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सर्जिकल स्ट्राइक के दो साल बाद अब विडियो सेना से किसने और क्यों लीक किया?

सेना और सरकार ने आधिकारिक तौर पर ये नहीं किया, तो उन्हें चिंता होनी चाहिए कि किसने किया.

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मोदी सरकार और सेना, दोनों को ये बताना चाहिए कि ये विडियो न्यूज चैनल्स के पास कैसे और क्यों पहुंचा? क्या अब इनके जारी होने पर राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित नहीं होगी क्या? ये विडियो जिस गुपचुप तरीके से सामने आए हैं, वो भी परेशान करने वाली बात है.
29 सितंबर, 2016. भारतीय सेना के DGMO लेफ्टिनंट जनरल रणबीर सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की. अगले कुछ मिनटों में उन्होंने जो कहा, वो भारत और पाकिस्तान में हेडलाइन बनने वाला था. DGMO ने बताया कि भारतीय सेना ने LoC के पार पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर (PoK) में सर्जिकल स्ट्राइक की. म्यांमार वाली सर्जिकल स्ट्राइक को अपवाद मानकर छोड़ दें तो ये शायद पहली बार था, जब सेना के किसी खुफिया ऑपरेशन पर इतनी जल्दी ब्रीफ आई थी. सरकार ने सेना की और अपनी पीठ थपथपाई. लोगों ने सेना और सरकार, दोनों की पीठ थपथपाई. विपक्ष ने किसी की पीठ नहीं थपथपाई.
विडियो साफ नहीं है. मगर कुछ चीजें नजर आ जाती हैं. जैसे, ढलवां छत वाला एक घर, जो शायद LoC के पार का आतंकियों का एक ठिकाना है. हम बस इसका अनुमान ही लगा सकते हैं. क्योंकि हमारे पास सरकार या सेना का कोई आधिकारिक बयान नहीं है.
विडियो साफ नहीं है. मगर कुछ चीजें नजर आ जाती हैं. जैसे, ढलवां छत वाला एक घर, जो शायद LoC के पार का आतंकियों का एक ठिकाना है. हम बस इसका अनुमान ही लगा सकते हैं. क्योंकि हमारे पास सरकार या सेना का कोई आधिकारिक बयान नहीं है.

