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चीन की जिस लैब से आया कोविड, उसे पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति के चीफ डॉक्टर ने फंड दिया?

आरोप है फाउची ने वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में ‘चमगादड़ और कोरोना वायरस’ पर रिसर्च करने के लिए अमेरिकी टैक्सपेयर्स के लाखों डॉलर दिए था. यहां तक कि वायरस के लैब से लीक होने वाली बात को दबाने के लिए भी फाउची ने राजनीति से प्रेरित अधिकारियों से मिलीभगत की.

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तुलसी गैबार्ड (दाएं) ने डॉ. एंथनी फाउसी (बाएं) पर गंभीर आरोप लगाया. (फोटो- इंडिया टुडे)

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  • नेशनल इंटेलिजेंस की पूर्व डायरेक्टर तुलसी गबार्ड ने डॉ. एंथनी फाउची पर आरोप लगाया कि उन्होंने वुहान लैब को अरबों डॉलर का फंड देकर COVID-19 महामारी को जन्म देने में योगदान दिया।
  • तुलसी गबार्ड ने 19 जून को प्रेस रिलीज़ जारी कर फाउची पर महामारी से जुड़े सूचनाओं को छिपाने, इंटेलिजेंस कम्युनिटी में हेरफेर और राजनीति का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया।
  • इन आरोपों के बाद भी फाउची ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, और यह मामला अमेरिकी कांग्रेस और जनता के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस की डायरेक्टर तुलसी गबार्ड ने COVID-19 महामारी की शुरुआत को लेकर बड़ा दावा किया है. तुलसी ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के चीफ डॉक्टर, डॉ. एंथनी फाउची पर आरोप लगाया है कि डॉ. फाउची ने चीन के वुहान में स्थित उस लैब को अरबों डॉलर का फंड दिया था, जहां से इस भीषण महामारी ने जन्म लिया था. 

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तुलसी अपने पद से इस्तीफा दे चुकी हैं जो 30 जून के बाद प्रभावी होगा. 19 जून को उनके ऑफिस के ओर से जारी एक प्रेस रिलीज में फाउची पर कई आरोप लगाए गए हैं. प्रेस रिलीज के मुताबिक, साल 2020 में जब यह महामारी शुरू हुई, तब फाउची ने बाइडेन सरकार में इससे जुड़ी नीतियों का खुद नेतृत्व किया था.

आरोप है फाउची ने वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में ‘चमगादड़ और कोरोना वायरस’ पर रिसर्च करने के लिए अमेरिकी टैक्सपेयर्स के लाखों डॉलर दिए था. यहां तक कि वायरस के लैब से लीक होने वाली बात को दबाने के लिए भी फाउची ने राजनीति से प्रेरित अधिकारियों से मिलीभगत की.

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प्रेस रिलीज में दावा किया गया कि कोविड-19 पर इंटेलिजेंस कम्युनिटी (IC) के आकलनों के साथ भी फाउची ने हेर-फेर किया. यहां तक कि साल 2024 में उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस से और वायरस रिसर्च में शामिल होने के सवालों पर इंटेलिजेंस अधिकारियों से भी झूठ बोला.

फाउची ने 2022 में अपना पद छोड़ दिया था. उन्होंने ने कम से कम 38 सालों तक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इनफेक्शियस डिजीज के हेड के तौर पर भी काम किया. आरोप है कि इस समय भी वो बड़ी फार्मा कंपनियों से जुड़े और यूनिवर्सल वैक्सीन की खोज के लिए खरबों डॉलर का फंड दिया.  

रिपोर्ट में फाउची को ‘पर्दे के पीछे का एक्सपर्ट’ बताया गया. जिसने अपने चुने हुए एक्सपर्ट्स के साथ मिलकर IC पर दबाव बनाया कि वे वायरस की प्रकृति और जानवरों से पैदा होने वाली बात को मान लें, जिससे उनके इस खतरानक रिसर्च के बारे में किसी को पता न चले और वो रिसर्च छिपी रह जाए. 

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फाउची पर आरोप है कि उन्होंने इस महामारी के दौरान IC के भीतर राजनीतिक रूप से प्रेरित नेताओं के साथ मिलकर एक रिपोर्टिंग लूप बनाया. इसके लिए उन्होंने फंडेड वैज्ञानिकों का सिलेक्शन किया.

गबार्ड के ऑफिस ने फाउची पर यह भी आरोप लगाया कि एक सीनियर एनालिस्ट्स ने इस काम के लिए उनकी खूब तारीफ की और उन्हें एक असली ‘कोरोना वायरस एक्सपर्ट’ तक पहुंचाने वाला ‘न्यूट्रल गाइड’ बताया. जबकि, ऐसे एक्सपर्ट्स को नजरअंदाज कर दिया गया, जो फाउची की बातों से सहमत नहीं थे.

DNI ने सच छिपाने के लिए इस्तेमाल किए गए तरीकों का सीधा संबंध ‘डीप स्टेट प्लेबुक’ से बताया. कहा कि फाउची जैसे राजनीति से प्रेरित लोगों ने अपना फायदा देखने के लिए सत्ता का दुरुपयोग किया, इंटेलिजेंस में हेर-फेर किया और कांग्रेस से भी झूठ बोला.

आरोप ये भी है कि 2024 में फाउची ने कांग्रेस के सामने गवाही देते समय झूठ बोला था. उस समय भी फाउची से कई दफा पूछा गया कि क्या उन्होंने महामारी के पहले, उसके दौरान या उसके बाद ‘वायरस रिसर्च’ के बारे में FBI, CIA, DIA या किसी और इंटेलिजेंस एजेंसी से बात की थी.

फाउची ने हर बार इन सवालों को टाल दिया और गलत ढंग से कहा कि ‘मेरी जानकारी में कोविड के बारे में ऐसा कुछ भी नहीं है.’हालांकि, इतने गंभीर आरोप लगने के बाद भी अभी तक डॉ. फाउची की ओर से कोई रिएक्शन नहीं आया है.

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