तौर पर अभी भी अफ़ग़ानिस्तान का है. लेकिन चूंकि किसी भी देश ने अभी तक तालिबान को मान्यता नहीं दी है. इसलिए इस पैसे के ट्रांसफर और लीगल स्टेटस पर संशय ज्यों का त्यों है.
पाकिस्तान में बाढ़ से मची तबाही पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है



