सर्जिकल स्ट्राइक के समय सरकार ने क्या कहा था? 27 जून, 2018. भारत के न्यूज चैनलों ने एक खास चीज दिखाई. धुंधला सा एक विडियो. जिसमें एक टीन की शेड वाला घर था. पेड़ों का झुरमुट था. और बम धमाके हो रहे थे. देखने वालों को बताया गया कि ये सब सितंबर 2016 में हुए सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत है. सेना के खास कैमरों ने तब ये विडियो बनाया था. उन्हीं विडियोज से लिया गया फुटेज है. इतना टॉप सीक्रेट, हाइली क्लासिफाइड विडियो न्यूज चैनलों तक कैसे पहुंचा? इसके जवाब में बताया गया कि सेना के ही आधिकारिक सूत्रों ने चैनल्स को ये फुटेज मुहैया कराए. इसके ऊपर न सेना का कोई आधिकारिक बयान आया. न मोदी सरकार का. बयान न आना मामूली बात नहीं है. क्योंकि ये मुद्दा कतई मामूली नहीं है. क्या हुआ, कैसे हुआ, हमें कुछ नहीं मालूम. मालूम है, तो बस इतना कि अब विडियो पर राजनीति हो रही है. और ये राजनीति अभी खत्म नहीं होगी. इसका जिक्र अभी खत्म नहीं होगा. इस विडियो के बाहर आने और बाहर आने के तरीके से कुछ बड़े परेशान करने वाले सवाल पैदा हुए हैं. उन सवालों पर आने से पहले ये बताना जरूरी है कि 2016 से लेकर अभी 2018 तक सरकार नहीं बदली है. मोदी ही प्रधानमंत्री थे, मोदी ही प्रधानमंत्री हैं. तब उन्हीं की सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत देने से इनकार कर दिया था. इसके पीछे कई कारण गिनाए गए थे. तब कहा था कि विडियो जारी करने में सेना का अपमान है सर्जिकल स्ट्राइक से जुड़े विडियो जारी न करना, ये मोदी सरकार का फैसला था. गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं हंसराज अहिर. वो तब भी इसी पद पर थे. उन्होंने कहा था कि सेना के पास सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत है. ये सबूत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपा जाएगा. वो ही तय करेंगे कि इन सबूतों को जारी करना है कि नहीं. देश को ये बताया गया कि सेना ने विडियो फुटेज सरकार को सौंपे हैं. साथ में हरी झंडी भी दे दी है. कि अगर ये फुटेज जारी किए जाते हैं, तो उनको कोई आपत्ति नहीं होगी. मगर आखिरी फैसला मोदी सरकार को लेना था. सरकार ने कहा, सबूत नहीं देंगे. तुमको यकीन करना होगा कि सर्जिकल स्ट्राइक हुई है. अगर भरोसा नहीं किया, तो साबित होगा कि तुम देशविरोधी और सेनाविरोधी हो. ये भी कहा गया कि अगर सबूत सार्वजनिक किया गया, तो इससे सेना और सुरक्षाबलों का मनोबल गिरेगा. वो अपमानित महसूस करेंगे. मोदी सरकार के मंत्रियों और बीजेपी नेताओं के बयान याद करिए इस दौर में कुछ बड़े बयान आए. उनमें से एक था अरविंद केजरीवाल का स्टेटमेंट. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो सार्वजनिक करने को कहा था. उनकी बड़ी फजीहत हुई थी. हमें बीजेपी के वरिष्ठ नेता रवि शंकर प्रसाद का बयान याद आ रहा है. उन्होंने केजरीवाल की निंदा करते हुए कहा था कि वो (यानी दिल्ली के CM) सबूत मांग कर पाकिस्तान के दुष्प्रचार का समर्थन कर रहे हैं. और सेना की बहादुरी पर सवाल उठा रहे हैं. रवि शंकर प्रसाद ने कहा था-
अरविंद केजरीवाल जी, आप अब पाकिस्तानी मीडिया के अंदर सुर्खियों में हैं. पाकिस्तानी मीडिया कह रही है कि एक भारतीय नेता, वो भी मुख्यमंत्री भारतीय सेना के ऑपरेशन और तैयारियों पर सवाल उठा रहा है. भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर केजरीवाल जी को राजनीति नहीं करनी चाहिए. उन्हें इस तरह के सवाल नहीं उठाने चाहिए थे. कल ही एक बीएसएफ जवान मारा गया. मैं केजरीवाल जी से अपील करूंगा कि राजनीति अलग चीज है. वो कोई ऐसा काम न करें जहां भारतीय सेना पर सवाल खड़े होते हों.
सर्जिकल स्ट्राइक के समय वेंकैया नायडू शहरी विकास मंत्री थे. अब उपराष्ट्रपति हैं.
सर्जिकल स्ट्राइक के समय वेंकैया नायडू शहरी विकास मंत्री थे. अब उपराष्ट्रपति हैं.

वेंकैया नायडू अब उपराष्ट्रपति हैं. तब वो शहरी विकास मंत्री हुआ करते थे. उन्होंने कहा था कि सरकार सर्जिकल स्ट्राइक की सबूत पब्लिक नहीं करेगी. उनके शब्द थे-
पूरा देश, पूरी दुनिया जानती है कि सर्जिकल स्ट्राइक हुई. इसीलिए इसका सबूत देने की कोई जरूरत नहीं है.
मंत्री जी के बाद फिर बीजेपी ने कहा. कि सर्जिकल स्ट्राइक की सबूत देने की कोई जरूरत नहीं है. बीजेपी ने तब साफ कहा था. कि सेना के ऑपरेशन का सबूत मांगना राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ होगा. बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव थे श्रीकांत शर्मा. उन्होंने कहा था-
हम सर्जिकल स्ट्राइक से जुड़े विडियो क्लिप और बाकी सबूत क्यों जारी करें? हम सेना से जुड़ी खुफिया चीजों को सार्वजनिक कैसे कर सकते हैं? ये राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मसला है और ये हमारे राष्ट्रीय हितों के खिलाफ होगा.
एक और भी बात कही थी उन्होंने. कि मुंबई में हुए आतंकी हमलों और पठानकोट एयरबेस पर हुए अटैक के बाद भारत ने सबूत दिखाए थे. लेकिन उनसे क्या हासिल हुआ. श्रीकांत शर्मा ने कहा था-
कुछ हुआ क्या उससे? दोषियों को सजा देने के लिए पाकिस्तान ने कुछ किया? कोई कार्रवाई की? हम कब तक उनकी मांगें पूरी करते रहेंगे? अब हम बस करके जवाब देंगे. न कुछ कहा जाएगा और न ही कोई सबूत ही दिया जाएगा.
श्रीकांत शर्मा का एक और बयान पढ़िए-
सर्जिकल स्ट्राइक हुई कि नहीं, इसका सबूत देने वाली बात पाकिस्तान में उठी. ये बात हमारे देश के फायदे में नहीं है. विपक्ष के नेता जो सबूत की बात कर रहे हैं, इसकी वजह से पाकिस्तान द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक पर उठाए गए सवालों को तूल मिला है. सेना द्वारा किए गए ऑपरेशन पर सवाल उठाना, इसका सबूत मांगना उनकी बेइज्जती करने के बराबर है.
ये सारे बयान तो थे ही. साथ में सेना द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक जैसे टॉप सीक्रेट ऑपरेशन को पब्लिक किए जाने का भी मुद्दा था. मतलब कि सेना ने ये बात बताई ही क्यों? पहले भी तो ऑपरेशन होते रहे हैं. फिर इस बार क्यों इसका ऐलान किया गया? तब हंसराज अहिर ने कहा था-
सेना ने पूरी प्रक्रिया का पालन किया है. DGMO ने सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में मीडिया को जानकारी दी. मीडिया को ब्रीफ किया गया. ये सही काम हुआ. ऐसा ही होना चाहिए. पहले लिखित कागजात सरकार के सुपुर्द किए जाते थे. अब तो तकनीक बहुत आगे बढ़ गई है.
ये पाकिस्तान के एबटाबाद स्थित उस जगह का हवाई नजारा है, जहां ओसामा बिन लादेन छुपकर बैठा था. जो जगह घेरे में है, वहीं रह रहा था वो. अमेरिका ने यहां सीक्रेट ऑपरेशन करके ओसामा को मार डाला था (फोटो: रॉयटर्स)
ये पाकिस्तान के एबटाबाद स्थित उस जगह का हवाई नजारा है, जहां ओसामा बिन लादेन छुपकर बैठा था. जो जगह घेरे में है, वहीं रह रहा था वो. अमेरिका ने यहां सीक्रेट ऑपरेशन करके ओसामा को मार डाला था (फोटो: रॉयटर्स)

