रामानायडु पालाकोल विधानसभा से टीडीपी के विधायक हैं. उन्होंने बताया कि पालाकोल शहर में स्थित श्मशान की हालत बहुत खराब है. बारिश के दिनों में यह एकदम दलदल में बदल जाता है. इसके अलावा यहां न तो डेड बॉडी को रखने के लिए कोई ढंग का प्लेटफॉर्म है, न ही अंतिम संस्कार के बाद नहाने की सुविधा. पास में बहुत सारा कचरा पड़ा है जिसमें से बदबू आती रहती है. अंतिम संस्कार के लिए कोई दूसरी जगह नहीं है. ऐसे में इस जगह के सुधार के लिए राज्य सरकार से आठ महीने पहले तीन करोड़ रुपए पास करवाए.

श्मशान में ही खाना खाते रामानायडु और उनके साथी.
पैसे मिलने पर टेंडर निकाला गया, लेकिन वहां भूतों के अंधविश्वास के चलते दो बार किसी ने टेंडर ही नहीं भरा. तीसरी बार टेंडर निकालने पर एक ठेकेदार काम करने को राजी हुआ तो उसके मजदूरों ने डर से काम करने से मना कर दिया. मजदूरों को कई बार समझाया गया, लेकिन वो फिर भी काम करने को तैयार नहीं हुए. ऐसे में भूतों का डर भगाना जरूरी था. इसलिए रामानायडु ने यह तय किया कि वो खुद रात को श्मशान में रुकेंगे और खाना भी वहीं खाएंगे.

भूतों ने नहीं मच्छरों ने किया परेशान.
सारे काम यहीं से किए
रामानायडु 22 जून को दिनभर श्मशान में बैठे रहे. वहीं से अपना सारा काम किया. फिर रात को वहीं अपनी चारपाई बिछाई और सो गए. अगले दिन उन्होंने कहा कि यहां भूत जैसा कुछ नहीं है. बस कचरे की बदबू आई और मच्छरों ने काटा. उसके लिए वो मच्छरदानी का इंतजाम कर आराम से सोए. इसके बाद वो 23 और 24 जून को भी श्मशान में ही सोए. अब कौन ही चाहेगा कि उसे मच्छरों के बीच में सोना पड़े पर विधायक जी ने अंधविश्वास हटाने के लिए ये जोखिम उठाया.

रामानायडु की पहल के बाद हुआ श्मशान में निर्माण कार्य शुरू.
रामानायडु की ये पहल रंग लाई और 23 जून से मजदूर काम पर आ गए. मजदूरों के आने पर रामानायडु ने काम शुरू करवाया. पूरे काम की वो खुद मॉनिटरिंग कर रहे हैं. रामानायडु को जल्द ही श्मशान की हालत सुधरने की उम्मीद है. रामानायडु 2014 में पहली बार विधायक चुने गए थे. वो आंध्र यूनिवर्सिटी से एमफिल-पीएचडी हैं.
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