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'जब रेप के मामलों में फैसले एक पीढ़ी बाद आते हैं...', अदालतों के पेंडिंग केसेज पर बोलीं राष्ट्रपति

राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने कहा, 'एक कहावत है, भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं...लेकिन देर कितने दिन तक? कितना देर हो सकता है?'

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राष्ट्रीय जिला न्यायपालिका सम्मेलन के समापन सत्र के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु (फोटो:X/@rashtrapatibhvn)

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु (Droupadi Murmu) ने रविवार, 1 सितंबर को नई दिल्ली में राष्ट्रीय जिला न्यायपालिका सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने कहा कि पेंडिंग मामले और बैकलॉग न्यायपालिका के लिए एक बड़ी चुनौती हैं. उन्होंने तेज गति से न्याय सुनिश्चित करने की अहमियत पर भी जोर दिया, खासकर रेप के मामलों में. इस कार्यक्रम में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डीवाई चंद्रचूड़ और केंद्रीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल भी मौजूद थे.

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राष्ट्रपति ने कहा कि न्याय की रक्षा करना देश के सभी जजों की जिम्मेदारी है. उन्होंने कहा कि जब रेप जैसे मामलों में अदालत के फैसले एक पीढ़ी बीत जाने के बाद आते हैं, तो आम लोगों को लगता है कि न्याय प्रक्रिया में संवेदनशीलता की कमी है. राष्ट्रपति ने कहा कि गांव के गरीब लोग नीचे से ऊपर तक की सभी अदालतों के जजों को ‘भगवान’ मानते हैं क्योंकि वहां इंसाफ मिलता है.

न्याय मिलने की प्रक्रिया में देरी पर राष्ट्रपति ने कहा,  

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"एक कहावत है, भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं…लेकिन देर कितने दिन तक? कितना देर हो सकता है? 32 साल? 12 साल? 20 साल? 10 साल? हम लोगों को सोचना चाहिए. तब तक जिसको न्याय मिलेगा…32 साल के बाद शायद उनके चेहरे से मुस्कान ही खत्म हो जाएगी…जिंदगी ही खत्म हो जाएगी.”

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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने ‘तारीख पर तारीख देने’ की प्रक्रिया पर कहा,

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"मैंने देखा है कि गांव का गरीब आदमी कोर्ट-कचहरी जाने से डरता है. वो बहुत मजबूरी में ही अदालत की न्याय प्रक्रिया का भागीदार बनता है. अक्सर, वो अन्याय को चुपचाप सहन कर जाता है क्योंकि उसे लगता ​​है कि न्याय के लिए लड़ना उसके जीवन को और अधिक कष्टमय बना सकता है. उसके लिए एक बार गांव से दूर अदालत तक जाना ही बहुत बड़े मानसिक और आर्थिक दबाव का कारण बन जाता है. ऐसी स्थिति में, बार-बार तारीख देने यानी स्थगन की संस्कृति से गरीब लोगों को जो तकलीफ होती है, उसकी कल्पना भी बहुत से लोग नहीं कर सकते. इस स्थिति को बदलने के लिए हर संभव कोशिश की जानी चाहिए.”

राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि न्यायपालिका को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. इनसे निपटने के लिए सभी हितधारकों को कोशिश करनी चाहिए. उन्होंने कहा, 

"ये हमारे सामाजिक जीवन का एक दुःखद पहलू है कि कुछ मामलों में साधन संपन्न लोग अपराध करने के बाद भी निर्भीक घूमते रहते हैं. जो लोग उनके अपराधों से पीड़ित होते हैं, वे डरे-सहमे रहते हैं…महिला पीड़ितों की स्थिति और भी खराब होती है क्योंकि समाज के लोग भी उनका साथ नहीं देते."

राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें खुशी है कि सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका में लोगों का विश्वास सुनिश्चित करने के लिए इस तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया है. इस दौरान राष्ट्रपति ने महिला न्यायिक अधिकारियों की संख्या में बढ़ोतरी पर खुशी भी जताई.

इससे पहले शनिवार, 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के 75 वर्ष पूरे होने पर पीएम मोदी जजों के अखिल भारतीय सम्मेलन में शामिल हुए थे. उन्होंने भी महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में जल्द न्याय की जरूरत पर जोर दिया था. इस दौरान उन्होंने कहा था कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध देश में गंभीर चिंता का विषय बन गया है. उन्होंने जिला न्यायालय के न्यायाधीशों से अपील की थी कि वे इन मामलों का शीघ्र निपटारा करें, ताकि विशेष रूप से महिलाओं और पूरे समाज में सुरक्षा की भावना पैदा हो सके. 

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