अमेरिका ने सबूत दिया, जो हम दें? हां. एक और भी जिक्र सुनाई दिया था तब मोदी सरकार के मंत्रियों के मुंह से. ओसामा बिन लादेन का. ये मंत्री और बीजेपी नेता कई जगहों पर कहते सुनाई दिए. कि अमेरिका ने जब पाकिस्तान में घुसकर ओसामा को मारा, तब क्या अमेरिका ने कोई सबूत जारी किया? अमेरिका ने न तो कोई विडियो क्लिप दिखाई दुनिया को और न ही कोई कागजात ही दिए. तब हंसराज अहिर के शब्द बिल्कुल यही थे-
आमतौर पर ऐसी चीजें सार्वजनिक नहीं की जाती हैं.
उमा भारती बोली थीं-
कुछ नेता कह रहे हैं कि अगर पाकिस्तान सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांग रहा है, तो हमें सबूत दे देना चाहिए. ऐसे नेताओं को पाकिस्तान की नागरिकता ले लेनी चाहिए.
सबूत मांगे जाने पर
सरकार ने कहा था कि सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगने वाले असल में सेना का अपमान कर रहे हैं. सेना की तरफ से ये खबर आई थी कि वो सर्जिकल स्ट्राइक के ऊपर हो रही राजनीति से दुखी है. बेमतलब की बहस खत्म करने के लिए ही सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक से जुड़े विडियो प्रधानमंत्री को सौंपे थे (फोटो: रॉयटर्स)

और कुछ कारण, जो सरकार ने हमें गिनाए हमें ये भी बताया गया कि सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत देने से भारत के सामरिक हित प्रभावित होंगे. कि इसका मतलब होगा कि वो खुद पर सवाल उठानेवालों को तवज्जो दे रहा है. पाकिस्तानी सेना, वहां की हुकूमत और मीडिया. सबने कहा था कि भारत झूठ बोल रहा है. कोई सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हुआ. अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी कुछ जगहों पर भारत के दावों पर सवाल उठे थे. ऐसे में सबूत देने का मतलब था कि भारत ऐसे सवालों को गंभीरता से ले रहा है. भारत अपनी जो ताकतवर छवि बनाना चाहता है, उसको भी कमजोर करेगा ये.
असली सवाल यही है. कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद कितनी सारी गंभीर और संवेदनशील वजह गिनाई गई. कहा गया कि विडियो किसी भी हाल में जारी नहीं किया जा सकता. वो तर्क समझ आता है. लेकिन दो साल से भी कम वक्त के अंदर विडियो का बाहर आ जाना समझ से बाहर है (फोटो: रॉयटर्स)
असली सवाल यही है. कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद कितनी सारी गंभीर और संवेदनशील वजह गिनाई गई. कहा गया कि विडियो किसी भी हाल में जारी नहीं किया जा सकता. वो तर्क समझ आता है. लेकिन दो साल से भी कम वक्त के अंदर विडियो का बाहर आ जाना समझ से बाहर है (फोटो: रॉयटर्स)

