
फोटो क्रेडिट: Reuters
पाकिस्तान में जगह है सियालकोट. ये अकेला सियालकोट हर साल पूरी दुनिया में हाथ से बनी करीब 4 से 6 करोड़ फुटबॉल सप्लाई करता है. सियालकोट में फुटबॉल बनाने वाली लोकल फैक्ट्रियां भरी हुई हैं. कहते हैं दुनिया में जित्ती फुटबॉल देखी और खेली जाती हैं, उसकी करीब 70 पर्सेंट फुटबॉल पाकिस्तान में तैयार होती हैं.ब्राजील में साल 2014 में फुटबॉल का वर्ल्डकप हुआ था न. तब जो फुटबॉल यूज हुई थी, उसे कहते हैं ब्राजुका. अब ये नई तरह की ब्राजुका को बनाने का ठेका भी पाकिस्तान को मिला था. यानी वर्ल्डकप में जो ब्राजुका यूज हुई, उसे पाल-पोष तक तैयार करने का काम किया था पाकिस्तानी मजदूरों की हथेलियों और मशीनों ने. रेपलिका बॉल्स को चीन के अलावा बनाने का क्रेडिट भी पाकिस्तान को ही जाता है.

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पाकिस्तान में फुटबॉल बनाने का काम करती है 'फॉरवर्ड स्पोर्ट्स' नाम की कंपनी. ये वही कंपनी है जो एडिडास को माल सप्लाई करती है. सियालकोट से अब तक करीब 4 करोड़ 20 लाख ब्राजुका दुनिया के मैदानों में उछल-कूद मचाए हुई हैं. अब जरा पइसे-रूपल्ली की बात हो जाए.
पाकिस्तान की बनाई एक बॉल की कीमत करीब 11 हजार रुपये है. अच्छा हां, पाकिस्तान को बधाई दीजिए. क्योंकि फीफा वर्ल्डकप के लिए फुटबॉल बनाने का ठेका मिला था चीन को. हां, वही चीन जो हर बात पर पाकिस्तान की मदद करता नजर आता है. और यही वो चीन है, जो वर्ल्डकप के लिए ब्राजुका पूरी सप्लाई नहीं कर पाया था. फिसड्डी निकला तो ठेका संभाला अपने दोस्त देश पाकिस्तान ने.सियालकोट तुर्रम खां बना तो बना कइसे? सियालकोट में इत्ती ज्यादा फुटबॉल यूं ही नहीं बनने लगी. बहुत पुराना किस्सा है. तब जब, वो और हम वाकई 'हम' थे. यानी ये अंग्रेजों के जमाने की बात थी. इत्ता तो गोलू भी जानता है कि फुटबॉल और क्रिकेट अंग्रेजों के खेल हैं. हां तो ये किस्सा साल 1889 का है.
एक ब्रिटिश सार्जेंट ने सियालकोट के मोची को पकड़ा और कहा, 'मेरी फुटबॉल पंक्चर हो गई है. इसे ठीक कर दो.' मोची भी निकला पक्का हुनरमंद. फटाक से फुटबॉल ठीक कर के सार्जेंट को दे दी. सार्जेंट काम से खुश हुआ और कुछ फुटबॉल बनाने के लिए कह दिया. बस फिर धीरे-धीरे गाड़ी चल निकली. साल 1982 से सियालकोट की बनी फुटबॉल वर्ल्डकप में यूज हो रही हैं.

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बाकी पाकिस्तान से ज्यादा कमाता है अकेला सियालकोट, थैंक्स टू फुटबॉल फुटबॉल बनाने से सियालकोट को झाबड़ फायदा होता है. सियालकोट में एक बंदा साल में करीब 93 हजार से ज्यादा रुपये कमा लेता है. ये पइसा बाकी के पाकिस्तानी नागरिकों की सालाना नेशनल इनकम से ज्यादा है. अब क्योंकि इत्ती फुटबॉल बन रही हैं, तो दुनिया के रखवालों को बाल मजदूरी की चिंता सताई. यूनीसेफ और 1997 में पाकिस्तानी के फुटबॉल सप्लायर्स ने अटलांटा एग्रीमेंट साइन किया कि भैया चाइल्ड लेबर नहीं होना चाहिए. वरना इससे पहले 10 साल तक का इत्तो सा लौंडा भी फुटबॉल हाथ से सिलकर तैयार कर लेता था. हालांकि काम लौंडे अब भी जानते ही हैं.

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1980 में सेलेब्रिटी बना पाकिस्तान फुटबॉल और सियालकोट के किस्से बहुत ही पुराने हैं. 1982 में फीफा फुटबॉल वर्ल्डकप के लिए पाकिस्तान ने 'टैंगो बॉल' बनाई थी. इस बॉल को बनाने के बाद पाकिस्तान को इंटरनेशनल सेलेब्रिटी स्टेटस दिया गया. अब सोचिए कि जो पाकिस्तान दुनिया को फुटबॉल दे रहा है, वो खुद 1950 के बाद फीफा वर्ल्डकप के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाया है. बैड लक पाकिस्तान. पर खेल से बिजनेस का कोई कनेक्शन नहीं होना चाहिए. इसलिए लोड लेने की जरूरत नहीं है मितरों....




















