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जिस लड़के का HIV संक्रमित खून गर्भवती महिला को चढ़ाया गया, उसने सुसाइड कर लिया

क्या अपराधबोध में दे दी जान?

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ब्लड डोनेशन में लापरवाही के चलते गई जान.
क्या आपने कभी सुना है कि अपराधबोध में किसी ने खुद की जान ले ली हो? अगर नहीं, तो हम एक ऐसी घटना आपको बताने वाले हैं जहां एक लड़के ने केवल इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसे लगा कि उसकी वजह से किसी की ज़िंदगी बर्बाद हो गई. दरअसल एक नहीं, दो.
तमिलनाडू में पिछले दिनों एक 19 साल के लड़के ने गलती से एक गर्भवती महिला को एचआईवी संक्रमित खून दे दिया. गलती से इसलिए क्योंकि खून देने से पहले उसे भी नहीं मालूम था कि उसे एड्स है. इस बात का पता चलने के बाद लड़के ने 27 दिसंबर को ज़हर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की. इस कोशिश में उसकी तो जान नहीं गई लेकिन उसके बाद से ही उसकी हालत ख़राब चल रही थी. रामनाथपुरम सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों ने उसे बचाने की कोशिश की. जब कंडीशन हाथ से निकलने लगी तो उसे मदुरई के सरकारी अस्पताल में ट्रान्सफर किया गया. यहां भी उसे बचाया नहीं जा सका और 30 दिसंबर की सुबह ही उसकी मदुरई के राजाजी सरकारी अस्पताल में मौत हो गई.
उसे अपनी बीमारी का उस वक़्त पता चला जब पासपोर्ट बनवाने के दौरान ज़रूरी मेडिकल जांच की गई. बाद में जब लड़के ने बताया कि उसने ब्लड डोनेट भी किया है तो पता चला कि वो खून एक 23 साल की एक गर्भवती महिला को चढ़ाया जा चुका है. क्योंकि लैब अटेंडेंट ने उस पर लापरवाही में 'सेफ' लिख दिया था. शुरुआती जांच में ब्लड बैंक के तीन कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया गया.  मद्रास हाई कोर्ट ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए अस्पताल को तीन जनवरी तक रिपोर्ट देने को कहा है.
ब्लड डोनेशन कैंप. (प्रतीकात्मक चित्र)
ब्लड डोनेशन कैंप. (प्रतीकात्मक चित्र).

लड़के ने जो ब्लड डोनेट किया था वो उसके रिश्तेदारों को चढ़ाया जाना था लेकिन बाद में जब उसे यूज नहीं किया गया और अस्पताल के ब्लड बैंक में स्टोर कर लिया गया. ये गर्भवती महिला जब अपनी नियमित जांच के लिए अस्पताल पहुंची तो डॉक्टरों ने उसमें खून की कमी बताई. अस्पताल में खून चढ़ाया गया जो अब उसे एड्स जैसी जानलेवा बीमारी दे सकता है. महिला का एंटी रेट्रोवायरल इलाज किया जा रहा है. जिसमें ये कोशिश की जाती है कि खून में वायरस को फैलने से रोका जाए जिससे एड्स न हो. सरकार का कहना है कि आगे से गर्भवती महिलाओं और बच्चे का खास ख्याल रखा जाएगा. डॉक्टर इस बात का भी ध्यान रख रहे हैं कि बच्चे पर इसका असर ना हो. सरकार ने कहा है कि वो मां और बच्चे के इलाज का खर्च सरकार उठाएगी.
दरअसल लड़का भी एचआईवी के संपर्क में उस वक़्त आया जब उसने सत्तूर में अपना ब्लड डोनेट किया था. ये अस्पताल की तरफ से की जा सकने वाली भयंकर लापरवाहियों में से एक है. अच्छा है जो सरकार और कोर्ट ने इसका वक़्त रहते संज्ञान लिया और डैमेज कंट्रोल की कोशिशें शुरू की जा सकीं. ये पुख्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता कि आत्महत्या करने वाले लड़के की जान उसके अपराधबोध ने ली या उसके एचआईवी के डर ने. मगर इस तरह की लापरवाहियां कतई बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए. ब्लड डोनेशन एक मानवता का काम है और इसके लिए आगे आने वाले लोगों की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी सरकारी की होनी चाहिए.


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