तब नहीं दिए सबूत, तो अब क्यों? अब सवाल ये उठता है कि सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत, उसके विडियो फुटेज क्यों जारी किए गए? दो साल भी पूरे नहीं हुए अभी. इतने कम वक्त में क्या वो सारी चिंताएं खत्म हो गईं जिनकी वजह से तब सबूत नहीं दिए गए थे? तब कहा गया था कि विडियो जारी करने से सेना के हथियार, उसकी ताकत से जुड़ी कुछ संवेदनशील चीजें भी सार्वजनिक हो जाएंगी. इससे सामरिक नुकसान हो सकता है. दुश्मन इसका फायदा उठा सकता है. तो अब उन चिंताओं का क्या हुआ? फुटेज जारी किए गए, वो भी इस तरह दबे-छुपे! सेना के आधिकारिक सूत्रों ने न्यूज चैनलों को विडियो मुहैया कराया? क्यों? चूंकि सेना या सरकार ने इसे ऑफिशली रिलीज नहीं किया, तो क्या ये माना जाए कि इतनी सेंसेटिव चीज लीक हो गई? या लीक कर दी गई? सरकार और सेना को इसकी सफाई देनी चाहिए.
सवालों के घेरे में तो सेना भी है सेना को ये बताना चाहिए कि जब सर्जिकल स्ट्राइक के अगले ही दिन उसने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इस खुफिया ऑपरेशन का ब्योरा दिया, तो अब भी वैसी ही 'पारदर्शी प्रक्रिया' क्यों नहीं अपनाई गई? सबूत देना ही था, तो आधिकारिक तौर पर किया जाता. क्लासिफाइड, यानी गोपनीय फाइलें सार्वजनिक की जाती हैं. कई सारे देशों में होता है ये. पारदर्शिता के नाम पर. लेकिन उसका भी एक वक्त होता है. 30-40 साल बाद जब लगता है कि जानकारी पब्लिक करने से कोई नुकसान नहीं होने वाला, तब चीजें सार्वजनिक की जाती हैं. वो भी एक तय प्रक्रिया को पूरा करने के बाद. आधिकारिक तौर पर. ऐसे खुफिया और चोरी-चुपके वाले तरीके से नहीं होता कुछ. लेकिन हिंदुस्तान में ये चलन नहीं रहा है. 1962 में इंडो चाइना वार पर बनी हेंडरसन ब्रुक्स रिपोर्ट आज तक पब्लिक नहीं हुई है. इसी तरह कारगिल युद्ध पर बनी Kargil Review Committee रिपोर्ट, जिसे हम सुब्रह्मण्यम रिपोर्ट के नाम से भी जानते हैं, पूरी तरह से हमारे सामने नहीं है. सेना को ऐतराज होना चाहिए कि उसके काम पर पॉलिटिक्स हो रही है एक और भी परेशान करने वाली बात है. सर्जिकल स्ट्राइक के बाद बीजेपी और मोदी सरकार ने इस बहाने से अपनी बहुत पीठ थपथपाई थी. चुनावी रैलियों में बार-बार इसका जिक्र किया गया. खुद प्रधानमंत्री मोदी ने बार-बार अपने भाषणों में इसका जिक्र किया. यानी मोदी सरकार ने अपने विपक्षियों के मुकाबले खुद को बेहतर साबित करने के लिए जनता के सामने सर्जिकल स्ट्राइक की गिनती कराई. इसे चुनावी मुद्दा बनाया. विपक्ष को इसके बारे में बात करने की छूट नहीं थी. सवाल करने की छूट नहीं थी. लेकिन सरकार को इसके बहाने अपनी पीठ थपथपाने की छूट थी. अब जिस तरह से ये विडियो जारी हुआ है (या किया गया है, वॉटऐवर) उसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए कि इसपर राजनीति होगी. इसका राजनीतिक इस्तेमाल होगा. क्या सेना को इसपर आपत्ति नहीं होनी चाहिए? ये भी तो सेना का अपमान है. कि उसके इतने डेयरिंग ऑपरेशन के बहाने राजनैतिक पार्टियां अपनी पॉलिटिक्स चमकायें. सेना को इसपर ऐतराज होना ही चाहिए. बाकी मोदी सरकार पर उंगली तो उठेगी ही. उसे जवाब देना होगा. कि तब नैशनल इंटरेस्ट, नैशनल सिक्यॉरिटी, सेना का सम्मान, संप्रभुता जैसी तमाम चीजें गिनाकर सबूत देने से इनकार किया था. तो अब ये फुटेज कहां से और क्यों बाहर आए.



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