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BHU की लड़कियां बोलीं- हमें 8 बजे के बाद तालों की नहीं, लाइटों की जरूरत है

बीएचयू की स्टूडेंट्स ने हाल-ए-कैंपस बताया है.

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छेड़खानी के विरोध में बीएचयू कैंपस में चल रहा है छात्राओं का प्रदर्शन.
इनके पीछे कोई छात्र संगठन नहीं है. कोई राजनीति नहीं है. कोई एजेंडा नहीं है. एकदम सामान्य छात्राएं हैं ये. अपने हक के लिए आवाज उठाई है. हक अपनी आजादी का. कब तक उन्हें घड़ी देख के चलना पड़ेगा. 7 बजे तक हॉस्टल में वापस आना है. रात में बाहर नहीं निकलना है. ये नहीं करना. वो नहीं करना. वो इन बंदिशों से आजादी चाहती हैं. उनकी मांगों में वर्ल्ड टूर नहीं है. बस अपनी सुरक्षा की गारंटी चाहती हैं. पर इसका आश्वासन देने के लिए भी वाइस चांसलर गिरीश चंद्र त्रिपाठी आने को तैयार नहीं हैं. वीसी साहब आप इस यूनिवर्सिटी के सर्वेसर्वा हैं. यहां पढ़ने वाली लड़कियां आपकी बहन-बेटियों की तरह ही हैं. इनकी दिक्कतें सुलझाइये. क्योंकि अबकी बार ये बहुत गुस्से में हैं. उन्होंने अपना गुस्सा जाहिर किया है. कुछ स्टूडेंट्स ने दी लल्लनटॉप को अपनी समस्याएं लिख कर भेजी हैं.
छेड़खानी के विरोध में एक छात्रा ने सिर मुंडवा लिया है.
छेड़खानी के विरोध में एक छात्रा ने सिर मुंडवा लिया है.

कुलपति जी...हमें कैद नहीं, सुरक्षा चाहिए: परफॉर्मिंग आर्ट्स की स्टूडेंट

हम यहां कल सुबह 6 बजे से लंका गेट पे धरना दे रहे हैं. अपनी सुरक्षा और आज़ादी की मांग कर रहे हैं और कुलपति महाशय अभी तक घूंघट से बाहर नहीं निकल पाए. शायद अब हमसे वो लोग डरे हुए हैं, जो हम लड़कियों को डर के रहने को बोलते हैं. यहां के वार्डन, सुरक्षाकर्मी और कुलपति साहब सब पढ़े-लिखे गवार हैं. हम कुलपति जी से ये मांग करते हैं कि हमें कैद नहीं, सुरक्षा चाहिए. और सुरक्षा हमें हॉस्टल या घरों में बंद रहने से नहीं मिलेगी. जो क्रिमिनल्स होते हैं, उन्हें रात भर घूमने की आज़ादी होती है और हम लड़कियों को 7 बजे के बाद बाहर निकलने नहीं दिया जाता. अगर लड़कियां भी रात को निकलने लगें तो किसी को अलग से आंखों में चुभेगा नहीं. 22 सितंबर की रात को लड़कियां रात के 2, 3, 4 बजे तक भी अकेले निकली हैं. किसी तरह की कोई छेड़खानी भी नहीं हुई. यही अगर हर रात लड़कियां निकलने लगें तो किसी तरह की छेड़खानी नहीं हो सकतीं. हमारे हॉस्टल्स में किसी तरह की कोई टाइम लिमिट नहीं होनी चाहिए. प्रॉक्टोरियल ऑफिसर्स को सिर्फ सोना नहीं, कुछ काम भी करना चाहिए.

लड़कों से डरते हैं गार्ड और प्रॉक्टर: एमए, फर्स्ट ईयर स्टूडेंट, सोशल साइंसेज

शाम के 8 बजे थे. मैं अपने एक दोस्त के साथ हॉस्टल आ रही थी. आईएमएस से आगे बढ़ते वक्त कुछ लड़कों ने मुझपर कमेंट किए. बीएचयू में ऐसा हर उस लड़की के साथ होता है जो किसी लड़के के साथ हो. आपके साथ कुछ भी गलत हो जाए, तो लोग आपको ही दोषी ठहराने लगते हैं. पूछा जाने लगता है- क्या ये लड़का तुम्हारा ब्वॉयफ्रेंड है? कोई मदद नहीं करता. जब उन लड़कों ने मुझपर कमेंट किया तो मैंने भी जवाब दिया. वो 9-10 लोग इस पर हमारी तरफ आने लगे. मेरा दोस्त अकेला था. इसलिए मैंने आईएमएस के पास बैठे गार्ड्स से मदद मांगी. जब मैं गार्ड्स के साथ पहुंची तो वो लोग मेरे दोस्त के साथ बद्तमीजी कर रहे थे. गार्ड्स को देखकर तो वो लड़के और तन गए. दोनों गार्ड एकदम डरपोक निकले. लड़के भी उलटा हमें ही गलत बतान लगे. वहां हंसी-मजाक होने लगा. मैं और मेरा दोस्त फिर किसी तरह वहां से निकले. सच कहूं तो यहां के गार्ड्स एकदम निकम्मे हैं. प्रॉक्टोरियल बोर्ड भी कोई ध्यान नहीं देता. सभी यहां के लड़कों से डरते हैं. ऐसी घटनाएं बीएचयू में रोज की कहानी है. कोई ध्यान नहीं दे रहा है. ध्यान हम लड़कियों को ताले में बंद करने पर है. जिम्मेदार ये क्यों नहीं सोंचते कि हमें 8 बजे के बाद तालों की नहीं, लाइटों की जरूरत है. बेहतर होगा हमें तालों में बंद करने की बजाए उन शैतानों को बंद करो.
बीएचयू के मेन गेट पर डटी हुई हैं छात्राएं.
बीएचयू के मेन गेट पर डटी हुई हैं छात्राएं.

