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पढ़ने को किताबें तक नहीं थी, जम्मू-कश्मीर में तीन भाई-बहन एक साथ बने PCS अधिकारी

एक बार में पूरा परिवार अधिकारी बन गया.

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बाएं से दाएं: सुहैल अहमद वानी, हुमा वानी और इफ़रा वानी (फोटो - सोशल मीडिया)

आज सैटरडे है. एक अच्छी कहानी पढ़िए. कहानी है जम्मू-कश्मीर से.

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इंडियन एक्सप्रेस के अरुन शर्मा की रिपोर्ट के मुताबिक़, जम्मू के डोडा ज़िले के तीन भाई-बहनों ने जम्मू-कश्मीर का सिविल सर्विस इग्ज़ाम (JKCSE) निकाल लिया. तीनों ने.

सबसे बड़ी बहन है हुमा वानी. उससे छोटी इफ़रा अंजुम वानी. और, सबसे छोटा भाई सुहैल. इफ़रा और सुहैल ने पहले ही अटेम्प्ट में सिविल क्लियर कर लिया और हुमा ने दूसरी बारी में. और, रैंक भी अच्छी. तीनों 150 के अंदर. पूरे परिवार में ये तीनों भाई-बहन पहले हैं, जिनकी सरकारी नौकरी लगी है.

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पिता मुनीर अहमद वानी मज़दूरी कॉन्ट्रेक्टर का काम करते हैं. कुल पंद्रह-बीस हज़ार महीना कमा लेते हैं. मां गृहणी हैं. बचपन बीता जम्मू के कहारा और किश्तवर शहर में. फिर बच्चों की पढ़ाई के लिए परिवार 2010 में डोडा के बाहु फ़ोर्ट के पास रहने लगे. एस अस्थायी कॉलोनी में, जहां से सड़क पांच किलोमीटर दूर थी. तीन कमरे का मकान और पांच लोगों का परिवार. मेहमान आते थे घर में लोगों की संख्या बढ़ जाती है. जैसे सर्दियों में घर में 10-12 लोग और गर्मियों में 6-8 लोग रहते थे. अब ऐसे में भाई-बहनों को एक ही कमरे में रहना पड़ता था.

सुहेल ने 2019 में गवर्नमेंट MAM कॉलेज से ग्रेजुएशन किया. हुमा और इफ़रा ने 2020 में IGNOU से पॉलिटिकल साइंस में MA किया. फिर 2021 में तीनों ने तय किया कि सिविल परिक्षा की तैयारी करेंगे. इफरा ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया,

“हमारे पास कोई मोबाइल फ़ोन नहीं था. हर विषय में केवल एक किताब होती थी. तीनों उसी से पढ़ते थे. नतीजतन, हुमा और सुहेल के बीच हमेशा एक किताब पढ़ने के लिए लड़ते रहते थे. मैं उनके बीच सुलह करवाती थी.”

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हुमा कहती हैं कि क्या पढ़ना है और कैसे पढ़ना है, इस बारे में भी कोई आइडिया नहीं था.

सुहैल पुलिस सेवा में शामिल होना चाहता है क्योंकि उसका कहना है कि पुलिस की नौकरी में शक्ति और जिम्मेदारी दोनों आती है. कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर में ड्रग्स के ख़तरे के ख़िलाफ़ काम करना चाहते हैं. उनकी बहनें एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस में शामिल होना चाहती हैं और समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों के लिए काम करना चाहती हैं. ख़ासतौर पर महलिओं के लिए, जो पितृसत्तात्मक मानसिकता के कारण पीड़ित हैं.

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