डॉक्टर बालासुब्रमनियम. प्यार से उन्हें लोग '20 रुपये वाला डॉक्टर' बुलाते थे. पिछले 12 साल से गांधीपुरम के पास सिद्धापुदुर में अपना क्लीनिक चला रहे थे. उन्होंने करियर की शुरुआत बोदी से की थी. जहां पेशेंट से वो केवल 5 रुपये फीस लेते थे. डॉक्टर साब बोदी से फिर कोयंबटूर के ESI अस्पताल शिफ्ट हुए. वहां उन्होंने अपनी फीस दोगुनी कर दी. 5 की जगह 10 रुपये लेने लगे. लोग तो उनको 15 रुपये देने के लिए मुंह पिजाये रहते थे. क्योंकि लोगों को उनकी डॉक्टरी पर भरोसा था.भूपैथी. डॉक्टर बालासुब्रमनियम के पेशेंट हैं. पिछले 10 साल से. उन्हें जब डॉक्टर साब की मौत की खबर मिली तो उन्हें यकीन नहीं हुआ. उन्हें लगा कि किसी ने उनके मरने की अफवाह फैलाई है. वो बताते हैं, 'शुरुआत में तो वो 10 रुपये लेते थे. पर पिछले दो साल से वो 20 रुपये लेने लगे थे. मैं उनका पुराना पेशेंट हूं. उन्हें कभी पैसों का मोह नहीं था. डॉक्टर साब के पास मैंने अधिकतम 50 रुपये इलाज के लिए खर्च किए हैं. उसमें से 20 रुपये उनकी फीस और 30 रुपये की दवाई. वो डॉक्टर नहीं भगवान थे.'
गांधीपुरम में रहने वाले अरुण कहते हैं कि उनके क्लीनिक में हर वक्त लंबी लाइनें लगीं होती थीं. उन्हें मरीजों के आगे कुछ नहीं दिखता था. आधी रात को भी अगर कोई उनके दरवाजे की कुंडी खड़का देता तो वो उसकी हेल्प करते थे. बालासुब्रमनियम मरीजों की तकलीफ को आराम से सुनते और फिर इलाज करते थे.उनके मरने की खबर शहर में फैलते ही क्लीनिक के बाहर भीड़ लग गई थी. वो भी इतनी कि ट्रैफिक पुलिस उसे कंट्रोल नहीं कर पा रही थी. कुछ ने उनके लिए प्रार्थना की तो कुछ ने कैंडल जलाकर उनकी आत्मा की शांति के लिए विश किया.
डॉक्टर बालासुब्रमनियम की पोती बैंगलुरु में रहती है. दादू की मौत की खबर मिलते ही वो कोयंबटूर आई. उसने कहा, 'मैंने अपने दादू को बचपन से देखा है. वो बहुत अच्छे इंसान थे. वो अब घर में तो नजर नहीं आएंगे पर मैं उन्हें लोगों की आंखों में देख रही हूं.' ये भी पढ़िये..
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