'आप कैंपस को सुरक्षित नहीं कर सकते, सिर्फ लड़कियों को कैद कर सकते हैं'

एक और लड़की ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा है: 2012 में मुझे भी नवीन हॉस्टल मिला था. एडमिशन के बाद जब पहली वॉर्डन मीटिंग हुई तो वॉर्डन साहिबा ने कहा कि हॉस्टल की इज्जत आप सब लड़कियों की इज्जत है. हॉस्टल से एक किलोमीटर की दूरी पर आप किसी लड़के के साथ नज़र नहीं आनी चाहिए. मेरे लिए वो आश्चर्यजनक था. इन्ही रूढ़ियों के खिलाफ घर से लड़ कर मैं विश्वविद्यालय पहुंची थी. हालत ये थी कि हॉस्टल की 'मांसीजी' तक लड़कियों से कपड़ों पर सवाल करतीं थी. उन्हीं दिनों परिसर में 24X7 साइबर लाइब्रेरी की शुरुआत हुई. लड़के वहां जा सकते थे लेकिन लड़कियां नहीं क्योंकि लड़कियां 7 बजे के बाद बाहर नहीं निकल सकती थीं. सुरक्षा के नाम पर नवीन हॉस्टल की लड़कियों के लिए ये सीमा 6.30 की थी. यानी आप कैंपस को सुरक्षित नहीं कर सकते, सिर्फ लड़कियों को कैद कर सकते हैं. तब लगा कि ये तो हमारे बराबरी के अधिकार का हनन है. लड़के रात को जाकर लाइब्रेरी में पढ़ सकते हैं पर लड़कियां नहीं. इसके पीछे का लॉजिक मेरी समझ से बाहर था. हमने एप्लीकेशन्स लिखीं, सिग्नेचर कैंपेन किया पर नतीजा सिफ़र. छात्र संघ भी नहीं था कि उसके जरिए बात की जाती. प्रशासन की पूरी मनमानी थी. हम कुछ नहीं कर पाए. खुशी है कि आकांक्षा और बाकी लड़कियां आवाज़ उठा रही हैं. बदलाव आज नहीं तो कल आएगा जरूर.

और हालात पर बीएचयू के एक छात्र ने हमें ये लिखकर भेजा है-

बीएचयू में स्थिति गंभीर है. पूरे आंदोलन को लड़कियां ही लेकर चल रही हैं. लड़के घेरा बनाकर खड़े हैं और इन लड़कियों का ही कहा मान रहे हैं. वाम और दक्षिण की बहस तो है नहीं, लड़कियों की सुरक्षा की बात है.
ऐसे में बीच शाम होते-होते खबर उठनी शुरू हुई कि एबीवीपी से जुड़ी कुछ लड़कियां प्रदर्शनकारियों के बीच आकर बैठ गयीं और मामले को दिशाहीन करने लगीं. लेकिन इस खबर की सचाई यह निकली कि किसी भी दल की लड़कियों ने प्रदर्शन कर रही लड़कियों का भरपूर साथ दिया.
लाठीचार्ज होने के आसार कम हैं. पुलिस तैनात है, और यह संभावना है कि आंसू गैस के गोले भीड़ को तितर-बितर करने के लिए छोड़े जा सकते हैं. लेकिन एक जगह बैठकर महज़ नारेबाजी कर रही भीड़ पर आंसू गैस या रबर बुलेट चलाने से मामला गड़बड़ा सकता है तो इस दिशा में एबीवीपी से जुड़े लड़के काम कर रहे हैं.
प्रदर्शनकारी छात्रों ने बीएचयू गेट पर दो बड़े-बड़े पोस्टर लटका दिए - 'अनसेफ बीएचयू' और 'बचेगी बेटी तभी तो पढ़ेगी बेटी'. यहीं पर एबीवीपी से जुड़े बारह लड़के 'महामना के सम्मान' के लिए चिल्लाते हुए दो-चार हाथ चलाकर दोनों पोस्टर गिराने की कोशिश करने लगे.
बीएचयू गेट पर काफी पुलिस बल तैनात है.
बीएचयू गेट पर काफी पुलिस बल तैनात है.
अब पोस्टर गिरने से कोई बवाल नहीं हुआ तो इन बारह में से तीन चार लड़के "कौन मादर** पोस्टर टांगा था महामना के सिंहद्वार पर" चिल्लाते हुए उकसाने का काम करने लगे. "महामना का हो सम्मान" सरीखा नारा साइड से एबीवीपी के लड़के कभी-कभी मार दे रहे थे. पोस्टर का गुस्सा इतना था (छेड़खानी और शोहदेबाज़ी का गुस्सा तो था नहीं) कि एबीवीपी से जुड़े लड़के बीच में बैठी लड़कियों की तरफ पोस्टर का गुस्सा निकालने के लिए बढ़ने लगे. लेकिन लड़कियों के चारों ओर खड़े प्रदर्शनकारी लड़कों ने उन्हें घुसने नहीं दिया, इस घुसने की असफल कोशिश में खींचातानी हुई, जिसके बीच एक लड़के ने मुझसे पलटकर कहा - एक थप्पड़ भी चल जाएगा तो पूरा आंदोलन बैठ जाएगा.

मारपीट या झगड़े जैसी स्थिति आते ही पुलिस को बल प्रयोग (जिसकी सीमा निश्चित नहीं है) करने में कोई परेशानी नहीं आएगी. पुलिस को ऐसे ही नाज़ुक मौके की तलाश होती है.

वीडियो देखें-



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